तुम्हारी देह,
पोंछ सकता मेरी आस्तीन से
तो पोंछ देता...
सर्पिल-सी बांहों के स्पर्श में,
दम घुटने लगा है....
सच जैसा कुछ भी सुनने पर
बेचैन हो जाता है भीतर का आदमी....
जानता हूँ,
कि मेरी उपलब्धियों पर खुश दिखने वाला....
मेरे मुड़ते ही रच देगा नई साजिश...
मैं सब जानता हूँ कि,
आईने के उस तरफ़ का शख्स,
मेरा कभी नही हो सकता....
रात के सन्नाटे में,
कुछ बीती हुई साँसों की गर्माहट,
मुझे पिघलाने लगती है....
मेरे होठों पर एक मैली-सी छुअन,
मेरी नसों में एक बोझिल-सा उन्माद,
तैरने लगता है...
तुम, जिसे मैं दुनिया का
इकलौता सच समझता था,
उस एक पल सबसे बड़ा छल लगती हो....
मुझे सबसे घिन्न आती है,
अपने चेहरे से भी.....
धो रहा हूँ अपना चेहरा,
रिस रहे हैं मेरे गुनाह...
चेहरा सूखे तो,
बैठूं कहीं कोने में...
और लिख डालूँ,
अपनी सबसे उदास कविता....
निखिल आनंद गिरि
Subscribe to आपबीती...
physical relation लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
physical relation लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
ये पोस्ट कुछ ख़ास है
जेब जितने बड़े आदमी के लिए कविताएं
1) जल्दी लौट आऊंगा यह कहकर रोज़ निकलता हूं देर से लौटता हूं रोज़। ट्रैफिक के नियम एक बच्चे के लिए नहीं बदले जा सकते नहीं बदली जा सकती बच्चे ...
-
कौ न कहता है कि बालेश्वर यादव गुज़र गए....बलेसर अब जाके ज़िंदा हुए हैं....इतना ज़िंदा कभी नहीं थे मन में जितना अब हैं....मन करता है रोज़ ...
-
छ ठ के मौके पर बिहार के समस्तीपुर से दिल्ली लौटते वक्त इस बार जयपुर वाली ट्रेन में रिज़र्वेशन मिली जो दिल्ली होकर गुज़रती है। मालूम पड़...
-
कवि मित्र अंचित ने जर्नल इंद्रधनुष पर कुछ दिन पहले मेरी कुछ कविताएं पोस्ट की थीं जिस पर एक सुधी पाठिका की विस्तृत टिप्पणी आई है। कीमोथेरेपी...