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रविवार, 24 मई 2026

मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


जो हुआ बस हो गया, उस रात यूं होना नहीं था

मैं कहां आंसू छिपाता, एक भी कोना नहीं था

लौटना था फिर मुझे जीवन भरी लंबी सड़क पर

सो चिता की आग में ख़ुद को पिघलता छोड़ आया।

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


देखने थे साथ मिलकर कितने सावन ज़िंदगी के

चूमने थे छोर साथी, बादलों के और ज़मीं के

हो सके तो माफ़ करना, एक दिन मैं ही अचानक

चार कंधों के सहारे तुमको चलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

और तारों की चमक में भी तुम्हें ही खोजता हूं

क्या रखा है ज़िंदगी की इन हसीं उपलब्धियों में

हार कर तुमको मैं अपनी, सब सफलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया

हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।


निखिल आनंद गिरि

ये पोस्ट कुछ ख़ास है

मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं

सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया। जो हुआ बस हो गया, उस रात यूं होना नहीं था मैं कहां ...