शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

ममता तेरे देस में..(हम जीते-जी मर गए रे..)

इस बार गर्मियों में छुट्टियां बिताने और आम का मज़ा लेने के लिए पश्चिम बंगाल के मालदा इलाक़े में जाना हुआ। ज़िले का एक छोटा सा कस्बा समसी। सुनने को मिला कि एक-दो बार सोनिया गांधी भी इस इलाके के दौरे पर आ चुकी हैं। इसका मतलब अगर ये समझ लिया जाए कि यहां खूब विकास हुआ है तो ये वैसा ही है जैसे कोई बच्चा गांव के ऊपर से हेलीकॉप्टर उडता देखकर कहे कि हमारे गांव में हेलीकॉप्टर चलते हैं।

एक स्थानीय रिश्तेदार को डॉक्टर से दिखाने के लिए वहां के सरकारी अस्पताल पहुंचा तो देखकर तसल्ली हुई कि डॉक्टर उपलब्ध हैं और शाम पांच बजे के बाद भी मरीज़ों के लिए समय निकाल रही हैं। मगर थोडी देर में समझ आ गया कि उनसे सत्तर रुपये फीस वसूली जा रही है। यानी अस्पताल का कमरा, बिजली, पंखा, यहां तक कि डॉक्टर भी सरकारी मगर प्राइवेट प्रैक्टिस। पैसे लेकर मरीज़ों की पर्ची बनाने वाले झोलाछाप कंपाउंडर से मिन्नत करने और उसकी मेहरबानी के बाद डॉक्टर से मिलना हुआ। कोई फाल्गुनी बाला थीं, जो इस इलाके में इकलौती सरकारी डॉक्टर थीं। स्थानीय लोगों से पता चला कि सरकारी अस्पताल में निजी प्रैक्टिस करना यहां का पुराना चलन है और मैं ही इस मामले को लेकर ज़्यादा भावुक हो रहा हूं।

अगली सुबह फिर से अपने रिश्तेदार के साथ अस्पताल पहुंचा तो देखा निजी प्रैक्टिस सुबह से ही शुरू है। सरकारी अस्पताल के दूसरे कमरे में एक सडक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल मरीज़ काफी देर से डॉक्टर साहिबा के आने का इंतज़ार कर रहा था। मगर, फीस देकर डॉक्टर से मिलने वालों की तादाद ज़्यादा थी इसीलिए डॉक्टर को फुर्सत नहीं मिल पा रही थी। इसके बाद जितना हो सका, मैंने अपने स्तर से स्थानीय पत्रकारों से इस मसले पर बातचीत की मगर उनकी प्रतिक्रिया ऐसी थी जैसे ये कोई गंभीर बात ही नहीं है। लोगों से पूछने पर पता चला कि चुनाव के वक़्त कभी-कभी ऐसे मुद्दों को लेकर रूटीन प्रदर्शन होते हैं, मगर अस्पतालों का ये हाल पूरे बंगाल में एक जैसा है। हालांकि मेरे लिए अस्पतालों का ऐसा हाल नया नहीं है। बिहार के समस्तीपुर में हाल के महीनों में ही निजी और सरकारी अस्पतालों की मिलीभगत से गर्भाशय के इलाज में जो भयंकर घपला सामने आया है, उतना ही सुशासन का हाल बताने को काफी है, मगर बंगाल में हालात इतने बदतर हैं, सोचकर यकीन नहीं होता।

मालदा एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। देश की सबसे ज़्यादा मुस्लिम आबादी बंगाल के इसी इलाके में रहती है। जिस समसी कस्बे में मैं ठहरा, वहां भी मुस्लिम आबादी बहुत ज़्यादा है। जितने स्कूल वहां दिखे, उतने ही मस्जिद भी। किसी घर में अख़बार आता नहीं दिखा। रेलवे के फाटक पर या बाजार में कहीं-कहीं बंगाली के अखबार टंगे जरूर दिखे, मगर मेरा अनुमान कहता है कि उसमें अस्पतालों की दुर्दशा बडी ख़बर नहीं बनती होगी। ममता बनर्जी की सरकार अल्पसंख्यकों को लेकर रोज नई घोषणाएं करती दिखती है, मगर सियासत में घोषणाओं का मतलब विकास नहीं होता। और सारा दोष ममता का नहीं, लंबे वक्त तक रहे लेफ्ट के राज का भी है। आख़िर  सिस्टम में भ्रष्टाचार को एक परंपरा बनते वक्त तो लगा ही होगा। मालदा जैसे इलाक़े वक्त से कम से कम तीस साल पीछे चले गए हैं और आगे आने की कोई उम्मीद भी नहीं दिखती।

बहरहाल, मालदा में किस्म-किस्म को आम खाने को ज़रूर मिले। अगर मेरी तरह आपको भी यक़ीन है कि मालदह आम का सीधा ताल्लुक मालदा ज़िले से है, तो आप ग़लत हैं। यहां इसे लंगड़ा आम कहते हैं। जिले के छोटे-छोटे इलाकों से आम की टोकरियां कटिहार के रास्ते बिहार और आगे के इलाक़ों में जाती हैं। कटिहार में एक लोकल ट्रेन से उतरते वक्त इन छोटे व्यापारियों की दुर्दशा भी दिखी। जैसे ही लोकल ट्रेन से इनकी टोकरियां उतरती हैं, पुलिस वाले अलग-अलग गिरोह बनाकर इनसे वसूली करने लगते हैं। कोई आरपीएफ के नाम पर, कोई रेलवे टिकट के नाम पर तो कोई स्थानीय सिपाही के नाम पर। कोई चाहे तो इस स्टेशन पर पुलिसवालों की तलाशी ले सकता है। उनकी जेब से लेकर बैग तक में इन ग़रीबों को धमकाकर वसूले गए आम निकल जाएंगे।
दिल्ली में जो आम साठ से सौ रूपये किलो तक मिलते हैं, यहां दस-पंद्रह रूपये किलो में मिल जाते हैं। मगर डॉक्टर की फीस यहां भी सत्तर रूपये है, वो भी सरकारी अस्पताल में। शुक्र है दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में फीस नहीं देनी पड़ती और वहां मालदा के एक छोटे क़स्बे की खबर छपने की भी पूरी गुंजाइश रहती है। और कुछ नहीं तो अपनी 'आपबीती' तो है ही..

(ये आलेख जनसत्ता अखबार में 12 जुलाई को प्रकाशित हुआ है..)

निखिल आनंद गिरि

रविवार, 7 जुलाई 2013

हिंदी सिनेमा के उम्मीदों की आखिरी पत्ती है 'लूटेरा'

लूटेराअगर कनॉट प्लेस के रीवोली या राजौरी गार्डेन के मूवीटाइम में देखी होती तो सीधा फिल्म के बारे में बात करता। मगर फिल्म देखी समस्तीपुर के भोला टॉकीज में, तो थोड़ी-सी बात फिल्म देखने के माहौल पर भी। कई साल बाद किसी छोटे शहर में फिल्म देखी। सिंगल स्क्रीन थियेटर में। दिल्ली में टिकट के दाम से दस गुना सस्ता। कोई एडवांस बुकिंग, नेट बुकिंग, प्रिंट आउट या एसएमएस बुकिंग नहीं। सीधा काउंटर पर जाइए और टूटी-फूटी मैथिली में बात करते ही रसीद वाला टिकट हाथ में। कोई थैंक्यू या हैव ए गुड डे का चक्कर भी नहीं। बस ऐसे सिनेमाघरों में दिक्कत ये है कि आपको हर डायलॉग कान लगाकर सुनना पड़ेगा वरना आप डायलॉग और संगीत के मामले में आधी फिल्म देखकर ही घर वापस जाएंगे।

मैं व्याकरण का विद्यार्थी नहीं, मगर मेरे ज्ञान के हिसाब से छोटी वाला लुटेरा हिंदी का शब्द लगता है। फिल्म के टाइटल में दिख रहा लूटेरा अंग्रेज़ी के लूट में राको सीधा चिपकाया गया लगता है। शायद अंग्रेज़ी पढ़ने वाले दर्शकों को इस लूटमें ज़्यादा अपनापन लगता हो। हालांकि, इस तरह के टाइटल सिंगल स्क्रीन दर्शकों को ज़्यादा भाते रहे हैं। लुटेरा, डाकू हसीना, बंदूक की कसम, चोर-पुलिस टाइप फिल्में बी ग्रेड हिंदी सिनेमा से होती हुईं आए दिन भोजपुरी में बनती हैं। और उनमें जो-जो कर्म होते हैं, शायद वही सब देखने की उम्मीद लिए यहां के दर्शक इस बार भी लुटेरा के लिए जुटे होंगे। मगर, निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी कोई कांति शाह तो हैं नहीं कि टाइटल लुटेरा रखें तो उसमें इज़्जत लूटने का सीन भी रखना लाजमी हो। सोनाक्षी सिन्हा को फिल्म में लेना उनकी मार्केटिंग मजबूरी हो सकती है मगर उनसे सन ऑफ सरदार या राउडी राठौर से हटकर भी बहुत कुछ करवाया जा सकता है।

समस्तीपुर के भोला टॉकीज पर दर्शकों की फ्रीक्वेंसी के हिसाब से लूटेरा एक महा फ्लॉप फिल्म है। रिलीज़ के दूसरे दिन तीस रुपये की टिकट खरीदकर फिल्म देखने वाले तीस लोग भी नहीं थे। टिकट लेने से पहले भोला टॉकीज़ में 17-18 साल से प्रोजेक्टर चला रहे वाले शशि कुमार से दोस्ती हुई। उन्होंने बताया कि इस फिल्म के नाम और सोनाक्षी की वजह से ही फिल्म लगाने का रिस्क लिया गया, वरना भोजपुरी फिल्मों के अलावा यहां आशिकी 2 ही है जो हाल में अच्छा बिजनेस कर सकी थी। उन्होंने लगभग चेतावनी भी दी कि रिलीज़ के बाद हर शो में हॉल एकाध घंटे में ही खाली हो गया है, इसीलिए टिकट सोच-समझकर कटाइए(खरीदिए)।

ख़ैर, हॉल में कम लोगों का होना हम जैसों के लिए अच्छा ही है। कम सीटियों-तालियों और गालियों के बीच ज़्यादा आराम से फिल्म देखी जा सकती है। वरना सोनाक्षी और रनबीर जब प्यार के सबसे महीन पलों में एक-दूसरे के करीब आ रहे थे और रनबीर ने आखिर तक खामोश रहकर कुछ नहीं किया, तो ऑडिएंस में से कमेंट सुनने को मिला कि साला सकले से (शक्ल से ही) बकलोल लग रहा है। या फिर फिल्म के क्लाइमैक्स में जब रनबीर जबरदस्ती सोनाक्षी को बचाने के लिए इंजेक्शन लगाना चाहते हैं और गुत्थमगुत्था होते हैं तो कमेंट सुनने को मिलता है कि एतना (इतनी) देर में तो भैंसी (भैंस) भी सूई लगा लेती है

तो मिस्टर विक्रमादित्य मोटवानी, आप जब कैमरे के ज़रिए प्यार की सबसे शानदार पेंटिंग गढ रहे होते हैं, दिल्ली-मुंबई से बहुत दूर दर्शक कुर्सियां छोड़-छोड़ कर जा रहे होते हैं या फिर आपको जी भर कर कोस रहे होते हैं। पहले उड़ान और अब लूटेरा से आप सिनेमा को नई क्लासिक ऊंचाइयों पर ले जाने को सीरियस दिखते हैं और इधर पब्लिक है जो आशिकी 2 को दोबारा-तिबारा देखना चाहती है। इस हिम्मत के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई। हम जैसे दर्शक हमेशा आपके साथ हैं।

स्कूल के दिनों में द लास्ट लीफ पढ़ी थी। कभी सोचा नहीं था कि हिंदी सिनेमा में उसे पर्दे पर भी उतरता हुआ देखूंगा। वो भी इतनी ख़ूबसूरती से। एक ही फिल्म में ओ हेनरी की कहानी से लेकर बाबा नागार्जुन तक की कविता सुनने को मिलेगी। मगर, प्रयोग के नाम पर इतना ही बहुत था। पीरियड फिल्मों में ग्रामोफोन ही अच्छे लगते हैं, सोनाक्षी बिल्कुन नहीं। ठीक है कि आपने उनसे एक्टिंग कराने की पूरी कोशिश की है, मगर इंडस्ट्री में अच्छे कलाकारों की कमी तो है नहीं। फिर रनबीर के साथ उनकी जोडी कम से कम मुझे तो नहीं जंची। सोनाक्षी को क्लोज़ अप से बाहर देखिए तो रनबीर से ओवर एज लगती हैं। सोनाक्षी एक ज़मींदार की अल्हड़ बेटी से ज़्यादा कोई सेडक्टिव ठकुराईन लगती हैं। और रनबीर भी गंभीर दिखने के नाम पर भीतरघुन्ना टाइप एक्टर लगते हैं। 50 के दशक वाली बॉडी लैंग्वेज उनमें चाहकर भी नहीं आ पाती। अच्छी एक्टिंग का मतलब जबरदस्ती की चुप्पी तो नहीं होती। हालांकि, दोनों ने उम्मीद से ज़्यादा अच्छा काम किया है, मगर ये और अच्छा हो सकता था। आप साहित्य को सिनेमा पर उतार रहे थे तो मार्केट मैकेनिज़्म बीच में कहां से आ गया। ये तो हिंदी साहित्य का हाल हो गया कि आप कोई मास्टरपीस लिखना चाह रहे हों और अचानक किसी ऐसे पब्लिशर की तलाश करने लगें जो आपकी गोवा या स्विट्ज़रलैंड की ट्रिप स्पांसर कर दे क्योंकि वहां का मौसम अच्छा लिखने में मदद करता है।

कहानी के नाम पर इस फिल्म की जड़ें भी सदियों पुरानी है। वही प्रेम कहानी, वही मिलना-बिछुड़ना, वादा तोडना-निभाना। मगर कैमरा इतनी खूबसूरती से कहानी कहता है कि आप उसमें ख़ुद को महसूस करने लगते हैं। लोकेशन्स देखकर कई जगह तो आपको लगेगा कि आप कोई ख़ूबसूरत-सी ईरानी मूवी देख रहे हैं। या फिर स्क्रीन प्ले और डीटेलिंग देखकर कभी-कभी बंगाली सिनेमा का महान दौर भी आंखों में तैरने लगता है। इंटरवल के आसपास तक की फिल्म एक अलग टाइम और स्पेस में चलती है। उसके बाद आपको लगेगा आप किसी और फिल्म में आ गए हैं। ये एक हुनरमंद डायरेक्टर की पहचान है। हालांकि, जब नैरेटिव इतना धीमा और पोएटिक ही रखना था तो अचानक मुझसे प्यार करते हैं वरुण बाबू जैसे डायलॉग्स बहुत सपाट और फिल्मी लगते हैं। और ये भी समझना मुश्किल है कि अरबों की मिल्कियत संभालने वाले जमींदार पिता हिंदी सिनेमा में अक्सर इतने भोले क्यों होते हैं कि उन्हें अपने घर में ही पनप रही प्रेम कहानियों की भनक तक नहीं लग पाती।

लूटेरा एक तरह से प्यार को नए ढंग से परिभाषित करती है। इस तरह के अलहदा प्यार को देखने-समझने-जीने के लिए फिल्म ज़रूर देखें। वक्त के सांचे में ढलकर भी सच्चा प्यार ख़त्म नहीं होता। और प्यार किसी लुटेरे के दिल में भी हो तो प्यार ही रहता है। फिल्म एक खलनायक के प्यार को जस्टीफाई करती है। खलनायक ऐसा नहीं जिससे आप नफरत करें। आप उसके पक्ष में खड़े होते हैं। और प्रेमिका भी खलनायक के धोखे के खिलाफ है, मगर आखिर तक प्यार के साथ खड़ी रहती है। एक छोर से नफरत की डोर थामे। हम भारतीय सिनेमा में क्लाइमैक्स पूरा देखने के आदी हैं। इससे विक्रमादित्य भी बच नहीं सके हैं। बेहतर होता कि सूखे पेड़ पर वरुण के आखिरी पत्ती लगाने के साथ ही क्रेडिट्स शुरू हो जाते। बेहतर होता कि सब कुछ अधूरा रह जाता। वरुण को अपना प्यार साबित करने का मौका आधा ही मिलता। प्यार में कसक बाक़ी न रह जाए तो तसल्ली अधूरी रहती है। कहानी वही अच्छी जिसके दौरान साइलेंस (मौन) और बाद में रेज़ोनेंस (प्रतिध्वनियां) बाक़ी रहे।   

फिल्म का निर्देशन इतना बेहतरीन है कि फिल्म स्कूलों में इसे टेक्स्ट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। कहानी में कैरेक्टर बढ़ाने का स्कोप ही नहीं था, फिर भी दो-सवा दो घंटे की फिल्म में बांधे रख पाना बडा काम है। म्यूज़िक से लेकर गाने और साइलेंस तक का इतनी बारीकी से इस्तेमाल हुआ है कि आप जमे रहते हैं। 50 के दौर को जिंदा करने के लिए तब की सुपरहिट फिल्म बाज़ी के गाने का बार-बार इस्तेमाल सदाबहार देव आनंद को श्रद्धांजलि जैसा है। विक्रमादित्य इस दौर के बेहतरीन निर्देशक साबित हो चुके हैं। बस ज़रूरत है उन्हें अपने सिनेमा के जरिए कुछ नए सब्जेक्ट पर काम करने की, जिसमें सिर्फ प्रेम कहानी नहीं हो।


लूटेरा कई हिस्सों में उड़ान से भी बेहतर है, मगर उड़ान नहीं है। आपकी मास्टरपीस तो वही है।

निखिल आनंद गिरि

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