रविवार, 17 मई 2026

चमचों के दरबारों से ख़ुद को दूर रक्खा है

हुनर अपना न मैं ने बेचना मंज़ूर रक्खा है
तभी चमचों के दरबारों से ख़ुद को दूर रक्खा है
मिलेगी कुर्सी झुकने से, ये दुनिया चीख़ कर बोली
मगर मैं ने ही सर अपना बहुत मग़रूर रक्खा है
वो तलवे चाट कर मंज़िल की सीढ़ी चढ़ तो जाते हैं
मगर मैं ने सफ़र का रास्ता पुर-नूर रक्खा है
जहाँ बिकते थे सब ग़ैरत, वहाँ हम जा नहीं पाए
ज़मीरे-ज़िंदा को हर हाल में मसरूर रक्खा है
कहा जो 'हाँ' में 'हाँ' उनकी, तो वो मेहरबाँ ठहरे
कहा जो 'सच', तो फिर उन सब ने ही मक़हूर रक्खा है
ज़माना हो गया रुसवा, मगर ये साख है मेरी
कि मैं ने सच का दामन आज भी दस्तूर रक्खा है
निखिल आनंद गिरि

(मक़हूर - नापसंद)

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