शुक्रवार, 24 जुलाई 2026
बुधवार, 22 जुलाई 2026
उज्ज्वल रहे बिहार
आमुख -
दिख रही है दूर से तस्वीर धुंधली
लग रहा है सांवला आकार मेरा
कह रहे हैं लोग सौ बातें मगर
पास आकर देखिए व्यवहार मेरा
कविता -
अ से हुए अशोक जहां पर, ज्ञ से उपजा ज्ञान
उस बिहार का दुनिया भर में होता रहे गुणगान।
मिथिला की माटी में खुशबू भरी मखाने वाली
लोकतंत्र की जननी, जिसका नाम अमर वैशाली
कण कण में इतिहास बसा है, मन मन में सम्मान।
उस बिहार का दुनिया भर में होता रहे गुणगान।
मधुबनी की चित्रकला और विद्यापति के गीत
बिस्मिल्लाह की शहनाई से उपजा यहीं संगीत
हुए भिखारी ठाकुर जैसे नाटककार महान
उस बिहार का दुनिया भर में होता रहे गुणगान।
सोनपुर के मेले में, जन जन पशु धन शामिल है
जहां ढला है सूरज तब भी पूजा के काबिल है
जहां दधीचि और कर्ण ने किया सर्वस्व का दान
उस बिहार का दुनिया भर में होता रहे गुणगान।
जहां गांधी के चरण पड़े तो चंपारण लहराया
इसी भूमि से प्रथम नागरिक भारत को मिल पाया
कुंवर सिंह, जेपी, कर्पूरी जननायक हैं शान
उस बिहार का दुनिया भर में होता रहे गुणगान।
महावीर की जन्मभूमि यह, बुद्ध की अमर कहानी
बचपन में यहीं गोबिंद सिंह ने सीखी थी गुरबानी
आठ पहर हों मधुर आरती, पांचों पहर अज़ान
उस बिहार का दुनिया भर में होता रहे गुणगान।
हम गिरमिटिया, जहां गए हैं, उस बंजर को तराशा
हम अतीत का स्वर्णिम पन्ना, हम भविष्य की आशा
हम नवीन भारत के शिल्पी, भरें विश्व में प्राण
उस बिहार का दुनिया भर में होता रहे गुणगान।
धन्यवाद
बुधवार, 8 जुलाई 2026
"सतलुज" फिल्म के बहाने
"यहां गोली मार देने के लिए
ये ज़रूरी नहीं कि आपका झगड़ा हो
इतनी वजह काफ़ी है कि
आपके पास बंदूक है"
मुझे लगता है कि हमारी सरकार हमें "सतलुज" फिल्म के बारे में चर्चा करने के लिए उकसाना चाहती थी, इसीलिए ban कर दिया। उसका धन्यवाद।
ऐसा बैन गजब है, जिसमें सरकार को लगता है "सब चंगा सी" और यहां हर कोई फिल्म देखने के बाद ही बात कर रहा है।
मुझे इस फिल्म पर कुछ नहीं कहना है। ये सिर्फ पंजाब पुलिस की कहानी नहीं है। एक पुलिसवाले के घर में मेरी परवरिश हुई है, बिहार - झारखंड के कई थानों में बचपन गुज़रा है। उल्टा लटका के मार खाते लोग मेरी यादों का हिस्सा हैं। कोई केपीएस गिल या सुग्गा या बिट्टा नहीं, हजारों की तनख़ाह वाले मामूली सिपाही भी वर्दी पहनकर बिना किसी आदेश के घंटों मार सकते हैं। और कोई "आदेश" आ जाए तो फिर कहना ही क्या।
एक घटना याद है, जिसमें मधुबनी के एक थाने में दो अभियुक्तों को एक दूसरे के मुंह में पेशाब करवा दिया था कि सच बोल दें।
चाईबासा में एक बार एक एसपी की गाड़ी के बगल से एक ट्रक थोड़ा सट कर गुज़र गया था तो तुरंत सूचना मिलने पर, अगले थाने पर, जहां मेरा बचपन था, उस ड्राइवर की ऐसी कुटाई हुई कि मेरा कभी एसपी बनने का मन नहीं हुआ। जो थाना प्रभारी थे, बाद में नक्सली हमले में शहीद हुए।
मुझे लगता है समस्या पुलिस की ट्रेनिंग में है। अगर वर्दी पहनकर आपको मानवाधिकार नहीं समझ आता तो फिर कितने भी कार्यकर्ता मिलकर सिस्टम को ठीक नहीं कर सकते। छोटे से बड़े स्तर के सभी पुलिस अधिकारियों को ह्यूमन राइट्स की पढ़ाई और प्रैक्टिकल अच्छे से करवाया जाना चाहिए।
सिर्फ पुलिस ही क्यों, हर पेशे में ये सॉफ्ट स्किल्स बहुत ज़रूरी हैं। वरना क्या मजाल कि पोस्टमार्टम के लिए खड़ी डॉक्टर के सामने से कोई निर्दयी पुलिसवाला तड़पता शरीर खींच कर ले जाए और वापस दो गोलियां मार कर ले आए कि लो अब डेड बॉडी में शामिल कर लो।
फिल्म में बहुत बचाकर ही चीज़ें दिखाई गई हैं, महिलाओं को सुग्गा "बेबे" कहकर आदर से बुलाता है, हमारे यहां "मादर" से भी बुला लेते हैं। तो मुझे लगता है।
मुझे जसवंत के बेटे-बेटियों के बारे में जानना है, उनसे बात करनी है। अगर कहानी 95 की है तो उनकी उम्र मेरे से थोड़ी ही छोटी बड़ी होगी। किसी को पता हो तो मेरा प्यार पहुंचाइएगा।
फिलहाल इतना ही..
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