मगर एक बात तो माननी पड़ेगी। रोल एकदम कायदे का मिला है बंदे को। जो दिखता है, वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं। ऑस्कर की जगह एक 'बस कर" अवार्ड शुरू करूंगा तो सौरभ को नॉमिनेट ज़रूर करुंगा।
जो बंदा सब कुछ कर सकता है वो दरअसल कुछ नहीं कर सकता। यही बात सौरव द्विवेदी के स्क्रिप्ट राइटर ने उन्हें कभी बताई नहीं।
वो लल्लनटॉप जैसे फालतू नाम से एक भरोसेमनंद न्यूज चैनल खड़ा कर सकते हैं। पत्रकारिता करते करते डिनर टेबल पर गृह मंत्री के सामने ऐसे झुकते हैं कि वायरल हो जाते हैं। फिर अपने गांव में पुस्तकालय खोलने की ब्रांडिंग में पैसा वसूल कुविश्वसनीय लोगों को मंच पर बुला लेते हैं। रील के ज़माने में इतने लंबे लंबे इंटरव्यू लेते हैं कि थक हारकर उन्हें फिल्म में कोई रोल दे देता है। वो सबसे बड़ा विलेन का रोल से कम पर राज़ी ही नहीं होते और फिर "कर्त्तव्य" नाम की फिल्म में जब सैफ अली खान और संजय मिश्रा अपनी दमदार एक्टिंग का कर्त्तव्य निभाते हुए आनंद श्री उर्फ भूतपूर्व लल्लनटॉप सौरव द्विवेदी के पास जाते हैं तो ऐसी डायलॉगबाजी करते हैं कि टेलीप्रॉन्पटर भी शर्मा जाए।
फिल्म में क्लाइमैक्स ज़बरदस्त है। हमारी फिल्में "मदर इंडिया" से "फादर इंडिया" तक का सफर पूरा कर जुकी हैं। मदर इंडिया में जहां मां ने अपने बेटे को मार दिया था, यहां एक बेटे ने अपने पिता को ही मार दिया। इसके लिए "बस कर" अवार्ड का नॉमिनेशन आता ही होगा।
खैर, फिल्म अच्छी है। Netflix पर है। एक बात ज़रूर देखी जा सकती है। ठंड रखिए, जितने क्विंटल का लेख सौरभ द्विवेदी की आलोचना में सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है, वह इस फिल्म में उसका छंटाक हिस्सा भर भी नहीं हैं। उनके अलावा पूरी फिल्म में सबकी एक्टिंग अच्छी है।
