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रविवार, 24 मई 2026

मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


जो हुआ बस हो गया, उस रात यूं होना नहीं था

मैं कहां आंसू छिपाता, एक भी कोना नहीं था

लौटना था फिर मुझे जीवन भरी लंबी सड़क पर

सो चिता की आग में ख़ुद को पिघलता छोड़ आया।

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


देखने थे साथ मिलकर कितने सावन ज़िंदगी के

चूमने थे छोर साथी, बादलों के और ज़मीं के

हो सके तो माफ़ करना, एक दिन मैं ही अचानक

चार कंधों के सहारे तुमको चलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

और तारों की चमक में भी तुम्हें ही खोजता हूं

क्या रखा है ज़िंदगी की इन हसीं उपलब्धियों में

हार कर तुमको मैं अपनी, सब सफलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 21 मार्च 2026

राख

दुनिया का फ़लसफा किसी किताब ने नहीं
एक मुट्ठी राख ने सिखाया
जब तक सांस रही
वह एक हंसता खेलता शरीर रही।
जब वह राख हुई
तब मुट्ठी भर रह गया वजूद।

मैंने उसे बहाने के लिए नदी चुनी
नदी का इतिहास भी राख ही था।
फिर जब पानी हुई नदी
तो उसमें कई मुट्ठी राख बहती रही।

किसी राजा की राख 
पशु पक्षी की राख 
या किसी प्रेमिका की राख 
सब आंसुओं में लिपटी हुई।

कई मीनारें , स्तंभ, विजय पताकाएं
सभ्यताएं भी राख हुईं 
एक दंभ भरी हंसी का राख होना
संभव हो सका नदी के बहाने 

नदी तुम इस राख को संभाल कर रखना
यह एक बच्ची की लाश है
जिसे अभी अभी मारा गया है
जन्म देने से पहले

मछलियों से खेलने देना इसे
सबसे चमकदार सीपियां दिखाना
पानी में छपछप सिखाना इसे
इसने जीवन को बस राख भर समझा है।

हो सके तो इस राख में प्राण भर देना
यह अपनी राख से फिर उठेगी
और दुनिया को प्रेम करना सिखाएगी।

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्रेम ऋण

क़र्ज़दार हूं उन आंखों का

जिन्हें सिर्फ़ सुन्दर दिखा।


एक लड़की जिसने प्रेम में 

मेरे हर अक्षर को वाक्य समझा 

और हर वाक्य को महाकाव्य

मेरी हर मौन उदासी में रोई

मेरे एहसास के साथ ही सोई

यह भरम ही सही जीवन का

मेरे होने से ही उसका जीवन है।


निखिल आनंद गिरि

ये पोस्ट कुछ ख़ास है

मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया। जो हुआ बस हो गया, उस रात यूं होना नहीं था मैं कहां ...