बीसवीं सदी के अंतिम दो दशक अनेक दृष्टियों से वैविध्यपूर्ण और घटना बहुल रहे। इस समय के राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रभावों ने, जिसके अंतर्गत – भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, सत्ताओं का गंठजोड़, आंदोलनों की गूंज, घोटाले, आतंकवादी और नक्सली गतिविधियों, सांप्रदायिकता में उभार, फ्री मीडिया, मध्यम वर्ग में आर्थिक बदलाव, रोज़गार की कमी आदि प्रमुख घटनाएं रहीं, ने समाज तथा कविता को गहरे प्रभावित किया।
इसके ठीक बाद एक कवि के तौर पर साहित्य
की दुनिया में पहली बार मैंने इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में प्रवेश किया। दो
कमरों के घर में चार भाई-बहन मां की निगरानी में रहते थे, पिता बाहर नौकरी करते
थे। झारखंड में रांची नई-नई राजधानी बनी थी। शहर होने के अंकुर फूट ही रहे थे।
टेंपो में मध्यमवर्गीय लोग बैठते थे तो साथ में किसी आदिवासी महिला के झोले से
मुर्गा भी मुंडी निकाले शहर को निहारता था। पानी की किल्लत में दो रुपये प्रति टीन
आदिवासी लड़के अपने कंधों पर पानी लादे घर पहुंचाया करते थे। पानी सुबह और शाम
सिर्फ एक-एक घंटे के लिए आता था।
कविताएं लिखना बेहद मुश्किल था। घर में
साहित्य का कोई स्पेस या माहौल नहीं था। कविता की कोई पंक्ति मन में आए तो कागज़
पर लिखकर उसे छिपाकर रखना पड़ता था कि किसी की नज़र न पड़ जाए। छिप-छिप कर किसी
अख़बार में कविताएं भेज भी दी तो ये पूछने में भय लगता था कि कब छपेंगी, छपेंगी भी
या नहीं। यह मेरे जैसे कई नये कवियों की एक-सी कहानी है, जो इस सदी की पूरी चौथाई
में लिख रहे हैं। इसी समय सुखद संयोग की तरह डिजिटल युग आया जहां लिखना-पढ़ना सब
आसान हो गया। मरी दृष्टि में इस सदी की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना की तरह दखना चाहिए
जिसन कविताएं लिखने और इसक प्रसार के सारे मानकों को बदल कर रख दिया।
मैं इसे दो तरह से देखता हूं। पहला
सकारात्मक पहलू ये है कि डिजिटल प्लैटफॉर्म के ज़रिए लिखना आसान हुआ है। आपको किसी
संपादक के ग्रीन सिग्नल का इंतज़ार नहीं करना पड़ता किसी कविता के छपने के लिए।
महीने-दो महीने, पांच-छह महीने और सालों निकल जाते हैं कई बार और कुछ भी जवाब नहीं
आता किसी पत्रिका से। तो उस मठाधीशी को तोड़ा है डिजिटल प्लैटफॉर्म ने। ये एक तरह
का पैराडाइम शिफ्ट (आमूल
परिवर्तन) था हिंदी में। हिंदी साहित्य में दखल देने के एक पूरे प्रोसेस को चुनौती
थी। बहुत विरोध हुआ, सीनियर, स्थापित साहित्यकारों ने हेय दृष्टि से देखना शुरू
किया नए इंटरनेट छाप कवियों को। अब वो सब डिजिटल मंचों पर खुशी-खुशी आते हैं और
साथ में कविता पाठ होते हैं।
इस विस्फोट की चुनौती ये है कि आवारा
लोकप्रियता के ट्रेंडिंग दौर में कविता कहीं खो न जाये। बधाई, लाइक्स और वायरल रील्स के
दौर में कविता अब अंतरों में नहीं पंक्तियों में सिमट कर रह गई है।
आचार्य मम्मट ने काव्य प्रयोजन के
संदर्भ में यश को पहला प्रयोजन स्वीकार करते हुए लिखा है – ‘काव्यं
यशसेर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षते। सद्य: परिनिर्वृत्तये
कांत सम्मिततयो पदेशयूजे। अर्थात् काव्य का प्रयोजन यश, अर्थ-प्राप्ति, व्यवहार की
शिक्षा देना और जीवन के शिव पक्ष की रक्षा करना है। पोएट्री के ज़रिए यश यानी
मशहूर होने से किसी को दिक्कत नहीं है। सवाल है शॉर्ट कट का।
जामिया में जब पढ़ने आया था तो शैलेश
भारतवासी हिंदयुग्म नाम का सुंदर ब्लॉग चलाया करते थे। उसमें हर महीने यूनिकोड में
टाइप की गई हिंदी कविताएं आमंत्रित की जाती थी और महीने के अंत में विजेता यूनिकवि
घोषित किया जाता था। मैं भी हिंदी के इस रोचक अभियान से तन-मन-धन से कुछ दिन
जुड़ा, फिर एक बार पता चला कि उस प्रतियोगिता की निर्णायक मंडली में एक महिला
मित्र हैं, जो अपनी कविताएं भी उसी प्रतियोगिता के लिए बतौर प्रतिभागी भेजती हैं! शुक्र है कि इस तरह का शॉर्टकट रास्ता
प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं होता।
मैंने पिछले कुछ समय के अपने अध्ययन
में इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर तीन लोकप्रिय डिजिटल माध्यमों पर नज़र दौड़ाई
है। ये माध्यम हैं – ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम। मेरा ख़ुद से सवाल ये था कि
कौन सा माध्यम कविता के लिए सबसे उपयुक्त हो सकता है।
ट्विटर (अब एक्स) पर एक पोस्ट लिखने की
शब्द सीमा मात्र 280 कैरेक्टर्स हैं। कैरेक्टर का मतलब वर्णों के साथ कॉमा,
पूर्णविराम भी गिनती में आते हैं। इतने कम शब्दों या कैरेक्टर्स में कविता लिखने
का दौर शायद अभी नहीं आया है। वैसे भी ट्विटर का उपयोग भारत में ब्रेकिंग न्यूज़
के लिए ज़्यादा होता है बजाय कविता के। तो मैं इसे एक अकलात्मक या APOETIC माध्यम
मानूंगा।
फेसबुक हम जैसे ऑरकुट की पीढ़ी वालों
का मक्का-मदीना है। क्या खाया, कहां घूमे, क्या बनाया, करवा चौथ का चांद दिखा कि
नहीं आदि निजी बातों को शेयर करने का सटीक माध्यम। मैं ख़ुद इस पर फेसबुक ट्रैवल्स
के नाम से एक सीरीज़ बरसों से चलाता हूं और इसमें तरह-तरह की तस्वीरें या दो-चार
पंक्तियों में अपनी बात कहता रहा हूं। मगर, कविताओं के लिहाज़ से ये माध्यम भी
सबसे उपयुक्त नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसका दायरा आपके अपने दोस्त-यार,
सगे-संबंधी हो सकते हैं, जो बिना पेड प्रोमोशन के बहुत सीमित है।
एक तीसरा माध्यम है इंस्टाग्राम जो
मुझे तो बहुत आकर्षित नहीं करता मगर मेरे बाद की पीढ़ी जो अभी कॉलेज में है या
अभी-अभी कविता का कीड़ा लगा है, उसके लिए सबसे सटीक है। इसकी पहुंच भी असीमित
लोगों तक है और यहां पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों तरह के कंटेंट ख़ूब शेयर किए जाते
हैं। हैशटैग और टैग यहां तसल्लीबख्श इस्तेमाल किए जाते हैं। और तस्वीरों के साथ
फोटो लगाने वाली पीढ़ी छोटी कविताओं के साथ आसानी से आकर्षक तस्वीरें, फॉन्ट,
टेंपलेट वगैरह शेयर करती है। यानी कविता यहां सिर्फ कविता नहीं है। वो अपनी
पैकेजिंग में आपके दिमाग़ में थोड़ी देर ठहरती है। अब उसमें अगर कंटेंट हुआ तो
बहुत देर तक भी आपके साथ रह जाएगी।
अगर आपने नए दौर के बेस्टसेलिंग डिजिटल
कवियों के बारे में थोड़ा बहुत भी सुना है तो रूपी कौर के नाम से ज़रूर वाकिफ़
होंगे। उनकी अंग्रेज़ी कविताओं का संग्रह ‘मिल्क
और हनी’ तो इतना बिका जितना हिंदी के बड़े-बड़े कवि सपने में भी नहीं सोच
पाएंगे। उनकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर मैं गया तो कम से कम सौ पोस्ट्स बिल्कुल एक
जैसे मेक अप में दिखीं। बीच में एकाध लाइन की कविता और दाएं-बाएं दो तस्वीरें।
I have never known
anything more quietly loud than anxiety. इस एक लाइन की कविता पर दो लाख 58
हज़ार 243 लाइक्स हैं। ऐसी कविताओं के ज़रिए अमेज़ॉन प्राइम पर उनका एक घंटे का एक
शो भी है। मुझ जैसा हिंदी कवि सिर्फ अमेजॉन प्राइम या नेटफ्लिक्स जुगाड़ करके
देखता रह जाता है, रूपी वहां सेलेब्रिटी बन जाती हैं।
इंस्टाग्राम पर हिंदी कवियों का हाल भी
ठीकठाक ही है। मैंने सर्च बॉक्स में हिंदी कविता लिखा तो कई सारे पेज दिखे। कई
सारे कवि भी। जैसे एक पेज दिखा – हिंदी कविता संसार। इसकी टैगलाइन है-Connecting
New Generations to Hindi Kavita। फिर वहां सुंदर बैकग्राउंड में
नागार्जुन, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी की चर्चित कविताओं के
टुकड़े हैं। इस पेज के एक हज़ार से अधिक फॉलोवर्स हैं जो संतोषजनक है।
कुछ और इंस्टाग्राम पेज पर भी गया जहां
फॉलोवर्स तो हज़ार से अधिक थे, मगर कविताओं के नाम पर पोस्टर पर लिखे कोटेशन और
सस्ती शायरी ही अधिक मिली।
कहा जा सकता है कि आज के कवियों में
कबीर, तुलसी, रैदास, मुक्तिबोध, निराला, नगार्जुन, केदारनाथ सिंह
आदि कवियों जैसे सारगर्भित कहने और अपने समय के विपरीत लिखने का साहस या
इच्छाशक्ति कम ही दिखती है।
दरअसल. कविता समाज से अलग-थलग रहकर
किया जाने वाला स्वतंत्र कार्य नही है।
इसमें रचनाकार अपने संसार के बरक्स एक प्रति-संसार रचते हुए अपने पाठकों
को, जो है उससे बेहतर में, ले जाने की सदिच्छा रखता है। कविता अपने समय का मूल्यांकन
भी करती है और नई काव्यवस्तु के लिए ज़मीन भी तैयार करती है।
कविता से प्रतिबद्धता और जवाबदेही खत्म
होती जा रही है। वर्तमान कविता से मौन, अनकहा, स्पेस
आदि कम या गायब होते जा रहे हैं, जोकि पहले की कविता को प्रासंगिक बनाता
था। वर्तमान कविता से कैरियर की गंध पनपती जा रही है।
आज की कविता की यह उपलब्धि ही मानी
जाएगी कि समाज के सरोकारों के बराबर वे कुछ अत्यंत मामूली से दिखने वाले, बेहद
मामूली सवालों को अपने कविताओं में उठाने लगे हैं, जो वास्तव में यथास्थितिवाद को
चुनौती देते हैं। आज दलित, आदिवासी, ट्रांसजेंडर और स्त्री, जो सनातन से चुप्पी
साधे थे, कविता में बोलने लगे हैं। आज की कविता का एक बड़ा हिस्सा इन बोलियों से
भी गुंजित है।
मेरी समझ में कविता तीन प्रमुख तत्वों
से बनती है – स्मृति, अनुभव और विचार। इस सदी की पहली चौथाई पूरा होने को है। और
नई सदी में प्रविष्ट होने के बावजूद हम पिछले दशक की धड़कनों को महसूस कर सकते
हैं।
ग्लोबल और लोकल जैसे विभाजन कविता के
वर्तमान के लिए अब भी संकट हैं। भूमंडलीकरण, बाजार, वैचारिक
मतभेद भी एक संकट है। वर्तमान समय में किसानों, मजदूरों,
श्रमिकों,
कारीगरों
के साथ- साथ आम जन जीवन, अस्तित्व और मूल जीवन मूल्यों पर
अप्रत्याशित संकट है। बहुआयामी विचारधारा जैसे शब्द अब नाम मात्र के रह गए हैं,
यहीं
कारण है कि वर्तमान कविता भी इससे जूझती दिख रही है। वैचारिकता
का अब बहुत महत्व नजर नहीं आता। उत्सवधर्मिता हावी हो गई है। हमें तुर्की के कवि नाज़िम हिकमत की
पंक्तियां ज़रूर याद रहें –
‘असल कवि अपने प्रेम, अपनी खुशियों या अपने दर्द भर ही में महदूद नहीं
रह सकता। ऐसे कवि की कविता में उसके जन को धड़कना चाहिए। सफल होने के लिए कवि ने
अपनी कविता में संसार के जीवन पर रोशनी डालनी चाहिए। यह तय है कि जो कवि यथार्थ से
बचता है और असंबद्ध विषयों पर बातें करता है, उसकी नियति भूसे में जल जाने के सिवा
कुछ नहीं होगी।’
निखिल आनंद गिरि
(आलोचना पत्रिका में प्रकाशित, आलोचना-21, 2026)