रविवार, 24 मई 2026

मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


जो हुआ बस हो गया, उस रात यूं होना नहीं था

मैं कहां आंसू छिपाता, एक भी कोना नहीं था

लौटना था फिर मुझे जीवन भरी लंबी सड़क पर

सो चिता की आग में ख़ुद को पिघलता छोड़ आया।

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


देखने थे साथ मिलकर कितने सावन ज़िंदगी के

चूमने थे छोर साथी, बादलों के और ज़मीं के

हो सके तो माफ़ करना, एक दिन मैं ही अचानक

चार कंधों के सहारे तुमको चलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

और तारों की चमक में भी तुम्हें ही खोजता हूं

क्या रखा है ज़िंदगी की इन हसीं उपलब्धियों में

हार कर तुमको मैं अपनी, सब सफलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 18 मई 2026

"कर्तव्य" फिल्म का नाम "फादर इंडिया" भी हो सकता था

यह समीक्षा इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के लिए लिखी जा रही है, जो वहां शायद ही छप सके। क्योंकि वहां जिसे (सौरभ द्विवेदी) वर्ल्ड क्लास संपादक समझ रहा था वो ही दरअसल इस फिल्म में एक थर्ड क्लास (अपनी सुविधा से वर्ल्ड क्लास पढ़िए) अभिनेता है।

मगर एक बात तो माननी पड़ेगी। रोल एकदम कायदे का मिला है बंदे को। जो दिखता है, वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं। ऑस्कर की जगह एक 'बस कर" अवार्ड शुरू करूंगा तो सौरभ को नॉमिनेट ज़रूर करुंगा।

जो बंदा सब कुछ कर सकता है वो दरअसल कुछ नहीं कर सकता। यही बात सौरव द्विवेदी के स्क्रिप्ट राइटर ने उन्हें कभी बताई नहीं।

वो लल्लनटॉप जैसे फालतू नाम से एक भरोसेमनंद न्यूज चैनल खड़ा कर सकते हैं। पत्रकारिता करते करते डिनर टेबल पर गृह मंत्री के सामने ऐसे झुकते हैं कि वायरल हो जाते हैं। फिर अपने गांव में पुस्तकालय खोलने की ब्रांडिंग में पैसा वसूल कुविश्वसनीय लोगों को मंच पर बुला लेते हैं। रील के ज़माने में इतने लंबे लंबे इंटरव्यू लेते हैं कि थक हारकर उन्हें फिल्म में कोई रोल दे देता है। वो सबसे बड़ा विलेन का रोल से कम पर राज़ी ही नहीं होते और फिर "कर्त्तव्य" नाम की फिल्म में जब सैफ अली खान और संजय मिश्रा अपनी दमदार एक्टिंग का कर्त्तव्य निभाते हुए आनंद श्री उर्फ भूतपूर्व लल्लनटॉप सौरव द्विवेदी के पास जाते हैं तो ऐसी डायलॉगबाजी करते हैं कि टेलीप्रॉन्पटर भी शर्मा जाए।

फिल्म में क्लाइमैक्स ज़बरदस्त है। हमारी फिल्में "मदर इंडिया" से "फादर इंडिया" तक का सफर पूरा कर जुकी हैं। मदर इंडिया में जहां मां ने अपने बेटे को मार दिया था, यहां एक बेटे ने अपने पिता को ही मार दिया। इसके लिए "बस कर" अवार्ड का नॉमिनेशन आता ही होगा।

खैर, फिल्म अच्छी है। Netflix पर है। एक बात ज़रूर देखी जा सकती है। ठंड रखिए, जितने क्विंटल का लेख सौरभ द्विवेदी की आलोचना में सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है, वह इस फिल्म में उसका छंटाक हिस्सा भर भी नहीं हैं। उनके अलावा पूरी फिल्म में सबकी एक्टिंग अच्छी है।


निखिल आनंद गिरि

रविवार, 17 मई 2026

चमचों के दरबारों से ख़ुद को दूर रक्खा है

हुनर अपना न मैं ने बेचना मंज़ूर रक्खा है
तभी चमचों के दरबारों से ख़ुद को दूर रक्खा है
मिलेगी कुर्सी झुकने से, ये दुनिया चीख़ कर बोली
मगर मैं ने ही सर अपना बहुत मग़रूर रक्खा है
वो तलवे चाट कर मंज़िल की सीढ़ी चढ़ तो जाते हैं
मगर मैं ने सफ़र का रास्ता पुर-नूर रक्खा है
जहाँ बिकते थे सब ग़ैरत, वहाँ हम जा नहीं पाए
ज़मीरे-ज़िंदा को हर हाल में मसरूर रक्खा है
कहा जो 'हाँ' में 'हाँ' उनकी, तो वो मेहरबाँ ठहरे
कहा जो 'सच', तो फिर उन सब ने ही मक़हूर रक्खा है
ज़माना हो गया रुसवा, मगर ये साख है मेरी
कि मैं ने सच का दामन आज भी दस्तूर रक्खा है
निखिल आनंद गिरि

(मक़हूर - नापसंद)

सोमवार, 11 मई 2026

आज की कविता और हमारा समय

बीसवीं सदी के अंतिम दो दशक अनेक दृष्टियों से वैविध्यपूर्ण और घटना बहुल रहे। इस समय के राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रभावों ने, जिसके अंतर्गत – भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, सत्ताओं का गंठजोड़, आंदोलनों की गूंज, घोटाले, आतंकवादी और नक्सली गतिविधियों, सांप्रदायिकता में उभार, फ्री मीडिया, मध्यम वर्ग में आर्थिक बदलाव, रोज़गार की कमी आदि प्रमुख घटनाएं रहीं, ने समाज तथा कविता को गहरे प्रभावित किया।

इसके ठीक बाद एक कवि के तौर पर साहित्य की दुनिया में पहली बार मैंने इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में प्रवेश किया। दो कमरों के घर में चार भाई-बहन मां की निगरानी में रहते थे, पिता बाहर नौकरी करते थे। झारखंड में रांची नई-नई राजधानी बनी थी। शहर होने के अंकुर फूट ही रहे थे। टेंपो में मध्यमवर्गीय लोग बैठते थे तो साथ में किसी आदिवासी महिला के झोले से मुर्गा भी मुंडी निकाले शहर को निहारता था। पानी की किल्लत में दो रुपये प्रति टीन आदिवासी लड़के अपने कंधों पर पानी लादे घर पहुंचाया करते थे। पानी सुबह और शाम सिर्फ एक-एक घंटे के लिए आता था।

कविताएं लिखना बेहद मुश्किल था। घर में साहित्य का कोई स्पेस या माहौल नहीं था। कविता की कोई पंक्ति मन में आए तो कागज़ पर लिखकर उसे छिपाकर रखना पड़ता था कि किसी की नज़र न पड़ जाए। छिप-छिप कर किसी अख़बार में कविताएं भेज भी दी तो ये पूछने में भय लगता था कि कब छपेंगी, छपेंगी भी या नहीं। यह मेरे जैसे कई नये कवियों की एक-सी कहानी है, जो इस सदी की पूरी चौथाई में लिख रहे हैं। इसी समय सुखद संयोग की तरह डिजिटल युग आया जहां लिखना-पढ़ना सब आसान हो गया। मरी दृष्टि में इस सदी की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना की तरह दखना चाहिए जिसन कविताएं लिखने और इसक प्रसार के सारे मानकों को बदल कर रख दिया।

मैं इसे दो तरह से देखता हूं। पहला सकारात्मक पहलू ये है कि डिजिटल प्लैटफॉर्म के ज़रिए लिखना आसान हुआ है। आपको किसी संपादक के ग्रीन सिग्नल का इंतज़ार नहीं करना पड़ता किसी कविता के छपने के लिए। महीने-दो महीने, पांच-छह महीने और सालों निकल जाते हैं कई बार और कुछ भी जवाब नहीं आता किसी पत्रिका से। तो उस मठाधीशी को तोड़ा है डिजिटल प्लैटफॉर्म ने। ये एक तरह का पैराडाइम शिफ्ट (आमूल परिवर्तन) था हिंदी में। हिंदी साहित्य में दखल देने के एक पूरे प्रोसेस को चुनौती थी। बहुत विरोध हुआ, सीनियर, स्थापित साहित्यकारों ने हेय दृष्टि से देखना शुरू किया नए इंटरनेट छाप कवियों को। अब वो सब डिजिटल मंचों पर खुशी-खुशी आते हैं और साथ में कविता पाठ होते हैं।

इस विस्फोट की चुनौती ये है कि आवारा लोकप्रियता के ट्रेंडिंग दौर में कविता कहीं खो न जाये। बधाई, लाइक्स और वायरल रील्स के दौर में कविता अब अंतरों में नहीं पंक्तियों में सिमट कर रह गई है।

आचार्य मम्मट ने काव्य प्रयोजन के संदर्भ में यश को पहला प्रयोजन स्वीकार करते हुए लिखा है – काव्यं यशसेर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षते। सद्य: परिनिर्वृत्तये कांत सम्मिततयो पदेशयूजे। अर्थात् काव्य का प्रयोजन यश, अर्थ-प्राप्ति, व्यवहार की शिक्षा देना और जीवन के शिव पक्ष की रक्षा करना है। पोएट्री के ज़रिए यश यानी मशहूर होने से किसी को दिक्कत नहीं है। सवाल है शॉर्ट कट का।

जामिया में जब पढ़ने आया था तो शैलेश भारतवासी हिंदयुग्म नाम का सुंदर ब्लॉग चलाया करते थे। उसमें हर महीने यूनिकोड में टाइप की गई हिंदी कविताएं आमंत्रित की जाती थी और महीने के अंत में विजेता यूनिकवि घोषित किया जाता था। मैं भी हिंदी के इस रोचक अभियान से तन-मन-धन से कुछ दिन जुड़ा, फिर एक बार पता चला कि उस प्रतियोगिता की निर्णायक मंडली में एक महिला मित्र हैं, जो अपनी कविताएं भी उसी प्रतियोगिता के लिए बतौर प्रतिभागी भेजती हैं! शुक्र है कि इस तरह का शॉर्टकट रास्ता प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं होता।

मैंने पिछले कुछ समय के अपने अध्ययन में इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर तीन लोकप्रिय डिजिटल माध्यमों पर नज़र दौड़ाई है। ये माध्यम हैं – ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम। मेरा ख़ुद से सवाल ये था कि कौन सा माध्यम कविता के लिए सबसे उपयुक्त हो सकता है।

ट्विटर (अब एक्स) पर एक पोस्ट लिखने की शब्द सीमा मात्र 280 कैरेक्टर्स हैं। कैरेक्टर का मतलब वर्णों के साथ कॉमा, पूर्णविराम भी गिनती में आते हैं। इतने कम शब्दों या कैरेक्टर्स में कविता लिखने का दौर शायद अभी नहीं आया है। वैसे भी ट्विटर का उपयोग भारत में ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए ज़्यादा होता है बजाय कविता के। तो मैं इसे एक अकलात्मक या APOETIC माध्यम मानूंगा।

फेसबुक हम जैसे ऑरकुट की पीढ़ी वालों का मक्का-मदीना है। क्या खाया, कहां घूमे, क्या बनाया, करवा चौथ का चांद दिखा कि नहीं आदि निजी बातों को शेयर करने का सटीक माध्यम। मैं ख़ुद इस पर फेसबुक ट्रैवल्स के नाम से एक सीरीज़ बरसों से चलाता हूं और इसमें तरह-तरह की तस्वीरें या दो-चार पंक्तियों में अपनी बात कहता रहा हूं। मगर, कविताओं के लिहाज़ से ये माध्यम भी सबसे उपयुक्त नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसका दायरा आपके अपने दोस्त-यार, सगे-संबंधी हो सकते हैं, जो बिना पेड प्रोमोशन के बहुत सीमित है।

एक तीसरा माध्यम है इंस्टाग्राम जो मुझे तो बहुत आकर्षित नहीं करता मगर मेरे बाद की पीढ़ी जो अभी कॉलेज में है या अभी-अभी कविता का कीड़ा लगा है, उसके लिए सबसे सटीक है। इसकी पहुंच भी असीमित लोगों तक है और यहां पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों तरह के कंटेंट ख़ूब शेयर किए जाते हैं। हैशटैग और टैग यहां तसल्लीबख्श इस्तेमाल किए जाते हैं। और तस्वीरों के साथ फोटो लगाने वाली पीढ़ी छोटी कविताओं के साथ आसानी से आकर्षक तस्वीरें, फॉन्ट, टेंपलेट वगैरह शेयर करती है। यानी कविता यहां सिर्फ कविता नहीं है। वो अपनी पैकेजिंग में आपके दिमाग़ में थोड़ी देर ठहरती है। अब उसमें अगर कंटेंट हुआ तो बहुत देर तक भी आपके साथ रह जाएगी।

अगर आपने नए दौर के बेस्टसेलिंग डिजिटल कवियों के बारे में थोड़ा बहुत भी सुना है तो रूपी कौर के नाम से ज़रूर वाकिफ़ होंगे। उनकी अंग्रेज़ी कविताओं का संग्रह मिल्क और हनी तो इतना बिका जितना हिंदी के बड़े-बड़े कवि सपने में भी नहीं सोच पाएंगे। उनकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर मैं गया तो कम से कम सौ पोस्ट्स बिल्कुल एक जैसे मेक अप में दिखीं। बीच में एकाध लाइन की कविता और दाएं-बाएं दो तस्वीरें।

I have never known anything more quietly loud than anxiety. इस एक लाइन की कविता पर दो लाख 58 हज़ार 243 लाइक्स हैं। ऐसी कविताओं के ज़रिए अमेज़ॉन प्राइम पर उनका एक घंटे का एक शो भी है। मुझ जैसा हिंदी कवि सिर्फ अमेजॉन प्राइम या नेटफ्लिक्स जुगाड़ करके देखता रह जाता है, रूपी वहां सेलेब्रिटी बन जाती हैं।

इंस्टाग्राम पर हिंदी कवियों का हाल भी ठीकठाक ही है। मैंने सर्च बॉक्स में हिंदी कविता लिखा तो कई सारे पेज दिखे। कई सारे कवि भी। जैसे एक पेज दिखा – हिंदी कविता संसार। इसकी टैगलाइन है-Connecting New Generations to Hindi Kavita। फिर वहां सुंदर बैकग्राउंड में नागार्जुन, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी की चर्चित कविताओं के टुकड़े हैं। इस पेज के एक हज़ार से अधिक फॉलोवर्स हैं जो संतोषजनक है।

कुछ और इंस्टाग्राम पेज पर भी गया जहां फॉलोवर्स तो हज़ार से अधिक थे, मगर कविताओं के नाम पर पोस्टर पर लिखे कोटेशन और सस्ती शायरी ही अधिक मिली।

कहा जा सकता है कि आज के कवियों में कबीर, तुलसी, रैदास, मुक्तिबोध, निराला,  नगार्जुन, केदारनाथ सिंह आदि कवियों जैसे सारगर्भित कहने और अपने समय के विपरीत लिखने का साहस या इच्छाशक्ति कम ही दिखती है।

दरअसल. कविता समाज से अलग-थलग रहकर किया जाने वाला स्वतंत्र कार्य नही है।  इसमें रचनाकार अपने संसार के बरक्स एक प्रति-संसार रचते हुए अपने पाठकों को, जो है उससे बेहतर में, ले जाने की सदिच्छा रखता है। कविता अपने समय का मूल्यांकन भी करती है और नई काव्यवस्तु के लिए ज़मीन भी तैयार करती है।

कविता से प्रतिबद्धता और जवाबदेही खत्म होती जा रही है। वर्तमान कविता से मौन, अनकहा, स्पेस आदि कम या गायब होते जा रहे हैं, जोकि पहले की कविता को प्रासंगिक बनाता था। वर्तमान कविता से कैरियर की गंध पनपती जा रही है।

आज की कविता की यह उपलब्धि ही मानी जाएगी कि समाज के सरोकारों के बराबर वे कुछ अत्यंत मामूली से दिखने वाले, बेहद मामूली सवालों को अपने कविताओं में उठाने लगे हैं, जो वास्तव में यथास्थितिवाद को चुनौती देते हैं। आज दलित, आदिवासी, ट्रांसजेंडर और स्त्री, जो सनातन से चुप्पी साधे थे, कविता में बोलने लगे हैं। आज की कविता का एक बड़ा हिस्सा इन बोलियों से भी गुंजित है।

मेरी समझ में कविता तीन प्रमुख तत्वों से बनती है – स्मृति, अनुभव और विचार। इस सदी की पहली चौथाई पूरा होने को है। और नई सदी में प्रविष्ट होने के बावजूद हम पिछले दशक की धड़कनों को महसूस कर सकते हैं।

ग्लोबल और लोकल जैसे विभाजन कविता के वर्तमान के लिए अब भी संकट हैं। भूमंडलीकरण, बाजार, वैचारिक मतभेद भी एक संकट है। वर्तमान समय में किसानों, मजदूरों, श्रमिकों, कारीगरों के साथ- साथ आम जन जीवन, अस्तित्व और मूल जीवन मूल्यों पर अप्रत्याशित संकट है। बहुआयामी विचारधारा जैसे शब्द अब नाम मात्र के रह गए हैं, यहीं कारण है कि वर्तमान कविता भी इससे जूझती दिख रही है।  वैचारिकता का अब बहुत महत्व नजर नहीं आता। उत्सवधर्मिता हावी हो गई है। हमें तुर्की के कवि नाज़िम हिकमत की पंक्तियां ज़रूर याद रहें –

असल कवि अपने प्रेम, अपनी खुशियों या अपने दर्द भर ही में महदूद नहीं रह सकता। ऐसे कवि की कविता में उसके जन को धड़कना चाहिए। सफल होने के लिए कवि ने अपनी कविता में संसार के जीवन पर रोशनी डालनी चाहिए। यह तय है कि जो कवि यथार्थ से बचता है और असंबद्ध विषयों पर बातें करता है, उसकी नियति भूसे में जल जाने के सिवा कुछ नहीं होगी।

निखिल आनंद गिरि

(आलोचना पत्रिका में प्रकाशित, आलोचना-21, 2026)

रविवार, 12 अप्रैल 2026

प्रेम कविता

मैं दर्द ए सर हूं, पर मुझको, वो ताज ए सर समझती है
मेरी चालाकियों को भी मेरा हुनर समझती है
मैं क्या बतलाऊं दुनिया को, मुझे क्या क्या मिला उससे
मेरी खामोशियों में भी मुझे शायर समझती है

निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 21 मार्च 2026

राख

दुनिया का फ़लसफा किसी किताब ने नहीं
एक मुट्ठी राख ने सिखाया
जब तक सांस रही
वह एक हंसता खेलता शरीर रही।
जब वह राख हुई
तब मुट्ठी भर रह गया वजूद।

मैंने उसे बहाने के लिए नदी चुनी
नदी का इतिहास भी राख ही था।
फिर जब पानी हुई नदी
तो उसमें कई मुट्ठी राख बहती रही।

किसी राजा की राख 
पशु पक्षी की राख 
या किसी प्रेमिका की राख 
सब आंसुओं में लिपटी हुई।

कई मीनारें , स्तंभ, विजय पताकाएं
सभ्यताएं भी राख हुईं 
एक दंभ भरी हंसी का राख होना
संभव हो सका नदी के बहाने 

नदी तुम इस राख को संभाल कर रखना
यह एक बच्ची की लाश है
जिसे अभी अभी मारा गया है
जन्म देने से पहले

मछलियों से खेलने देना इसे
सबसे चमकदार सीपियां दिखाना
पानी में छपछप सिखाना इसे
इसने जीवन को बस राख भर समझा है।

हो सके तो इस राख में प्राण भर देना
यह अपनी राख से फिर उठेगी
और दुनिया को प्रेम करना सिखाएगी।

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

जेब जितने बड़े आदमी के लिए कविताएं

1) जल्दी लौट आऊंगा

यह कहकर रोज़ निकलता हूं

देर से लौटता हूं रोज़।


ट्रैफिक के नियम एक बच्चे के लिए नहीं बदले जा सकते

नहीं बदली जा सकती बच्चे की महत्वाकांक्षा भी

मैं कैसे बदलूं एक शाम का अपराधबोध में

अनायास बदल जाना।


2) उसके सपनों में शेर दलिया खाते हैं

वो चिड़ियों से घंटों बातें करता है 

उसे लगता है उसके पिता ने जंगल में शार्क छोड़ रखे हैं

ताकि शहर में बच्चे स्कूल जा सकें।

वो गांव और शहर में फर्क नहीं कर सकता

जैसे मां उसके लिए पिता है और 

पिता उसके लिए घोड़ा।


3) ऐसी निर्दोष आँखें है उस बच्चे की

कि वो घंटों निहार सकता है मजदूर को मसाला मिलाते

उसे छेनी हथौड़ी पेचकस लगते हैं दिलकश

उसे बुलडोजर देखकर लगता है

नींद से थोड़ी देर पहले

देवता अपनी लीला करते हैं


4) विद्या क्या है?

यह पूछने पर उसने बताया डांस करना

फिर कहा सोचकर गूगल

इसके बाद मुझे पूछने की इच्छा नहीं हुई

विद्या की देवी कौन है?


5) घर इसलिए घर है

कि घर के भीतर जो सबसे छोटा है

उसकी सबसे अधिक कद्र है

बाहर निकलकर देखिए

छोटे आदमी के लिए

दुनिया कितनी मुश्किल है।


6) उसे लगता ही नहीं वो छोटा है

मेरे खड़ा होने पर वो मेरी जेब जितना बड़ा है

बैठ जाने पर छाती जितना

थोड़ा और बड़ा कैसे होगे?

वो कहता है

मशीन में डालकर बड़ा हो जाऊंगा जल्दी।


निखिल आनंद गिरि

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

देहभाषा

यह बात किसी शास्त्र में लिखी तो नहीं

मगर तय है कि

किसी भी सफ़ल हत्या के पीछे

एक पुरुष का हाथ ज़रूर होता है।

वह किसी भी शक्ल में तुम्हारे पास आ सकता है

भाई, मित्र, छात्र या राष्ट्र का प्रमुख भी।


जब कोई हत्यारा आए तो उसे

तत्काल क्षमा कर दो

न लिंग, न आयु, न जाति, न धर्म

किसी भी भेदभाव से मत देखो उसे

लंबी उम्र की कामना करो।


वह बेहद उग्र दिख रहा हो तो भी

कोशिश रहे कि कुछ देर शांत हो सके।

उन बेहद नाज़ुक मौन क्षणों में संभव है

वह हत्या से पहले भी

थोड़ा सा मुस्कुराना सीख जाए

उसके भीतर करुणा जगे

या ग्लानि भी।


हो सकता है वो हत्या का आदी नहीं हो

अब तक सिर्फ गाड़ी के शीशे तोड़ना

गालियां बकना और गर्व से भर जाना ही सीखा हो।

उन बेहद नाज़ुक क्षणों में संभव है

वह तुम्हारे पास गलती से भेजा गया हो

और वो पश्चाताप से भर जाए

कि तुमने उसे पहली हत्या करने से बचा लिया।


हो सके तो हत्यारे से मुस्कुराते हुए कहो

कि हत्या सिर्फ शरीर की हो सकती है

विचारों की नहीं

इसीलिए अधूरी हत्याओं के सभ्य इतिहास में

क्यूं अपना नाम दर्ज़ करना?

उसका इरादा बदल जाए तो

इसे जीतने की तरह नहीं, 

जिम्मेदारी की तरह देखना।


उसने यदि अब तक सिर्फ सूखा गर्व करना सीखा हो

तो ऐसे में उसे पानी ज़रूर पूछना।

तुम्हारी हत्या के बाद भी संभव है

तुम्हारा दिया हुआ पानी

उसके भीतर का सूखा ख़त्म कर डाले

और एक हत्यारे की आंखों में उतर आए।


निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्रेम ऋण

क़र्ज़दार हूं उन आंखों का

जिन्हें सिर्फ़ सुन्दर दिखा।


एक लड़की जिसने प्रेम में 

मेरे हर अक्षर को वाक्य समझा 

और हर वाक्य को महाकाव्य

मेरी हर मौन उदासी में रोई

मेरे एहसास के साथ ही सोई

यह भरम ही सही जीवन का

मेरे होने से ही उसका जीवन है।


निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

प्रश्न

क्या इस पृथ्वी पर एक भी ऐसा देश नहीं

जहां सब घड़ियों में अच्छा समय हो

क्या नहीं कोई ऐसी नदी

जहां मछलियां एक दूसरे का भोजन नहीं बनतीं


क्या मेरे पास एक भी ऐसी कविता नहीं

जिसे कोई उदास औरत अपने अकेलेपन में गुनगुना सके

क्या नहीं कोई एक भी पंक्ति

जिसे बच्चे को लोरी की तरह सुना सकें माएं

या एक भी ऐसा शब्द जिससे

हिंसा दूर दूर तक न झलकती हो


क्या नहीं मेरे पास कोई एक भी याद

जिसे प्रलय के समय मुस्कुराते हुए जेब से निकालूं

या एक भी यात्रा नहीं बची मेरे पास

जिसमें बिछड़ने का दृश्य विचलित न करे।


कहां से लाऊं, कहां को जाऊं।


निखिल आनंद गिरि

रविवार, 28 दिसंबर 2025

रेडियो पर लाइव कमेंट्री के दौरान क्या करें और क्या नहीं


पटना सिख धर्म के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की धरती है। उनकी जयंती पर तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में कई वर्षों से भव्य प्रकाश पर्व आयोजित होता है।
संयोग देखिए कि बिहार आए दो ही बरस हुए हैं और इस बार  27 दिसंबर 2025 को आकाशवाणी (All India Radio) की तरफ से कीर्तन दरबार की लाइव कमेंट्री करने का मौक़ा मिला। दुनिया भर में news on air app के ज़रिए इस कार्यक्रम को सुना जाता है। 15- 20 सालों से रेडियो पर कार्यक्रम वगैरह करने का मौका मिलता रहा मगर पहली बार लगा कि जीवंत प्रसारण करना कितना चुनौती भरा और दिलचस्प अनुभव है। 
अगर मैं कहूं कि पटना आया नहीं हूं, मुझे गुरु गोबिंद सिंह जी ने बुलाया है तो क्या गलत होगा। 
ये पोस्ट इसीलिए भी ज़रूरी है कि कोई मीडिया का नया छात्र पढ़कर सीख सके कि लाइव कमेंट्री करने के दौरान क्या क्या चुनौतियां आ सकती हैं। 
- मौसम के हिसाब से अपने गले का ध्यान रखें। सारा खेल आपके गले से निकली साफ़ आवाज़ का ही है। थोड़ा गरम पानी साथ रखने से मुश्किल कम हो सकती है।
- जिस विषय पर भी बोलना हो, उसके बारे में थोड़े थोड़े नोट्स तैयार कर लें। पत्रकारिता में जिसे हम 5W 1H फॉर्मूला कहते हैं, उसका पालन यहां भी काम आता है। उदाहरण के तौर पर सिख समुदाय के बारे में किसी गैर - सिख की जानकारी आम तौर पर कम ही होगी और प्रसारण लाइव होता है तो संभव है कि बिना तैयारी के या कम जानकारी के आप माइक पर अटकेंगे।
- चूंकि ये एक धार्मिक आयोजन था, तो ध्यान रखना पड़ा कि कोई भी शब्द किसी को आहत करने वाला न हो और सिख धर्म की मर्यादा के अनुकूल हो। जैसे लंगर खाया की जगह लंगर छका या भीड़ की जगह संगत या श्रद्धालु।
- ज़रूरी नहीं कि कोई बंद कैबिन वाला कमेंट्री बॉक्स ही आपके पहले लाइव कमेंट्री प्रसारण के लिए मिले। हमें भव्य दीवान हॉल में चल रहे कीर्तन दरबार में संगत के बीच ही बैठने की जगह मिली जहां रागी जत्था के कीर्तन की आवाज़ और हजारों श्रद्धालुओं के जयकारे सब हमारी आवाज़ के साथ ही सुनाई पड़ रहे थे। तो ऐसे में आपको अपनी आवाज़ तेज़ भी रखनी है, माहौल पर नज़र भी रखनी है और ये भी देखना है कि कीर्तन के लिए अगला जत्था जब जाए तो सही वक्त पर उनके सही नाम लेकर रुकना भी है।
- रेडियो पर बोलने का मतलब ये भी है कि आपके बोलने को सही से प्रसारित करने के लिए तकनीकी टीम भी साथ होगी। तो उनके साथ भी आंखों का तालमेल बनाए रखना है कि कब बोलना शुरू करना है और कब ख़त्म।
वाहे गुरु।


निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

तेज़ आंच पर पाकिस्तान मीट मसाला डालकर दस सीटी में तैयार हुई देशभक्ति थाली है धुरंधर

OTT दौर की फिल्मों और मसाला वेबसीरीज़ों ने भारत सरकार के देशभक्ति वाले मिशन को इस कदर प्रभावित किया है कि इस दौर की देशभक्ति भी सस्ता प्रोपेगैंडा नज़र आती हैं। ताज़ा उदाहरण है "धुरंधर।"

अगर आपने मिर्ज़ापुर देखी हो तो एक बड़े पतीले में मिर्ज़ापुर की नकली बंदूकों वाले किस्से मिलाइए, गद्दी कौन संभालेगा की बहस स्वादानुसार डालिए। ऊपर से गैंग्स ऑफ वासेपुर भी छिड़क दीजिए। विश्वगुरु भारत का डिफेंस मास्टरप्लान थोड़ी देर में पककर दर्शकों को परोसने के लिए तैयार है।

इस फिल्म ने हाल में सोशल मीडिया पर इतना शोर मचाया है कि लगा इसे नहीं देखना देशद्रोह में न शामिल मान लिया जाए। लेकिन अगर आपने अब तक इसे नहीं देखा है तो बेहतर है किसी और बेहतर फिल्म का इंतज़ार कर लें। कांधार विमान अपहरण से शुरू होते हुए फिल्म इतनी लंबी और उबाऊ होती जाएगी कि आप विमान में बैठकर दिल्ली से कोलंबो पहुंच सकते हैं।

फिर भी अगर आपको फिल्म देखनी ही है तो ये बता देना ज़रूरी है कि आप नाश्ते से लंच तक का इंतज़ाम अपने साथ रखें और बच्चों को पड़ोसी के यहां रखकर जाएं। इतना खून बुरी तरह बहाया जाएगा कि कमज़ोर दिलवाले जेन ज़ी के लड़के भी आँखें बंद कर के कई दृश्य देख पाएंगे।

अगर आप अब भी कहानी जानने की इच्छा रखते हैं तो देश के लिए वो भी बता देना ज़रूरी है। कहानी में भारत की सुरक्षा एजेंसी का एक ख़ास मिशन धुरंधर है जो एक ऐसा NIA चीफ तैयार करता है जो सरकारें और दशक बदलने के बावजूद चीफ बना रहता है।

चूंकि भारत की सुरक्षा का सवाल है तो बिना पाकिस्तान और मुसलमान की फ़ज़ीहत किए बिना बन ही नहीं सकता। तो अब चलिए पाकिस्तान और कराची का टूरिस्ट पैकेज लीजिए। वहां के लोकल गुंडे कब बड़े आतंकवादी बन जाएं, पता नहीं, लेकिन लगभग हर गुंडा सड़कछाप गालियां बकता है, होमोसेक्सुअल भी है।

"हिंदू बहुत डरपोक कौम है।" "हिंदुस्तानियों के सबसे बड़े दुश्मन हिंदुस्तानी हैं, पाकिस्तान दूसरे नंबर पर आता है" इस तरह के डायलॉग बोलकर फिल्म के पात्र आपके भीतर आक्रोश का प्रतिशत बढ़ाने की पूरी कोशिश करेंगे मगर आपने घबराना नहीं है।

फिल्म में कुछ रोमांस भी है। तो रणबीर सिंह जो एक गुंडे का सबसे छोटा प्यादा है, उसको सीधा विधायक की बेटी से प्यार हो जाता है। फिर वो बाइक पर घूमेंगे, लड़की इंप्रेस हो जाएगी। पेट्रोल झूठमूठ का ख़त्म हो जाएगा। दोनों पैदल घर तक आयेंगे। लड़की और इंप्रेस हो जाएगी। पाकिस्तान की सड़कें इतनी अच्छी और पुलिस इतनी ख़ाली है कि सब इन दोनों आशिकों को शहर भर में दौड़ाएंगी, पकड़ नहीं पाएंगी।

फिर कहानी में संजय दत्त को भी आना है। अक्षय खन्ना की इतनी तारीफ मैंने पिछले बीस साल में नहीं सुनी, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं है जो "दिल चाहता है" से बेहतर हो। इतने बड़े गुंडे (आतंकवादी) और इतने लोकल टाइप मारपीट के सीक्वेंस है कि लगेगा वो भारत के खिलाफ नहीं दो पीस चिकन के लिए लड़ रहे हैं।

इसके बाद फिल्म मे कुछ बचता है तो वो अच्छा भी है। संसद पर हमला, मुंबई में ताज हमला और इन सबके पीछे के कनेक्शन समझाने की कोशिश पहली बार किसी फिल्म में एक साथ दिखी है।

एक पुराने और अनुभवी दर्शक की तरह कहूं तो इसे वेबसीरीज़ ही बनाने की योजना रही होगी जो अचानक से फिल्म बना दी गई, इसीलिए ज़्यादा बोरियत हुई वरना फिल्म के सभी मसाले मौजूद हैं। फिल्म एक बार शुरू होगी तो ख़त्म ही नहीं होगी। और जब ख़त्म होगी तो कहानी किसी वेबसीरीज़ की तरह अगले भाग का ऐलान भी करेगी।

निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

चार दिसंबर की चिट्ठी

जनवरी को नहीं होना था ऐसा

कि ठंड में एम्स की पर्ची कटानी पड़े

कोहरा सिर्फ शहर में ही नहीं

जीवन में प्रवेश कर जाए।


फरवरी में डॉक्टर बताए कि

नहीं बची है उम्मीद साल पूरा कर पाने की

बसन्त की आहट से लगे डर

और मार्च की एक दोपहर


हम तय कर रहे हों कि

कीमो के लिए सरकारी बेहतर या प्राइवेट

अप्रैल में जब शुरू हो इलाज

क़र्ज़ या मदद तो छोड़िए

मिलने जुलने से भी कतराने लगे परिवार समाज

दवाई की कड़वाहट और हर तरफ़ अवसाद


मई में भी नहीं किसी अच्छे दिन की याद

जून में सिर्फ शरीर रह गया सूख कर

आत्मा इलाज में निचोड़ दी गई


जुलाई अगस्त तक याद हो गई दिनचर्या

पहले कीमो चढ़ेगा

फिर बारिश आयेगी

फिर बुखार आयेगा

फिर सांत्वना के लिए लोग

फिर कड़वी दवाएं

और यही अंतहीन चक्र चलता रहेगा


सितंबर तक सीख चुकी बेटी

बिना खाए हंसना

और बिना रोए जीना


अक्टूबर में छूट गई नवंबर की तैयारी

वेटिंग की टिकट और गांव लौटने की मारामारी

अब तो यह भी याद नहीं

कि आखिरी बार किस नवंबर माथा टेका था

खरना में हमने एक साथ।

कब लड़े थे कि कितने बजे ठेकुआ प्रसाद बनना शुरू होगा


हमारे दिसंबर में एक दिन मुस्कुराता था

तब भी और अब भी

यह उसी तारीख का एक ख़त है तुम्हारे नाम


ये अभिशप्त चिट्ठी ख़ुद ही लिखनी है

और ख़ुद ही पढ़नी है सैंकड़ों बार


काश इस चिट्ठी को उम्मीद के साथ ख़त्म किया जा सकता था -

विशेष मिलने पर।



निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

एक पीठासीन अधिकारी की डायरी

इस मतदाता की उम्र 22 साल थी!!








"इस मुल्क ने जिस शख्स को जो काम था सौंपा
उस शख्स ने उस काम की मां..च इस जला कर छोड़ दी"

अख़बार में बिहार में बंपर वोटिंग की ख़बरों के बीच कहीं भी नहीं पढ़ा कि मतदान अधिकारियों ने सबसे ख़राब व्यवस्था में भी सबसे बेहतर काम किया।
एक पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) के तौर पर चुनाव की ड्यूटी लगने से लेकर ईवीएम जमा करने की पूरी प्रक्रिया इतनी यातनाओं (torture) से भरी है कि बताने लगूं तो देशद्रोह का मुकदमा चल जाए।
चुनाव आयोग को एक फीडबैक फॉर्म भी दिया जाना चाहिए जिससे सभी अधिकारी अपनी व्यथा लिखें और अगले चुनाव में उसको सुधारने की कोशिश हो (जिसकी उम्मीद दिखती नहीं)
पटना के अटल पथ, मरीन ड्राइव, बेली रोड की चकमक छोड़ कर मात्र 30/40 किलोमीटर दूर एक और पटना है जहां मीडिया वालों को भी मतदान कर्मियों की गाड़ी में सवार होकर ज़रूर आना चाहिए। 
जिस गाड़ी में ईवीएम और तमाम मशीनें लदी होती हैं, वो गाय भैंस और सामान लादने वाले टेम्पो होते हैं। उसमें खड़े खड़े सफ़र करके ऊबड़ खाबड़ रास्तों से पहुंचते हुए शाम हो जाती है और तब पता चलता है कि बूथ में बिजली ही नहीं है। नहीं है और दो तीन घंटे नहीं है। अंधेरे में जो बूथ लेवल अफसर के ज़रिए भेजा गया सफाई कर्मी है, सुबह पता चलता है कि वही आपका पोलिंग एजेंट है।
सोचिए मतदान कर्मियों के दल के साथ चार सीआरपीएफ के जवान के अलावा बिहार पुलिस हमें क्या देती है। दो महिला (कॉलेज से निकली under ट्रेनिंग) ट्रेनी (होम गार्ड) सिपाही जिन्हें बंदूक उठाकर अभी सिर्फ मॉर्निंग वाली कसरत करना आता है।
हमारी छोड़िए, पूरी रात वो लड़कियां उस बीहड़ में किस डर से अपनी रक्षा कर पाती हों, उन्हीं से पूछना चाहिए।
खाने पीने की व्यवस्था के नाम पर "पार्टी" के दलाल पूड़ी सब्ज़ी, चावल दाल बांटते हैं और उम्मीद करते हैं कि दो चार वोट गिराने दे दिया जाए। शुक्र है कि अनुरोध ही किया, दबंग होते तो हम क्या ही कर लेते। कहते भईया, ईवीएम तुम्हारी है, डायरी तुम्हीं लिख दो, हम A N कॉलेज छोड़ आयेंगे भैंसा गाड़ी में।
 ख़ैर, चुनाव ख़त्म होने पर हालत और बुरी। व्यवस्था ऐसी होती कि जो अधिकारी रिज़र्व में रखे जाते हैं, उन्हें नियत समय पर ईवीएम और बाकी मशीनों के कलेक्शन के लिए लगा दिया जाता। सोचिए, बिना ठीक से खाए लिए, नहाए धोए सुबह 4 बजे से जगा मतदान कर्मी शाम 6 बजे चुनाव ख़त्म करे, फिर तीन घंटे की दर्द भरी यात्रा करके A N कॉलेज के कलेक्शन सेंटर पहुंचे और ट्रैफिक व्यवस्था ऐसी कि कॉलेज से आधे किलोमीटर दूर से आगे बढ़ने में दो घंटा लग जाए। इससे बढ़िया तो पूरा रस्ता ही ब्लॉक करके अलग अलग प्रखंडों के स्टॉल लगा देते।
रात के 10 बजे पहुंच गए तो अब 50 ठो फॉर्म और लिफाफा ढूंढते रहिए स्टॉल पर। मोमबत्ती जलाइए, सील करिए। एक कागज़ कम निकले तो फिर ज़ीरो से शुरू कीजिए। मने डिजिटल इंडिया वाला विश्वगुरु भारत सिर्फ रील बनाने के लिए है।
कई चीज़ें इसमें आसान की जा सकती हैं। लेकिन सुनता कौन है। हम लोग जिस काम में प्रशासन की ज़्यादा मदद कर सकते हैं, वहां नौसिखिया बिठा रखे हैं।
ख़ैर, एक फिल्म का डायलॉग याद आ गया - देश के लिए इतना भी नहीं करोगे।
(गंगा किनारे दियारा से एक भुक्तभोगी पीठासीन अधिकारी जिसकी पीठ पर अगले पांच साल की गुंडई का ठेका लदा हुआ है।)

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

पायल की झंकार

नंगे, दबे पाँव, धीरे से आई तेरी रहगुज़र में मैं
...उस डिबिया में बंद मैली कुचैली सी पड़ी थी मैं
जब बिटिया ने मुझे प्यार से उठाया,
सजाया खुद पर और मैं दमकने लगी

फिर हम दोनों, तेरे आलते से सजाए पाँवों से,
दौड़ते, भागते, हँसते, गाते, हाँफते,
छनछनाते घूमते रहे,
गूँज बनकर चहकते हुए 
तेरे आँगन में, कमरों में,
रसोईघर में और अनंत सी उस छत पर 

चिड़ई सी उड़ान भरते, उछलते, कूदते, फांदते , 
तुझ तक पहुंचने की जिद लिए उचकते 
..फिर बचपना छोड़ 
तेरी परिक्रमा करते...
कभी तुझे प्यार से निहारते,
कभी नोक झोंक करते,
तो कभी अपने बचपने पर 
तेरी डाँट-डपट खाते।

यह सब तेरे क़रीब आने की
तरकीब नहीं तो और क्या है

निखिल आनंद गिरि

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

अलिफ़ की तरह हूं, बिल्कुल अकेला

वो कहने को तो अनजाने बहुत हैं
मगर उनसे जुड़े अफ़साने बहुत हैं।

शहर ये नींद से जागे तो कैसे
तुम्हारे शहर में मयखाने बहुत हैं।

कभी छलकी, कभी पलकें बिछाई
तुम्हारे प्यार के पैमाने बहुत हैं।

शहर में शोर हैं, चीखें मुसलसल
हमारी छत पे वीराने बहुत हैं।

मुझे मालूम है अपनी हकीक़त 
शीशे मेरे सिरहाने बहुत हैं।

अलिफ़ की तरह, हूं बिल्कुल अकेला
शहर में यूं तो याराने बहुत हैं।

निखिल आनंद गिरि

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

मैं बुरा था जब तलक ज़िंदा रहा

आईने ने जब से ठुकराया मुझे
हर कोई पुतला नज़र आया मुझे।

रौशनी ने कर दिया था बदगुमा,
शाम तक सूरज ने भरमाया मुझे।

ऊबती सुबहों के सच मालूम था,
रात भर ख़्वाबों ने बहलाया मुझे।

मैं बुरा था, जब तलक ज़िंदा रहा
' अच्छा था ' ये कहके दफ़नाया मुझे।

जब शहर के शोर ने पागल किया
खिलखिलाता चांद याद आया मुझे।

ख़्वाब टूटे, एक टुकड़ा चुभ गया
देर तक नज़्मों ने सहलाया मुझे।

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

कीमोथेरेपी: शोक और यथार्थ

कवि मित्र अंचित ने जर्नल इंद्रधनुष पर कुछ दिन पहले मेरी कुछ कविताएं पोस्ट की थीं जिस पर एक सुधी पाठिका की विस्तृत टिप्पणी आई है।

कीमोथेरेपी: शोक और यथार्थ 
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‘कीमोथेरेपी’ कविता महज़ एक बीमारी का बयान नहीं है; यह आधुनिक चिकित्सा-व्यवस्था के भीतर जीवन-मृत्यु की विडंबनाओं को उजागर करती है। कवि अस्पताल की उस ‘आराम कुर्सी’ को दिखाता है, जो विडंबना से भरी है—
“यह आराम कुर्सी है जहाँ / न मन को आराम है, न तन को।”
इस कुर्सी पर बैठकर जीवन को बनाए रखने के लिए शरीर में ‘ज़हर’ चढ़ाया जाता है। बीमारी एक मेडिकल शब्द से ज़्यादा, परिवारों के लिए आर्थिक बोझ और मानसिक यातना का प्रतीक बन जाती है। कवि मृत्यु को कोई रहस्यमय या पौराणिक शक्ति नहीं बनाता, बल्कि एक सामाजिक यथार्थ के रूप में देखता है, जहाँ रिश्तेदार ‘लाइन में खड़े खड़े आँसू छिपाते हैं’। यह यथार्थबोध कविता को निजी अनुभव से निकालकर सार्वभौमिक पीड़ा का रूप देता है।

इन कविताओं का केंद्र कवि की पत्नी की बीमारी और मृत्यु है। लेकिन कवि का स्वर विलापपूर्ण होकर भी आत्मदया में नहीं फँसता। शोक की भाषा यहाँ दार्शनिकता में बदलती है—
“मृत्यु बुद्ध हो जाना है / रोना, कलपना, मिलना बिछड़ना / सब छोड़ शुद्ध हो जाना है।”
यहाँ मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि एक गहन बोध का क्षण बनती है। कवि शोक के माध्यम से जीवन की क्षणभंगुरता को रेखांकित करता है। ‘प्रेतशिला’ जैसी कविता तो मृत्यु से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं पर भी प्रकाश डालती है: कैसे लोग प्रियजनों को विदा देने के बाद भी आंसुओं की सीढ़ियों से बार-बार लौटते हैं।

स्मृतियाँ इन कविताओं में सिर्फ़ यादें नहीं, बल्कि जीवित अनुभव हैं, जो वर्तमान को ढक देती हैं।
“नहीं गई शहर बदलकर भी /कहां कहां नहीं गया मैं / नहीं गईं तो नहीं ही गईं स्मृतियां।”
कवि मई के महीने को दिसंबर तक अपने साथ ढोता है; स्मृतियाँ इतनी ठोस हो जाती हैं कि वे सालों के कैलेंडर को स्थगित कर देती हैं। यह शोक की लंबी यात्रा का सटीक चित्रण है।

निखिल आनंद गिरि की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है—सीधी, बोलचाल की भाषा। इनमें कोई जटिल प्रतीकवाद नहीं, बल्कि जीवन के सीधे अनुभव हैं, जो आत्मीयता और तीखेपन से पाठक को छूते हैं। कवि का शिल्प लघुकथा-सदृश है; कई कविताएँ छोटी-छोटी घटनाओं और संवादों से बनती हैं।
उदाहरण के लिए, ‘आखिरी मुलाकात’ कविता में छोटे-छोटे दृश्य—टोटो पर सफर, महंगे फल, पैसेंजर ट्रेन का ज़िक्र—मृत्यु के क्षण को बहुत ही सामान्य बनाते हैं, जिससे उसका प्रभाव और गहरा हो जाता है।
कवि स्मृतियों को बिंबों में ढालता है—“अब मैं अपनी आंखों में हरदम एक नदी रखूंगा”—यहाँ नदी सिर्फ़ पानी का प्रवाह नहीं, शोक का अनंत विस्तार बन जाती है।

कवि निजी शोक में डूबकर भी सामाजिक यथार्थ को दर्ज करना नहीं भूलता। “सरकारें पलक झपकते बदलीं/ एक और नया कथावाचक मिला हिंदुओं को/ गोलियाँ चली गाय के नाम पर” जैसी पंक्तियाँ दिखाती हैं कि जीवन और मृत्यु की व्यक्तिगत कहानियाँ भी समाज और राजनीति से अलग नहीं हैं। अस्पतालों की व्यवस्था, बीमा कंपनियाँ, लॉकडाउन, महंगाई—ये सब कविताओं के पीछे चलती दुनिया को जीवंत बनाते हैं।

इन कविताओं की ताकत यह है कि वे असाधारण त्रासदी को सामान्य जीवन के टुकड़ों में बुनती हैं। पत्नी की बीमारी के बीच कवि चार साल की बेटी का ‘बासी भात और चिप्स’ खाकर इंतज़ार करना याद करता है; यह दृश्य पाठक को असहाय कर देता है। यहाँ कोई कृत्रिम करुणा नहीं, बल्कि सहज जीवन-दृश्य हैं।

कविता का लहजा सीधा, आत्मीय और संवादात्मक है। कवि पाठक से जैसे अपनी कहानी कह रहा हो। उदाहरण:
“प्रिय दुनिया, बहुत दिनों तक भुलाए रखने का शुक्रिया!”
यह आत्मालाप है, जो कविता को गद्य की तरह सहज बनाता है, लेकिन भावनाओं का घनत्व कविता की शक्ति बनाए रखता है।

इन कविताओं में केवल बीमारी का डर नहीं, बल्कि समय से फिसलते जाने का अहसास है।
“समय केले का छिलका है / फिसल रहे हैं हम सब।”
यह रूपक आधुनिक जीवन की अस्थिरता को बहुत सहज ढंग से पकड़ लेता है। कवि खुद को चौकीदार, भिक्षुक, या टैंपर्ड ग्लास की तरह प्रस्तुत करता है—यह आत्मचित्रण कविताओं को और गहरा बनाता है।

कविता में बच्चों का ज़िक्र बार-बार आता है। बीमारी और मृत्यु के बीच कवि की सबसे बड़ी चिंता यही है कि बच्चे क्या महसूस करेंगे, वे किस दुनिया में बड़े होंगे। “बच्चों के लिए क्या है दुनिया / सिवाय प्लेस्कूल के” जैसी पंक्ति में यह चिंता बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त होती है।

निखिल आनंद गिरि की कविताएँ मृत्यु को किसी रहस्यमयी छाया की तरह नहीं, बल्कि एक ठोस यथार्थ के रूप में देखती हैं। वह मृत्यु से संवाद करता है, सवाल पूछता है:
“क्या मृत्यु ग़लत नहीं होती कभी!”
यह प्रश्न मृत्यु को भी मानवीय संदर्भ में खड़ा कर देता है। कवि मृत्यु को शुद्धता, बुद्धत्व और विराम का प्रतीक मानता है, लेकिन उससे भावनात्मक प्रतिरोध भी करता है।

‘प्रेतशिला’ कविता केवल व्यक्तिगत शोक नहीं, बल्कि भारतीय मृत्यु-परंपराओं का दार्शनिक चित्रण है। गया की सीढ़ियाँ, रोते हुए परिजन, मुक्ति की खोज—ये सब इस कविता को भारतीय समाज और संस्कृति से गहराई से जोड़ते हैं। यह कवि के निजी अनुभव को सामूहिक सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बना देती है।

संग्रह के अंत में छोटी कविताएँ हैं, जो कम शब्दों में गहरा असर छोड़ती हैं। जैसे:
“बीमारियां सब बुरी मगर सबसे बुरी वो जो पिता को हो।”
या
“लाख चाहता हूं कि तुमसे अलग करूं ख़ुद को, लेकिन तुम जैसे मेरे घुटनों का काला धब्बा।”
ये पंक्तियाँ भावनाओं को संक्षिप्त, मगर तीखे ढंग से व्यक्त करती हैं।

यह संग्रह बीमारी और मृत्यु पर कवि की निजी डायरी जैसा लगता है, लेकिन इसका असर व्यक्तिगत से बहुत आगे जाता है। कवि का ईमानदार आत्मकथ्य, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ, पारिवारिक बिखराव और बच्चों के प्रति संवेदनशील दृष्टि इसे समकालीन हिंदी कविता में एक अनोखी आवाज़ बनाते हैं। इसमें कोई काव्यिक अलंकरण नहीं, लेकिन सहज भाषा में संवेदनाओं की गहराई पाठक को अंदर तक छू लेती है।

समकालीन हिंदी कविता में बीमारी और शोक पर लिखना आसान नहीं, क्योंकि यह विषय भावुकता में डूब सकता है। लेकिन निखिल आनंद गिरि की ताकत यही है कि वे भावुकता से बचते हुए करुणा को यथार्थ में बदल देते हैं। यह कविता उन सभी पाठकों को जोड़ती है जिन्होंने किसी प्रियजन को बीमारी और मृत्यु में खोया है।

‘कीमोथेरेपी’ और उससे जुड़ी कविताएँ जीवन और मृत्यु के बीच खड़े मनुष्य का सशक्त दस्तावेज़ हैं। यह संग्रह एक साथ निजी डायरी, शोकगीत और सामाजिक बयान बन जाता है। कवि अपने अनुभव को शब्दों में ढालकर मृत्यु को मानवीय बना देता है, और यही इन कविताओं की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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-- रेणु रंजन


निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 9 अगस्त 2025

ग़लत पता

ओ मृत्यु!
तुम क्या किसी गलत द्वार आई थी
हमने तो नहीं बुलाया था तुम्हें
न ही दरवाज़े पर थी किसी दस्तक की आवाज़
दबे पांव कौन आता है संगिनी के भेस में।

अभी तो हम दुख में मुस्कुराना ही सीखे थे
मेरी बच्ची ने अकेलेपन से जीतना शुरू किया था
डॉक्टर उसे सबसे निरीह लगते लगे थे
जब वो देखती उन्हें मूर्तियों के आगे माथा टेक कर
अस्पताल में प्रवेश करते।

अभी तो उसने बोधगया ही देखा था
उड़ता हुआ आख़िरी पत्ता बोधिवृक्ष का
जीवन में उतरना बाक़ी रहा बुद्ध का।

चूहों का एक मंदिर होता है
अभी अभी जाना हमने
दूध पीकर सफेद चूहे कितने विस्मय से देखे उसने

कितने झूले, कितनी नदियां, कितने शहर
अभी घूमना रहा बाक़ी 
एसी के सारे डिब्बे में नहीं चढ़ी अब तक
हवाई जहाज़ बस दूर से देखा था उसने

न रांची के पहाड़ी मंदिर गई
न कोलकाता के दीघा घाट
न सिलीगुड़ी की चहल पहल
न केरल के ठाट।

अभी चिपक कर देखनी थी कई फिल्में
भीगना था किसी अल्हड़ बरसात में
मैगी पर गुज़ारनी थी कुछ बातूनी रातें
डिज़्नीलैंड घूमना था साथ में

फिर किस बहाने
किस कारण
आई तुम?

अगर पता ग़लत हो तो 
लौट आती है बैरन चिट्ठियां
क्या मृत्यु ग़लत नहीं होती कभी!


निखिल आनंद गिरि

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

फ़िक्र

प्रेम से सराबोर मेरी फिक्र 
तेरा पीछा करती रही
दिन, रात, सुबह, शाम
हर घड़ी, हर मौसम
सालों से सदियों तलक..

 शहर दर शहर
घर, गली-कूचे, मोहल्ले
जितने भी तूने बदले

कभी पसीने से लथपथ रास्तों पर
तेरे इंतज़ार में खड़ी रही

तो कभी सर्द हवाओं में
तेरे दरस के  लिए
घर के बाहर ठिठुरती रही

लाख समझाया इस ढीठ को
कि कनु का को बख्श दे..
सुकून से जीने दे उसे..
कई बार तो तेरे शहर से
घसीट कर ला पटका इसे ज़मीन पर
हाथ-पांव बांध दिए और डाल दिया अंधेरी कोठरी में
पर फिर भी...
मेरी ज़ुबां से तेरा ज़िक्र भर सुनकर,
किसी जिन्न की तरह
ये फिर आ खड़ी होती है
खुद को सजा-धजा कर
तेरे पास आने को तैयार।

बेशर्म है ये क्या करूं कनु मैं इसका...
मेरी सुनती ही नहीं।

और सजदे का कोई ऐसा घर नहीं
जहां मुझे न ले गई हो
कहीं नंगे पाँव
तो कहीं सिर्फ़  रूख ओढ़े
...जोड़े रही मुझे परवरदिगार से तेरे नाम की इबादत में।

निखिल आनंद गिरि

ये पोस्ट कुछ ख़ास है

मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया। जो हुआ बस हो गया, उस रात यूं होना नहीं था मैं कहां ...