शनिवार, 21 मार्च 2026

राख

दुनिया का फ़लसफा किसी किताब ने नहीं
एक मुट्ठी राख ने सिखाया
जब तक सांस रही
वह एक हंसता खेलता शरीर रही।
जब वह राख हुई
तब मुट्ठी भर रह गया वजूद।

मैंने उसे बहाने के लिए नदी चुनी
नदी का इतिहास भी राख ही था।
फिर जब पानी हुई नदी
तो उसमें कई मुट्ठी राख बहती रही।

किसी राजा की राख 
पशु पक्षी की राख 
या किसी प्रेमिका की राख 
सब आंसुओं में लिपटी हुई।

कई मीनारें , स्तंभ, विजय पताकाएं
सभ्यताएं भी राख हुईं 
एक दंभ भरी हंसी का राख होना
संभव हो सका नदी के बहाने 

नदी तुम इस राख को संभाल कर रखना
यह एक बच्ची की लाश है
जिसे अभी अभी मारा गया है
जन्म देने से पहले

मछलियों से खेलने देना इसे
सबसे चमकदार सीपियां दिखाना
पानी में छपछप सिखाना इसे
इसने जीवन को बस राख भर समझा है।

हो सके तो इस राख में प्राण भर देना
यह अपनी राख से फिर उठेगी
और दुनिया को प्रेम करना सिखाएगी।

निखिल आनंद गिरि

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