आपबीती
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं
बुधवार, 8 जुलाई 2026
"सतलुज" फिल्म के बहाने
रविवार, 24 मई 2026
मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं
सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया
हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।
जो हुआ बस हो गया, उस रात यूं होना नहीं था
मैं कहां आंसू छिपाता, एक भी कोना नहीं था
लौटना था फिर मुझे जीवन भरी लंबी सड़क पर
सो चिता की आग में ख़ुद को पिघलता छोड़ आया।
हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।
देखने थे साथ मिलकर कितने सावन ज़िंदगी के
चूमने थे छोर साथी, बादलों के और ज़मीं के
हो सके तो माफ़ करना, एक दिन मैं ही अचानक
चार कंधों के सहारे तुमको चलता छोड़ आया
हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।
मैं तुम्हें आकाश के सब पंछियों में देखता हूं
और तारों की चमक में भी तुम्हें ही खोजता हूं
क्या रखा है ज़िंदगी की इन हसीं उपलब्धियों में
हार कर तुमको मैं अपनी, सब सफलता छोड़ आया
हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।
सारी यादें, सारी बातें, लौ में जलता छोड़ आया
हां वहीं पर, मैं वहीं पर मन मचलता छोड़ आया।
सोमवार, 18 मई 2026
"कर्तव्य" फिल्म का नाम "फादर इंडिया" भी हो सकता था
मगर एक बात तो माननी पड़ेगी। रोल एकदम कायदे का मिला है बंदे को। जो दिखता है, वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं। ऑस्कर की जगह एक 'बस कर" अवार्ड शुरू करूंगा तो सौरभ को नॉमिनेट ज़रूर करुंगा।
जो बंदा सब कुछ कर सकता है वो दरअसल कुछ नहीं कर सकता। यही बात सौरव द्विवेदी के स्क्रिप्ट राइटर ने उन्हें कभी बताई नहीं।
वो लल्लनटॉप जैसे फालतू नाम से एक भरोसेमनंद न्यूज चैनल खड़ा कर सकते हैं। पत्रकारिता करते करते डिनर टेबल पर गृह मंत्री के सामने ऐसे झुकते हैं कि वायरल हो जाते हैं। फिर अपने गांव में पुस्तकालय खोलने की ब्रांडिंग में पैसा वसूल कुविश्वसनीय लोगों को मंच पर बुला लेते हैं। रील के ज़माने में इतने लंबे लंबे इंटरव्यू लेते हैं कि थक हारकर उन्हें फिल्म में कोई रोल दे देता है। वो सबसे बड़ा विलेन का रोल से कम पर राज़ी ही नहीं होते और फिर "कर्त्तव्य" नाम की फिल्म में जब सैफ अली खान और संजय मिश्रा अपनी दमदार एक्टिंग का कर्त्तव्य निभाते हुए आनंद श्री उर्फ भूतपूर्व लल्लनटॉप सौरव द्विवेदी के पास जाते हैं तो ऐसी डायलॉगबाजी करते हैं कि टेलीप्रॉन्पटर भी शर्मा जाए।
फिल्म में क्लाइमैक्स ज़बरदस्त है। हमारी फिल्में "मदर इंडिया" से "फादर इंडिया" तक का सफर पूरा कर जुकी हैं। मदर इंडिया में जहां मां ने अपने बेटे को मार दिया था, यहां एक बेटे ने अपने पिता को ही मार दिया। इसके लिए "बस कर" अवार्ड का नॉमिनेशन आता ही होगा।
खैर, फिल्म अच्छी है। Netflix पर है। एक बात ज़रूर देखी जा सकती है। ठंड रखिए, जितने क्विंटल का लेख सौरभ द्विवेदी की आलोचना में सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है, वह इस फिल्म में उसका छंटाक हिस्सा भर भी नहीं हैं। उनके अलावा पूरी फिल्म में सबकी एक्टिंग अच्छी है।
रविवार, 17 मई 2026
चमचों के दरबारों से ख़ुद को दूर रक्खा है
तभी चमचों के दरबारों से ख़ुद को दूर रक्खा है
मगर मैं ने ही सर अपना बहुत मग़रूर रक्खा है
मगर मैं ने सफ़र का रास्ता पुर-नूर रक्खा है
ज़मीरे-ज़िंदा को हर हाल में मसरूर रक्खा है
कहा जो 'सच', तो फिर उन सब ने ही मक़हूर रक्खा है
कि मैं ने सच का दामन आज भी दस्तूर रक्खा है
सोमवार, 11 मई 2026
आज की कविता और हमारा समय
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशक अनेक दृष्टियों से वैविध्यपूर्ण और घटना बहुल रहे। इस समय के राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रभावों ने, जिसके अंतर्गत – भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, सत्ताओं का गंठजोड़, आंदोलनों की गूंज, घोटाले, आतंकवादी और नक्सली गतिविधियों, सांप्रदायिकता में उभार, फ्री मीडिया, मध्यम वर्ग में आर्थिक बदलाव, रोज़गार की कमी आदि प्रमुख घटनाएं रहीं, ने समाज तथा कविता को गहरे प्रभावित किया।
इसके ठीक बाद एक कवि के तौर पर साहित्य
की दुनिया में पहली बार मैंने इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में प्रवेश किया। दो
कमरों के घर में चार भाई-बहन मां की निगरानी में रहते थे, पिता बाहर नौकरी करते
थे। झारखंड में रांची नई-नई राजधानी बनी थी। शहर होने के अंकुर फूट ही रहे थे।
टेंपो में मध्यमवर्गीय लोग बैठते थे तो साथ में किसी आदिवासी महिला के झोले से
मुर्गा भी मुंडी निकाले शहर को निहारता था। पानी की किल्लत में दो रुपये प्रति टीन
आदिवासी लड़के अपने कंधों पर पानी लादे घर पहुंचाया करते थे। पानी सुबह और शाम
सिर्फ एक-एक घंटे के लिए आता था।
कविताएं लिखना बेहद मुश्किल था। घर में
साहित्य का कोई स्पेस या माहौल नहीं था। कविता की कोई पंक्ति मन में आए तो कागज़
पर लिखकर उसे छिपाकर रखना पड़ता था कि किसी की नज़र न पड़ जाए। छिप-छिप कर किसी
अख़बार में कविताएं भेज भी दी तो ये पूछने में भय लगता था कि कब छपेंगी, छपेंगी भी
या नहीं। यह मेरे जैसे कई नये कवियों की एक-सी कहानी है, जो इस सदी की पूरी चौथाई
में लिख रहे हैं। इसी समय सुखद संयोग की तरह डिजिटल युग आया जहां लिखना-पढ़ना सब
आसान हो गया। मरी दृष्टि में इस सदी की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना की तरह दखना चाहिए
जिसन कविताएं लिखने और इसक प्रसार के सारे मानकों को बदल कर रख दिया।
मैं इसे दो तरह से देखता हूं। पहला
सकारात्मक पहलू ये है कि डिजिटल प्लैटफॉर्म के ज़रिए लिखना आसान हुआ है। आपको किसी
संपादक के ग्रीन सिग्नल का इंतज़ार नहीं करना पड़ता किसी कविता के छपने के लिए।
महीने-दो महीने, पांच-छह महीने और सालों निकल जाते हैं कई बार और कुछ भी जवाब नहीं
आता किसी पत्रिका से। तो उस मठाधीशी को तोड़ा है डिजिटल प्लैटफॉर्म ने। ये एक तरह
का पैराडाइम शिफ्ट (आमूल
परिवर्तन) था हिंदी में। हिंदी साहित्य में दखल देने के एक पूरे प्रोसेस को चुनौती
थी। बहुत विरोध हुआ, सीनियर, स्थापित साहित्यकारों ने हेय दृष्टि से देखना शुरू
किया नए इंटरनेट छाप कवियों को। अब वो सब डिजिटल मंचों पर खुशी-खुशी आते हैं और
साथ में कविता पाठ होते हैं।
इस विस्फोट की चुनौती ये है कि आवारा
लोकप्रियता के ट्रेंडिंग दौर में कविता कहीं खो न जाये। बधाई, लाइक्स और वायरल रील्स के
दौर में कविता अब अंतरों में नहीं पंक्तियों में सिमट कर रह गई है।
आचार्य मम्मट ने काव्य प्रयोजन के
संदर्भ में यश को पहला प्रयोजन स्वीकार करते हुए लिखा है – ‘काव्यं
यशसेर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षते। सद्य: परिनिर्वृत्तये
कांत सम्मिततयो पदेशयूजे। अर्थात् काव्य का प्रयोजन यश, अर्थ-प्राप्ति, व्यवहार की
शिक्षा देना और जीवन के शिव पक्ष की रक्षा करना है। पोएट्री के ज़रिए यश यानी
मशहूर होने से किसी को दिक्कत नहीं है। सवाल है शॉर्ट कट का।
जामिया में जब पढ़ने आया था तो शैलेश
भारतवासी हिंदयुग्म नाम का सुंदर ब्लॉग चलाया करते थे। उसमें हर महीने यूनिकोड में
टाइप की गई हिंदी कविताएं आमंत्रित की जाती थी और महीने के अंत में विजेता यूनिकवि
घोषित किया जाता था। मैं भी हिंदी के इस रोचक अभियान से तन-मन-धन से कुछ दिन
जुड़ा, फिर एक बार पता चला कि उस प्रतियोगिता की निर्णायक मंडली में एक महिला
मित्र हैं, जो अपनी कविताएं भी उसी प्रतियोगिता के लिए बतौर प्रतिभागी भेजती हैं! शुक्र है कि इस तरह का शॉर्टकट रास्ता
प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं होता।
मैंने पिछले कुछ समय के अपने अध्ययन
में इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर तीन लोकप्रिय डिजिटल माध्यमों पर नज़र दौड़ाई
है। ये माध्यम हैं – ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम। मेरा ख़ुद से सवाल ये था कि
कौन सा माध्यम कविता के लिए सबसे उपयुक्त हो सकता है।
ट्विटर (अब एक्स) पर एक पोस्ट लिखने की
शब्द सीमा मात्र 280 कैरेक्टर्स हैं। कैरेक्टर का मतलब वर्णों के साथ कॉमा,
पूर्णविराम भी गिनती में आते हैं। इतने कम शब्दों या कैरेक्टर्स में कविता लिखने
का दौर शायद अभी नहीं आया है। वैसे भी ट्विटर का उपयोग भारत में ब्रेकिंग न्यूज़
के लिए ज़्यादा होता है बजाय कविता के। तो मैं इसे एक अकलात्मक या APOETIC माध्यम
मानूंगा।
फेसबुक हम जैसे ऑरकुट की पीढ़ी वालों
का मक्का-मदीना है। क्या खाया, कहां घूमे, क्या बनाया, करवा चौथ का चांद दिखा कि
नहीं आदि निजी बातों को शेयर करने का सटीक माध्यम। मैं ख़ुद इस पर फेसबुक ट्रैवल्स
के नाम से एक सीरीज़ बरसों से चलाता हूं और इसमें तरह-तरह की तस्वीरें या दो-चार
पंक्तियों में अपनी बात कहता रहा हूं। मगर, कविताओं के लिहाज़ से ये माध्यम भी
सबसे उपयुक्त नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसका दायरा आपके अपने दोस्त-यार,
सगे-संबंधी हो सकते हैं, जो बिना पेड प्रोमोशन के बहुत सीमित है।
एक तीसरा माध्यम है इंस्टाग्राम जो
मुझे तो बहुत आकर्षित नहीं करता मगर मेरे बाद की पीढ़ी जो अभी कॉलेज में है या
अभी-अभी कविता का कीड़ा लगा है, उसके लिए सबसे सटीक है। इसकी पहुंच भी असीमित
लोगों तक है और यहां पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों तरह के कंटेंट ख़ूब शेयर किए जाते
हैं। हैशटैग और टैग यहां तसल्लीबख्श इस्तेमाल किए जाते हैं। और तस्वीरों के साथ
फोटो लगाने वाली पीढ़ी छोटी कविताओं के साथ आसानी से आकर्षक तस्वीरें, फॉन्ट,
टेंपलेट वगैरह शेयर करती है। यानी कविता यहां सिर्फ कविता नहीं है। वो अपनी
पैकेजिंग में आपके दिमाग़ में थोड़ी देर ठहरती है। अब उसमें अगर कंटेंट हुआ तो
बहुत देर तक भी आपके साथ रह जाएगी।
अगर आपने नए दौर के बेस्टसेलिंग डिजिटल
कवियों के बारे में थोड़ा बहुत भी सुना है तो रूपी कौर के नाम से ज़रूर वाकिफ़
होंगे। उनकी अंग्रेज़ी कविताओं का संग्रह ‘मिल्क
और हनी’ तो इतना बिका जितना हिंदी के बड़े-बड़े कवि सपने में भी नहीं सोच
पाएंगे। उनकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर मैं गया तो कम से कम सौ पोस्ट्स बिल्कुल एक
जैसे मेक अप में दिखीं। बीच में एकाध लाइन की कविता और दाएं-बाएं दो तस्वीरें।
I have never known
anything more quietly loud than anxiety. इस एक लाइन की कविता पर दो लाख 58
हज़ार 243 लाइक्स हैं। ऐसी कविताओं के ज़रिए अमेज़ॉन प्राइम पर उनका एक घंटे का एक
शो भी है। मुझ जैसा हिंदी कवि सिर्फ अमेजॉन प्राइम या नेटफ्लिक्स जुगाड़ करके
देखता रह जाता है, रूपी वहां सेलेब्रिटी बन जाती हैं।
इंस्टाग्राम पर हिंदी कवियों का हाल भी
ठीकठाक ही है। मैंने सर्च बॉक्स में हिंदी कविता लिखा तो कई सारे पेज दिखे। कई
सारे कवि भी। जैसे एक पेज दिखा – हिंदी कविता संसार। इसकी टैगलाइन है-Connecting
New Generations to Hindi Kavita। फिर वहां सुंदर बैकग्राउंड में
नागार्जुन, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी की चर्चित कविताओं के
टुकड़े हैं। इस पेज के एक हज़ार से अधिक फॉलोवर्स हैं जो संतोषजनक है।
कुछ और इंस्टाग्राम पेज पर भी गया जहां
फॉलोवर्स तो हज़ार से अधिक थे, मगर कविताओं के नाम पर पोस्टर पर लिखे कोटेशन और
सस्ती शायरी ही अधिक मिली।
कहा जा सकता है कि आज के कवियों में
कबीर, तुलसी, रैदास, मुक्तिबोध, निराला, नगार्जुन, केदारनाथ सिंह
आदि कवियों जैसे सारगर्भित कहने और अपने समय के विपरीत लिखने का साहस या
इच्छाशक्ति कम ही दिखती है।
दरअसल. कविता समाज से अलग-थलग रहकर
किया जाने वाला स्वतंत्र कार्य नही है।
इसमें रचनाकार अपने संसार के बरक्स एक प्रति-संसार रचते हुए अपने पाठकों
को, जो है उससे बेहतर में, ले जाने की सदिच्छा रखता है। कविता अपने समय का मूल्यांकन
भी करती है और नई काव्यवस्तु के लिए ज़मीन भी तैयार करती है।
कविता से प्रतिबद्धता और जवाबदेही खत्म
होती जा रही है। वर्तमान कविता से मौन, अनकहा, स्पेस
आदि कम या गायब होते जा रहे हैं, जोकि पहले की कविता को प्रासंगिक बनाता
था। वर्तमान कविता से कैरियर की गंध पनपती जा रही है।
आज की कविता की यह उपलब्धि ही मानी
जाएगी कि समाज के सरोकारों के बराबर वे कुछ अत्यंत मामूली से दिखने वाले, बेहद
मामूली सवालों को अपने कविताओं में उठाने लगे हैं, जो वास्तव में यथास्थितिवाद को
चुनौती देते हैं। आज दलित, आदिवासी, ट्रांसजेंडर और स्त्री, जो सनातन से चुप्पी
साधे थे, कविता में बोलने लगे हैं। आज की कविता का एक बड़ा हिस्सा इन बोलियों से
भी गुंजित है।
मेरी समझ में कविता तीन प्रमुख तत्वों
से बनती है – स्मृति, अनुभव और विचार। इस सदी की पहली चौथाई पूरा होने को है। और
नई सदी में प्रविष्ट होने के बावजूद हम पिछले दशक की धड़कनों को महसूस कर सकते
हैं।
ग्लोबल और लोकल जैसे विभाजन कविता के
वर्तमान के लिए अब भी संकट हैं। भूमंडलीकरण, बाजार, वैचारिक
मतभेद भी एक संकट है। वर्तमान समय में किसानों, मजदूरों,
श्रमिकों,
कारीगरों
के साथ- साथ आम जन जीवन, अस्तित्व और मूल जीवन मूल्यों पर
अप्रत्याशित संकट है। बहुआयामी विचारधारा जैसे शब्द अब नाम मात्र के रह गए हैं,
यहीं
कारण है कि वर्तमान कविता भी इससे जूझती दिख रही है। वैचारिकता
का अब बहुत महत्व नजर नहीं आता। उत्सवधर्मिता हावी हो गई है। हमें तुर्की के कवि नाज़िम हिकमत की
पंक्तियां ज़रूर याद रहें –
‘असल कवि अपने प्रेम, अपनी खुशियों या अपने दर्द भर ही में महदूद नहीं
रह सकता। ऐसे कवि की कविता में उसके जन को धड़कना चाहिए। सफल होने के लिए कवि ने
अपनी कविता में संसार के जीवन पर रोशनी डालनी चाहिए। यह तय है कि जो कवि यथार्थ से
बचता है और असंबद्ध विषयों पर बातें करता है, उसकी नियति भूसे में जल जाने के सिवा
कुछ नहीं होगी।’
निखिल आनंद गिरि
(आलोचना पत्रिका में प्रकाशित, आलोचना-21, 2026)
रविवार, 12 अप्रैल 2026
प्रेम कविता
शनिवार, 21 मार्च 2026
राख
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026
जेब जितने बड़े आदमी के लिए कविताएं
1) जल्दी लौट आऊंगा
यह कहकर रोज़ निकलता हूं
देर से लौटता हूं रोज़।
ट्रैफिक के नियम एक बच्चे के लिए नहीं बदले जा सकते
नहीं बदली जा सकती बच्चे की महत्वाकांक्षा भी
मैं कैसे बदलूं एक शाम का अपराधबोध में
अनायास बदल जाना।
2) उसके सपनों में शेर दलिया खाते हैं
वो चिड़ियों से घंटों बातें करता है
उसे लगता है उसके पिता ने जंगल में शार्क छोड़ रखे हैं
ताकि शहर में बच्चे स्कूल जा सकें।
वो गांव और शहर में फर्क नहीं कर सकता
जैसे मां उसके लिए पिता है और
पिता उसके लिए घोड़ा।
3) ऐसी निर्दोष आँखें है उस बच्चे की
कि वो घंटों निहार सकता है मजदूर को मसाला मिलाते
उसे छेनी हथौड़ी पेचकस लगते हैं दिलकश
उसे बुलडोजर देखकर लगता है
नींद से थोड़ी देर पहले
देवता अपनी लीला करते हैं
4) विद्या क्या है?
यह पूछने पर उसने बताया डांस करना
फिर कहा सोचकर गूगल
इसके बाद मुझे पूछने की इच्छा नहीं हुई
विद्या की देवी कौन है?
5) घर इसलिए घर है
कि घर के भीतर जो सबसे छोटा है
उसकी सबसे अधिक कद्र है
बाहर निकलकर देखिए
छोटे आदमी के लिए
दुनिया कितनी मुश्किल है।
6) उसे लगता ही नहीं वो छोटा है
मेरे खड़ा होने पर वो मेरी जेब जितना बड़ा है
बैठ जाने पर छाती जितना
थोड़ा और बड़ा कैसे होगे?
वो कहता है
मशीन में डालकर बड़ा हो जाऊंगा जल्दी।
रविवार, 8 फ़रवरी 2026
देहभाषा
यह बात किसी शास्त्र में लिखी तो नहीं
मगर तय है कि
किसी भी सफ़ल हत्या के पीछे
एक पुरुष का हाथ ज़रूर होता है।
वह किसी भी शक्ल में तुम्हारे पास आ सकता है
भाई, मित्र, छात्र या राष्ट्र का प्रमुख भी।
जब कोई हत्यारा आए तो उसे
तत्काल क्षमा कर दो
न लिंग, न आयु, न जाति, न धर्म
किसी भी भेदभाव से मत देखो उसे
लंबी उम्र की कामना करो।
वह बेहद उग्र दिख रहा हो तो भी
कोशिश रहे कि कुछ देर शांत हो सके।
उन बेहद नाज़ुक मौन क्षणों में संभव है
वह हत्या से पहले भी
थोड़ा सा मुस्कुराना सीख जाए
उसके भीतर करुणा जगे
या ग्लानि भी।
हो सकता है वो हत्या का आदी नहीं हो
अब तक सिर्फ गाड़ी के शीशे तोड़ना
गालियां बकना और गर्व से भर जाना ही सीखा हो।
उन बेहद नाज़ुक क्षणों में संभव है
वह तुम्हारे पास गलती से भेजा गया हो
और वो पश्चाताप से भर जाए
कि तुमने उसे पहली हत्या करने से बचा लिया।
हो सके तो हत्यारे से मुस्कुराते हुए कहो
कि हत्या सिर्फ शरीर की हो सकती है
विचारों की नहीं
इसीलिए अधूरी हत्याओं के सभ्य इतिहास में
क्यूं अपना नाम दर्ज़ करना?
उसका इरादा बदल जाए तो
इसे जीतने की तरह नहीं,
जिम्मेदारी की तरह देखना।
उसने यदि अब तक सिर्फ सूखा गर्व करना सीखा हो
तो ऐसे में उसे पानी ज़रूर पूछना।
तुम्हारी हत्या के बाद भी संभव है
तुम्हारा दिया हुआ पानी
उसके भीतर का सूखा ख़त्म कर डाले
और एक हत्यारे की आंखों में उतर आए।
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
प्रेम ऋण
क़र्ज़दार हूं उन आंखों का
जिन्हें सिर्फ़ सुन्दर दिखा।
एक लड़की जिसने प्रेम में
मेरे हर अक्षर को वाक्य समझा
और हर वाक्य को महाकाव्य
मेरी हर मौन उदासी में रोई
मेरे एहसास के साथ ही सोई
यह भरम ही सही जीवन का
मेरे होने से ही उसका जीवन है।
शुक्रवार, 9 जनवरी 2026
प्रश्न
क्या इस पृथ्वी पर एक भी ऐसा देश नहीं
जहां सब घड़ियों में अच्छा समय हो
क्या नहीं कोई ऐसी नदी
जहां मछलियां एक दूसरे का भोजन नहीं बनतीं
क्या मेरे पास एक भी ऐसी कविता नहीं
जिसे कोई उदास औरत अपने अकेलेपन में गुनगुना सके
क्या नहीं कोई एक भी पंक्ति
जिसे बच्चे को लोरी की तरह सुना सकें माएं
या एक भी ऐसा शब्द जिससे
हिंसा दूर दूर तक न झलकती हो
क्या नहीं मेरे पास कोई एक भी याद
जिसे प्रलय के समय मुस्कुराते हुए जेब से निकालूं
या एक भी यात्रा नहीं बची मेरे पास
जिसमें बिछड़ने का दृश्य विचलित न करे।
कहां से लाऊं, कहां को जाऊं।
रविवार, 28 दिसंबर 2025
रेडियो पर लाइव कमेंट्री के दौरान क्या करें और क्या नहीं
पटना सिख धर्म के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की धरती है। उनकी जयंती पर तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में कई वर्षों से भव्य प्रकाश पर्व आयोजित होता है।
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025
तेज़ आंच पर पाकिस्तान मीट मसाला डालकर दस सीटी में तैयार हुई देशभक्ति थाली है धुरंधर
OTT दौर की फिल्मों और मसाला वेबसीरीज़ों ने भारत सरकार के देशभक्ति वाले मिशन को इस कदर प्रभावित किया है कि इस दौर की देशभक्ति भी सस्ता प्रोपेगैंडा नज़र आती हैं। ताज़ा उदाहरण है "धुरंधर।"
अगर आपने मिर्ज़ापुर देखी हो तो एक बड़े पतीले में मिर्ज़ापुर की नकली बंदूकों वाले किस्से मिलाइए, गद्दी कौन संभालेगा की बहस स्वादानुसार डालिए। ऊपर से गैंग्स ऑफ वासेपुर भी छिड़क दीजिए। विश्वगुरु भारत का डिफेंस मास्टरप्लान थोड़ी देर में पककर दर्शकों को परोसने के लिए तैयार है।
इस फिल्म ने हाल में सोशल मीडिया पर इतना शोर मचाया है कि लगा इसे नहीं देखना देशद्रोह में न शामिल मान लिया जाए। लेकिन अगर आपने अब तक इसे नहीं देखा है तो बेहतर है किसी और बेहतर फिल्म का इंतज़ार कर लें। कांधार विमान अपहरण से शुरू होते हुए फिल्म इतनी लंबी और उबाऊ होती जाएगी कि आप विमान में बैठकर दिल्ली से कोलंबो पहुंच सकते हैं।
फिर भी अगर आपको फिल्म देखनी ही है तो ये बता देना ज़रूरी है कि आप नाश्ते से लंच तक का इंतज़ाम अपने साथ रखें और बच्चों को पड़ोसी के यहां रखकर जाएं। इतना खून बुरी तरह बहाया जाएगा कि कमज़ोर दिलवाले जेन ज़ी के लड़के भी आँखें बंद कर के कई दृश्य देख पाएंगे।
अगर आप अब भी कहानी जानने की इच्छा रखते हैं तो देश के लिए वो भी बता देना ज़रूरी है। कहानी में भारत की सुरक्षा एजेंसी का एक ख़ास मिशन धुरंधर है जो एक ऐसा NIA चीफ तैयार करता है जो सरकारें और दशक बदलने के बावजूद चीफ बना रहता है।
चूंकि भारत की सुरक्षा का सवाल है तो बिना पाकिस्तान और मुसलमान की फ़ज़ीहत किए बिना बन ही नहीं सकता। तो अब चलिए पाकिस्तान और कराची का टूरिस्ट पैकेज लीजिए। वहां के लोकल गुंडे कब बड़े आतंकवादी बन जाएं, पता नहीं, लेकिन लगभग हर गुंडा सड़कछाप गालियां बकता है, होमोसेक्सुअल भी है।
"हिंदू बहुत डरपोक कौम है।" "हिंदुस्तानियों के सबसे बड़े दुश्मन हिंदुस्तानी हैं, पाकिस्तान दूसरे नंबर पर आता है" इस तरह के डायलॉग बोलकर फिल्म के पात्र आपके भीतर आक्रोश का प्रतिशत बढ़ाने की पूरी कोशिश करेंगे मगर आपने घबराना नहीं है।
फिल्म में कुछ रोमांस भी है। तो रणबीर सिंह जो एक गुंडे का सबसे छोटा प्यादा है, उसको सीधा विधायक की बेटी से प्यार हो जाता है। फिर वो बाइक पर घूमेंगे, लड़की इंप्रेस हो जाएगी। पेट्रोल झूठमूठ का ख़त्म हो जाएगा। दोनों पैदल घर तक आयेंगे। लड़की और इंप्रेस हो जाएगी। पाकिस्तान की सड़कें इतनी अच्छी और पुलिस इतनी ख़ाली है कि सब इन दोनों आशिकों को शहर भर में दौड़ाएंगी, पकड़ नहीं पाएंगी।
फिर कहानी में संजय दत्त को भी आना है। अक्षय खन्ना की इतनी तारीफ मैंने पिछले बीस साल में नहीं सुनी, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं है जो "दिल चाहता है" से बेहतर हो। इतने बड़े गुंडे (आतंकवादी) और इतने लोकल टाइप मारपीट के सीक्वेंस है कि लगेगा वो भारत के खिलाफ नहीं दो पीस चिकन के लिए लड़ रहे हैं।
इसके बाद फिल्म मे कुछ बचता है तो वो अच्छा भी है। संसद पर हमला, मुंबई में ताज हमला और इन सबके पीछे के कनेक्शन समझाने की कोशिश पहली बार किसी फिल्म में एक साथ दिखी है।
एक पुराने और अनुभवी दर्शक की तरह कहूं तो इसे वेबसीरीज़ ही बनाने की योजना रही होगी जो अचानक से फिल्म बना दी गई, इसीलिए ज़्यादा बोरियत हुई वरना फिल्म के सभी मसाले मौजूद हैं। फिल्म एक बार शुरू होगी तो ख़त्म ही नहीं होगी। और जब ख़त्म होगी तो कहानी किसी वेबसीरीज़ की तरह अगले भाग का ऐलान भी करेगी।
गुरुवार, 4 दिसंबर 2025
चार दिसंबर की चिट्ठी
जनवरी को नहीं होना था ऐसा
कि ठंड में एम्स की पर्ची कटानी पड़े
कोहरा सिर्फ शहर में ही नहीं
जीवन में प्रवेश कर जाए।
फरवरी में डॉक्टर बताए कि
नहीं बची है उम्मीद साल पूरा कर पाने की
बसन्त की आहट से लगे डर
और मार्च की एक दोपहर
हम तय कर रहे हों कि
कीमो के लिए सरकारी बेहतर या प्राइवेट
अप्रैल में जब शुरू हो इलाज
क़र्ज़ या मदद तो छोड़िए
मिलने जुलने से भी कतराने लगे परिवार समाज
दवाई की कड़वाहट और हर तरफ़ अवसाद
मई में भी नहीं किसी अच्छे दिन की याद
जून में सिर्फ शरीर रह गया सूख कर
आत्मा इलाज में निचोड़ दी गई
जुलाई अगस्त तक याद हो गई दिनचर्या
पहले कीमो चढ़ेगा
फिर बारिश आयेगी
फिर बुखार आयेगा
फिर सांत्वना के लिए लोग
फिर कड़वी दवाएं
और यही अंतहीन चक्र चलता रहेगा
सितंबर तक सीख चुकी बेटी
बिना खाए हंसना
और बिना रोए जीना
अक्टूबर में छूट गई नवंबर की तैयारी
वेटिंग की टिकट और गांव लौटने की मारामारी
अब तो यह भी याद नहीं
कि आखिरी बार किस नवंबर माथा टेका था
खरना में हमने एक साथ।
कब लड़े थे कि कितने बजे ठेकुआ प्रसाद बनना शुरू होगा
हमारे दिसंबर में एक दिन मुस्कुराता था
तब भी और अब भी
यह उसी तारीख का एक ख़त है तुम्हारे नाम
ये अभिशप्त चिट्ठी ख़ुद ही लिखनी है
और ख़ुद ही पढ़नी है सैंकड़ों बार
काश इस चिट्ठी को उम्मीद के साथ ख़त्म किया जा सकता था -
विशेष मिलने पर।
निखिल आनंद गिरि
शुक्रवार, 7 नवंबर 2025
एक पीठासीन अधिकारी की डायरी
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025
पायल की झंकार
मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025
अलिफ़ की तरह हूं, बिल्कुल अकेला
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025
मैं बुरा था जब तलक ज़िंदा रहा
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025
कीमोथेरेपी: शोक और यथार्थ
शनिवार, 9 अगस्त 2025
ग़लत पता
मंगलवार, 15 जुलाई 2025
फ़िक्र
सोमवार, 23 जून 2025
एक आईने का ख़त
रविवार, 22 जून 2025
भयानक अंधेरे में दीवार टटोलते कवि का संग्रह है – ‘गीली मिट्टी पर पंजों के निशान’
इस संग्रह की कविताएँ सिर्फ अतीत की मीठी गोलियां ही नहीं, अतीत की बुनियाद पर वर्तमान में खड़े कवि और उसके भविष्य की शंकाएँ भी बताती हैं। एक छोटी कविता है, जो इस संग्रह की दूसरी कविता है - ‘वह’, देखिए -
वह गली नुक्कड़ पर तनकर खड़ा था।
लोग आते जाते सिर नवाते चद्दर चढ़ाते उसको।
दीमक ने अपना महल बना लिया था, अंदर ही अंदर उसके।
मैंने जब वरदान मांगा तो वह ढह गया। (कविता – वह)
दीमक का महल बना लेना एक दिन की प्रक्रिया नहीं होती। लंबा समय लगता है। दीमक जहां घर बना ले, उस जगह को छोड़ देना ही बेहतर होता है। एक कवि अगर इस ख़तरे को पहचानता है तो उसे पढ़ा जाना चाहिए। उस कवि ने अपने समय में, इन कविताओं के रचना काल के लिहाज़ से देखें तो पंद्रह सालों के दौरान, इस दीमक को महल बनाते देखा है और उसमें एक कवि का डर यह है कि वह इन दीमकों से बचकर कहीं नहीं जा सकता। यह बचपन या डर की मीठी स्मृतियां कवि के डर की निर्मिति और प्रवेश भी कविताओं के ज़रिए बताती है।
यह डर सिर्फ मनुष्य के भीतर पनप रहा डर नहीं है। वह हर तरफ से आता है, हर तरफ़ पसरता है। एक बाघ जो शिकारियों से घिर चुका है, वह पलटकर कहता है – ‘मैं तुम्हारे बच्चों के लिए बहुत ज़रूरी हूं, मुझे मत मारो’
बाघ फ़रीद की कई कविताओं में कई तरह से आता है। मां ने बाघ के आकार वाली रोटी अपने बच्चे को खाने में दी, नानी के चश्मे से बच्चे बाघ की तरह दिखते हैं।
बाघ से याद आया कि इस कविता के आवरण पृष्ठ पर उदय प्रकाश की टिप्पणी है, जो उन्होंने ‘एक और बाघ’ कविता की तारीफ़ में कही थी। यह कविता अंधेरे में कंदील की तरह है, हाशिये में पड़ी एक ऐसी कविता जो हिंदी कविता में एक प्रस्थान बिंदु की तरह है और आकस्मिक है। यह टिप्पणियां कविता संग्रह के शुरू में नहीं देनी चाहिए वरना रणजी ट्रॉफी में विराट कोहली के खेलने से पैदा हुई अश्लील भव्यता जैसा ख़तरा रहता है। बहरहाल..
जिन कविताओं में शहर, डर, भविष्य, ख़तरा जैसे तत्त्व एक साथ गुंथकर आते हैं, कविता मारक बनकर उभरती है।
‘मैंने पूछा उससे केवल एक ही सवाल
जिसने उठा रखा था हथियार क्रांतिकारी के वेश में,
बस एक ही सवाल,
कि अगर सौंप दी गई देश की बागडोर तुम्हें,
तो पहला काम क्या होगा जो तुम करोगे?
हमारा पक्ष चाहिए तो देना होगा जवाब!!!
उसने चला दी गोली, और मैं मारा गया सरेआम!!!! (कविता – मारा गया मैं)
इस तरह से देखें तो यह संग्रह फ़रीद ख़ां की स्मृति, शहर और डर की सूक्ष्म पहचान और उसमें भविष्य के ख़तरे पहचानने का संग्रह है। वर्तमान का डर और भविष्य का ख़तरा इतना अधिक है कि मजबूरी में स्मृतियों के सहारे ख़ुद को पुचकारने की कोशिश की गई है। जैसे फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में ख़तरे को ‘’ ALL IS WELL” कहकर टरकाता नायक। असलियत यह है कि फ़रीद ख़ां नाम के कवि के पास वर्तमान में मीठी स्मृतियां बस लॉलीपॉप की तरह ही हैं, और इस व्यवस्था या सत्ता में कुछ मीठा सोचने को नहीं है।
पटना की स्मृति में छठ का आना (कविता – छठ की याद में) या गंगा के पानी का मस्जिद को लात मारकर छेड़कर कहना कि ‘अबे मुसलमान, कभी मेरे पानी स नहा भी लिया कर’ (कविता – गंगा मस्जिद) अनायास नहीं है। यह एक इंसानियत का सपना संजोते हिंदुस्तानी कवि का बारीकी से कविता में राजनैतिक दख़ल है। कविता गंगा की छेड़छाड़ से अठारह साल बाद उस मीनार पर पहुंचकर देखती है कि सरकार ने अब वुज़ू के लिए साफ पानी की सप्लाई करवा दी है। गंगा कवि को देखती है, कवि गंगा को मगर मस्जिद किसी और तरफ़ देख रही है।
जिस रिदम में यह आलेख लिख रहा हूं, उसमें कवि की प्रेम कविताओं का ज़िक्र न किया जाना ही लाज़िम है। कुछ अच्छे मुहावरे हैं (तुमने मुझे सेंका और पकाया है), मेटाफ़र हैं, मगर यह कवि का मूल स्वर नहीं है।
फ़रीद की कविताओं में किस्सागोई बहुत है। लगभग हर कविता कहानी से शुरू होकर कविता बन जाती है। डर की कहानी है। बाघ की कहानी है। लकड़ सुंघवा की कहानी है। दादाजी साइकिल वाले की कहानी है जो इंदिरा गांधी की हत्या पर गुरु नानक की तरह सिर झुकाए निर्विकार से बैठे थे। कंस्ट्रक्शन साइट पर रोटी सेंक रही आदिवासी औरत, व्यवस्था से तंग आकर मजबूरी में नक्सली बने आम आदमी की कहानी है, हत्यारे तक की कहानी है।
कुछ कविताओं के विषय या कहानियां अच्छी हैं, मगर कविता नहीं। कविता की शुरुआत ही एक अच्छी पंक्ति या सूक्ति से होती है और फिर पूरी कविता अपने पूरा होने की औपचारिकता ढोती है। कई बार यह सूक्ति भी अपने आप में एक मुकम्मल कविता या हिंदी काव्य पंक्तियों में पैराडाइम शिफ्ट की तरह हैं –
उसकी बीवी ने अपनी जान बचाने कि लिए आत्महत्या कर ली (कविता – सोने की खान)
वह पंजा ही है जो बाघ और साहित्यकार को बनाता है समकक्ष।
दोनों ही निशान छोड़ते हैं।
मारे जाते हैं। (कविता – बाघ के पंजे)
देश को ज़रूरत है सच के प्रशिक्षण की। (कविता – इंसाफ़)
अब अख़बार पढ़ने से ज़्यादा बेचने के काम आते हैं (कविता -बिक रहे हैं अख़बार)
हिंसा का इतिहास पुरुषों का इतिहास रहा है। (कविता - अपमान की परम्परा का इतिहास)
आज़ान की आवाज़ नहीं थी मेरे कान में पहली आवाज़। वह मां की चीख़ थी। (कविता – मैं काफ़िर हूं)
कुछ कविताए इस कसौटी पर भी अद्भुत हैं जैसे – ‘क्यों लगता है ऐसा’
पता नहीं क्यों हर बार लगता है,
रेल पर सफ़र करते हुए कि टीटी आएगा और टिकट देखकर कहेगा
कि आपका टिकट ग़लत है
या आप ग़लत गाड़ी में चढ़ गए हैं...
संग्रह में शिल्प के लिहाज़ से अच्छी और अनुभव की दृष्टि से साहसी कविताओं की कमी नहीं – जैसे मुस्कुराहटें, अल्लाह मियां, चांद, पिटने वाली औरतें, धोखा, मादक और सारहीन।
इस तरह से कुछ ख़राब कविताओं का ज़िक्र भी यहां किया जा सकता था, मगर पंक्तियों के बीच बहुत कुछ छोड़ देना भी ज़रूरी होता है।
कविता संग्रह - गीली मिट्टी पर पंजों के निशान
मूल्य - 260/- रुपए
प्रकाशक - सेतु प्रकाशन
कुल पृष्ठ - 144
गुरुवार, 17 अप्रैल 2025
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