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बुधवार, 8 जुलाई 2026

"सतलुज" फिल्म के बहाने

"यहां गोली मार देने के लिए
ये ज़रूरी नहीं कि आपका झगड़ा हो 
इतनी वजह काफ़ी है कि
आपके पास बंदूक है"

मुझे लगता है कि हमारी सरकार हमें "सतलुज" फिल्म के बारे में चर्चा करने के लिए उकसाना चाहती थी, इसीलिए ban कर दिया। उसका धन्यवाद।

ऐसा बैन गजब है, जिसमें सरकार को लगता है "सब चंगा सी" और यहां हर कोई फिल्म देखने के बाद ही बात कर रहा है।
मुझे इस फिल्म पर कुछ नहीं कहना है। ये सिर्फ पंजाब पुलिस की कहानी नहीं है। एक पुलिसवाले के घर में मेरी परवरिश हुई है, बिहार - झारखंड के कई थानों में बचपन गुज़रा है। उल्टा लटका के मार खाते लोग मेरी यादों का हिस्सा हैं। कोई केपीएस गिल या सुग्गा या बिट्टा नहीं, हजारों की तनख़ाह वाले मामूली सिपाही भी वर्दी पहनकर बिना किसी आदेश के घंटों मार सकते हैं। और कोई "आदेश" आ जाए तो फिर कहना ही क्या।
एक घटना याद है, जिसमें मधुबनी के एक थाने में दो अभियुक्तों को एक दूसरे के मुंह में पेशाब करवा दिया था कि सच बोल दें। 
चाईबासा में एक बार एक एसपी की गाड़ी के बगल से एक ट्रक थोड़ा सट कर गुज़र गया था तो तुरंत सूचना मिलने पर, अगले थाने पर, जहां मेरा बचपन था, उस ड्राइवर की ऐसी कुटाई हुई कि मेरा कभी एसपी बनने का मन नहीं हुआ। जो थाना प्रभारी थे, बाद में नक्सली हमले में शहीद हुए।
मुझे लगता है समस्या पुलिस की ट्रेनिंग में है। अगर वर्दी पहनकर आपको मानवाधिकार नहीं समझ आता तो फिर कितने भी कार्यकर्ता मिलकर सिस्टम को ठीक नहीं कर सकते। छोटे से बड़े स्तर के सभी पुलिस अधिकारियों को ह्यूमन राइट्स की पढ़ाई और प्रैक्टिकल अच्छे से करवाया जाना चाहिए। 
सिर्फ पुलिस ही क्यों, हर पेशे में ये सॉफ्ट स्किल्स बहुत ज़रूरी हैं। वरना क्या मजाल कि पोस्टमार्टम के लिए खड़ी डॉक्टर के सामने से कोई निर्दयी पुलिसवाला तड़पता शरीर खींच कर ले जाए और वापस दो गोलियां मार कर ले आए कि लो अब डेड बॉडी में शामिल कर लो। 
फिल्म में बहुत बचाकर ही चीज़ें दिखाई गई हैं, महिलाओं को सुग्गा "बेबे" कहकर आदर से बुलाता है, हमारे यहां "मादर" से भी बुला लेते हैं। तो मुझे लगता है।
मुझे जसवंत के बेटे-बेटियों के बारे में जानना है, उनसे बात करनी है। अगर कहानी 95 की है तो उनकी उम्र मेरे से थोड़ी ही छोटी बड़ी होगी। किसी को पता हो तो मेरा प्यार पहुंचाइएगा। 
फिलहाल इतना ही..


निखिल आनंद गिरि

ये पोस्ट कुछ ख़ास है

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