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शनिवार, 21 मार्च 2026

राख

दुनिया का फ़लसफा किसी किताब ने नहीं
एक मुट्ठी राख ने सिखाया
जब तक सांस रही
वह एक हंसता खेलता शरीर रही।
जब वह राख हुई
तब मुट्ठी भर रह गया वजूद।

मैंने उसे बहाने के लिए नदी चुनी
नदी का इतिहास भी राख ही था।
फिर जब पानी हुई नदी
तो उसमें कई मुट्ठी राख बहती रही।

किसी राजा की राख 
पशु पक्षी की राख 
या किसी प्रेमिका की राख 
सब आंसुओं में लिपटी हुई।

कई मीनारें , स्तंभ, विजय पताकाएं
सभ्यताएं भी राख हुईं 
एक दंभ भरी हंसी का राख होना
संभव हो सका नदी के बहाने 

नदी तुम इस राख को संभाल कर रखना
यह एक बच्ची की लाश है
जिसे अभी अभी मारा गया है
जन्म देने से पहले

मछलियों से खेलने देना इसे
सबसे चमकदार सीपियां दिखाना
पानी में छपछप सिखाना इसे
इसने जीवन को बस राख भर समझा है।

हो सके तो इस राख में प्राण भर देना
यह अपनी राख से फिर उठेगी
और दुनिया को प्रेम करना सिखाएगी।

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 31 जुलाई 2024

रिंगटोन

एक सस्ता फोन मां के पास है
जो चाह कर भी नहीं टूटता
पिता के पास भी है फोन
वह ख़ुद भी टैंपर्ड ग्लास की तरह
टूटने से बचाते हुए हमें
हमारी सुरक्षा के भ्रम में हैं।

एक लैंडलाइन अब तक है 
हमारे यहां जो कुछ दिन में
इतिहास बन जाएगी।

जितने लोग हैं दुनिया में
उनसे कहीं ज़्यादा हैं फोन
ग़लत नंबर वालों के कॉल सबसे ज़्यादा
कर्ज़ वालों के भी
थाई मसाज कराने के लिए भी 
कर लेता है कोई अजनबी संवाद।
कोई वोट मांगने के लिए भी
कर लेता है झूठमूठ याद। 

जो असल में याद आते हैं
बहुत प्रतीक्षा करने पर भी 
नहीं आता उनका कोई फोन कॉल

विज्ञान तुम आगे बढ़ो इतना कि
जीवन-मृत्यु के दो संसारों में 
बंट गए अभिन्न लोग
एक बार कॉल कर सकें एक-दूसरे को
या किसी रिंगटोन के सहारे ही
खोल दो उनकी अनंत नींद

कविता में याद करने की अपनी सीमाएं हैं।

निखिल आनंद गिरि

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