क़र्ज़दार हूं उन आंखों का
जिन्हें सिर्फ़ सुन्दर दिखा।
एक लड़की जिसने प्रेम में
मेरे हर अक्षर को वाक्य समझा
और हर वाक्य को महाकाव्य
मेरी हर मौन उदासी में रोई
मेरे एहसास के साथ ही सोई
यह भरम ही सही जीवन का
मेरे होने से ही उसका जीवन है।
दुनिया का फ़लसफा किसी किताब ने नहीं एक मुट्ठी राख ने सिखाया जब तक सांस रही वह एक हंसता खेलता शरीर रही। जब वह राख हुई तब मुट्ठी भर रह गया वजूद...
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