यह बात किसी शास्त्र में लिखी तो नहीं
मगर तय है कि
किसी भी सफ़ल हत्या के पीछे
एक पुरुष का हाथ ज़रूर होता है।
वह किसी भी शक्ल में तुम्हारे पास आ सकता है
भाई, मित्र, छात्र या राष्ट्र का प्रमुख भी।
जब कोई हत्यारा आए तो उसे
तत्काल क्षमा कर दो
न लिंग, न आयु, न जाति, न धर्म
किसी भी भेदभाव से मत देखो उसे
लंबी उम्र की कामना करो।
वह बेहद उग्र दिख रहा हो तो भी
कोशिश रहे कि कुछ देर शांत हो सके।
उन बेहद नाज़ुक मौन क्षणों में संभव है
वह हत्या से पहले भी
थोड़ा सा मुस्कुराना सीख जाए
उसके भीतर करुणा जगे
या ग्लानि भी।
हो सकता है वो हत्या का आदी नहीं हो
अब तक सिर्फ गाड़ी के शीशे तोड़ना
गालियां बकना और गर्व से भर जाना ही सीखा हो।
उन बेहद नाज़ुक क्षणों में संभव है
वह तुम्हारे पास गलती से भेजा गया हो
और वो पश्चाताप से भर जाए
कि तुमने उसे पहली हत्या करने से बचा लिया।
हो सके तो हत्यारे से मुस्कुराते हुए कहो
कि हत्या सिर्फ शरीर की हो सकती है
विचारों की नहीं
इसीलिए अधूरी हत्याओं के सभ्य इतिहास में
क्यूं अपना नाम दर्ज़ करना?
उसका इरादा बदल जाए तो
इसे जीतने की तरह नहीं,
जिम्मेदारी की तरह देखना।
उसने यदि अब तक सिर्फ सूखा गर्व करना सीखा हो
तो ऐसे में उसे पानी ज़रूर पूछना।
तुम्हारी हत्या के बाद भी संभव है
तुम्हारा दिया हुआ पानी
उसके भीतर का सूखा ख़त्म कर डाले
और एक हत्यारे की आंखों में उतर आए।
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