बुधवार, 8 जुलाई 2026
"सतलुज" फिल्म के बहाने
सोमवार, 18 मई 2026
"कर्तव्य" फिल्म का नाम "फादर इंडिया" भी हो सकता था
मगर एक बात तो माननी पड़ेगी। रोल एकदम कायदे का मिला है बंदे को। जो दिखता है, वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं। ऑस्कर की जगह एक 'बस कर" अवार्ड शुरू करूंगा तो सौरभ को नॉमिनेट ज़रूर करुंगा।
जो बंदा सब कुछ कर सकता है वो दरअसल कुछ नहीं कर सकता। यही बात सौरव द्विवेदी के स्क्रिप्ट राइटर ने उन्हें कभी बताई नहीं।
वो लल्लनटॉप जैसे फालतू नाम से एक भरोसेमनंद न्यूज चैनल खड़ा कर सकते हैं। पत्रकारिता करते करते डिनर टेबल पर गृह मंत्री के सामने ऐसे झुकते हैं कि वायरल हो जाते हैं। फिर अपने गांव में पुस्तकालय खोलने की ब्रांडिंग में पैसा वसूल कुविश्वसनीय लोगों को मंच पर बुला लेते हैं। रील के ज़माने में इतने लंबे लंबे इंटरव्यू लेते हैं कि थक हारकर उन्हें फिल्म में कोई रोल दे देता है। वो सबसे बड़ा विलेन का रोल से कम पर राज़ी ही नहीं होते और फिर "कर्त्तव्य" नाम की फिल्म में जब सैफ अली खान और संजय मिश्रा अपनी दमदार एक्टिंग का कर्त्तव्य निभाते हुए आनंद श्री उर्फ भूतपूर्व लल्लनटॉप सौरव द्विवेदी के पास जाते हैं तो ऐसी डायलॉगबाजी करते हैं कि टेलीप्रॉन्पटर भी शर्मा जाए।
फिल्म में क्लाइमैक्स ज़बरदस्त है। हमारी फिल्में "मदर इंडिया" से "फादर इंडिया" तक का सफर पूरा कर जुकी हैं। मदर इंडिया में जहां मां ने अपने बेटे को मार दिया था, यहां एक बेटे ने अपने पिता को ही मार दिया। इसके लिए "बस कर" अवार्ड का नॉमिनेशन आता ही होगा।
खैर, फिल्म अच्छी है। Netflix पर है। एक बात ज़रूर देखी जा सकती है। ठंड रखिए, जितने क्विंटल का लेख सौरभ द्विवेदी की आलोचना में सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है, वह इस फिल्म में उसका छंटाक हिस्सा भर भी नहीं हैं। उनके अलावा पूरी फिल्म में सबकी एक्टिंग अच्छी है।
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025
तेज़ आंच पर पाकिस्तान मीट मसाला डालकर दस सीटी में तैयार हुई देशभक्ति थाली है धुरंधर
OTT दौर की फिल्मों और मसाला वेबसीरीज़ों ने भारत सरकार के देशभक्ति वाले मिशन को इस कदर प्रभावित किया है कि इस दौर की देशभक्ति भी सस्ता प्रोपेगैंडा नज़र आती हैं। ताज़ा उदाहरण है "धुरंधर।"
अगर आपने मिर्ज़ापुर देखी हो तो एक बड़े पतीले में मिर्ज़ापुर की नकली बंदूकों वाले किस्से मिलाइए, गद्दी कौन संभालेगा की बहस स्वादानुसार डालिए। ऊपर से गैंग्स ऑफ वासेपुर भी छिड़क दीजिए। विश्वगुरु भारत का डिफेंस मास्टरप्लान थोड़ी देर में पककर दर्शकों को परोसने के लिए तैयार है।
इस फिल्म ने हाल में सोशल मीडिया पर इतना शोर मचाया है कि लगा इसे नहीं देखना देशद्रोह में न शामिल मान लिया जाए। लेकिन अगर आपने अब तक इसे नहीं देखा है तो बेहतर है किसी और बेहतर फिल्म का इंतज़ार कर लें। कांधार विमान अपहरण से शुरू होते हुए फिल्म इतनी लंबी और उबाऊ होती जाएगी कि आप विमान में बैठकर दिल्ली से कोलंबो पहुंच सकते हैं।
फिर भी अगर आपको फिल्म देखनी ही है तो ये बता देना ज़रूरी है कि आप नाश्ते से लंच तक का इंतज़ाम अपने साथ रखें और बच्चों को पड़ोसी के यहां रखकर जाएं। इतना खून बुरी तरह बहाया जाएगा कि कमज़ोर दिलवाले जेन ज़ी के लड़के भी आँखें बंद कर के कई दृश्य देख पाएंगे।
अगर आप अब भी कहानी जानने की इच्छा रखते हैं तो देश के लिए वो भी बता देना ज़रूरी है। कहानी में भारत की सुरक्षा एजेंसी का एक ख़ास मिशन धुरंधर है जो एक ऐसा NIA चीफ तैयार करता है जो सरकारें और दशक बदलने के बावजूद चीफ बना रहता है।
चूंकि भारत की सुरक्षा का सवाल है तो बिना पाकिस्तान और मुसलमान की फ़ज़ीहत किए बिना बन ही नहीं सकता। तो अब चलिए पाकिस्तान और कराची का टूरिस्ट पैकेज लीजिए। वहां के लोकल गुंडे कब बड़े आतंकवादी बन जाएं, पता नहीं, लेकिन लगभग हर गुंडा सड़कछाप गालियां बकता है, होमोसेक्सुअल भी है।
"हिंदू बहुत डरपोक कौम है।" "हिंदुस्तानियों के सबसे बड़े दुश्मन हिंदुस्तानी हैं, पाकिस्तान दूसरे नंबर पर आता है" इस तरह के डायलॉग बोलकर फिल्म के पात्र आपके भीतर आक्रोश का प्रतिशत बढ़ाने की पूरी कोशिश करेंगे मगर आपने घबराना नहीं है।
फिल्म में कुछ रोमांस भी है। तो रणबीर सिंह जो एक गुंडे का सबसे छोटा प्यादा है, उसको सीधा विधायक की बेटी से प्यार हो जाता है। फिर वो बाइक पर घूमेंगे, लड़की इंप्रेस हो जाएगी। पेट्रोल झूठमूठ का ख़त्म हो जाएगा। दोनों पैदल घर तक आयेंगे। लड़की और इंप्रेस हो जाएगी। पाकिस्तान की सड़कें इतनी अच्छी और पुलिस इतनी ख़ाली है कि सब इन दोनों आशिकों को शहर भर में दौड़ाएंगी, पकड़ नहीं पाएंगी।
फिर कहानी में संजय दत्त को भी आना है। अक्षय खन्ना की इतनी तारीफ मैंने पिछले बीस साल में नहीं सुनी, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं है जो "दिल चाहता है" से बेहतर हो। इतने बड़े गुंडे (आतंकवादी) और इतने लोकल टाइप मारपीट के सीक्वेंस है कि लगेगा वो भारत के खिलाफ नहीं दो पीस चिकन के लिए लड़ रहे हैं।
इसके बाद फिल्म मे कुछ बचता है तो वो अच्छा भी है। संसद पर हमला, मुंबई में ताज हमला और इन सबके पीछे के कनेक्शन समझाने की कोशिश पहली बार किसी फिल्म में एक साथ दिखी है।
एक पुराने और अनुभवी दर्शक की तरह कहूं तो इसे वेबसीरीज़ ही बनाने की योजना रही होगी जो अचानक से फिल्म बना दी गई, इसीलिए ज़्यादा बोरियत हुई वरना फिल्म के सभी मसाले मौजूद हैं। फिल्म एक बार शुरू होगी तो ख़त्म ही नहीं होगी। और जब ख़त्म होगी तो कहानी किसी वेबसीरीज़ की तरह अगले भाग का ऐलान भी करेगी।
मंगलवार, 5 नवंबर 2024
भोजपुरी सिनेमा के चौथे युग की शुरुआत है पहली साइंस फिक्शन फिल्म "मद्धिम"
बहुत सम्मान करने लायक बात है। कोई फूहड़ दृश्य या गाना या संवाद पूरी फिल्म में कहीं नहीं मिलेगा।
रविवार, 20 अक्टूबर 2024
स्त्री 2 - सरकटे से डर नहीं लगता साहब, फ़ालतू कॉमेडी से लगता है
सोमवार, 15 मई 2023
'बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ' के शोर के बीच देखिए स्त्री होने की 'दहाड़'
गुरुवार, 20 दिसंबर 2018
साल 2018 की सबसे अच्छी फिल्म है 'बागली टॉकीज़'
जब हम साल 2018 को याद करेंगे तो बेशक पद्मावत,
संजू, राज़ी, अंधाधुन, स्त्री और केदारनाथ का नाम सबसे अच्छी फिल्मों के तौर पर
याद आएगा, मगर मेरे लिए इस साल की सबसे अच्छी और दिल के क़रीब फिल्म है ‘बागली
टॉकीज़’।निखिल आनंद गिरि
शनिवार, 27 जनवरी 2018
जब चित्तौड़ जल रहा था, एक ब्राह्मण बंसी बजा रहा था
इससे पहले कि फिल्म के कुछ
मुद्दों पर कुछ कहूं, राजपूतों पर मेरा फ़िल्मी सामान्य ज्ञान
ज़ाहिर करने का वक्त आ गया है। राजपूत (मर्द) दो प्रकार के होते हैं – एक ‘भंसाली सेना’ के
राजपूत और दूसरे ‘करणी सेना’ के राजपूत। भंसाली सेना के राजपूत बहुत अच्छे, मज़बूत
उसूलों वाले होते हैं। वो एक बार दूसरी शादी कर लेते हैं, फिर
अपनी पहली पत्नी से पूरी फिल्म के दौरान बात तक नहीं करते। अपनी औरतों को जौहर
(सती) की परमिशन देकर युद्ध में लड़ने जाते हैं। जब भी युद्ध जैसी कुछ गंभीर
परिस्थिति आती है वो लंबे-लंबे गाने गाते हैं और 'राजपूत ये-राजपूत वो' करते रहते
हैं। करणी सेना के राजपूत को हम डिजीटल इंडिया में देख ही रहे हैं। वो जी डी
गोयनका स्कूल की बस के शीशे तक तोड़ देते हैं। उनके डर से स्कूली बच्चे, महिलाएं दुबक कर बैठ जाती हैं। वो अर्नब गोस्वामी के शो में अंग्रेज़ी में
बात करते हैं। और अपनी गुंडागर्दी का सही फिल्मांकन नहीं होने पर संजय लीला भंसाली
को थप्पड़ भी मारते हैं। ![]() |
संजय लीला भंसाली की इस पौने
तीन घंटे की फिल्म में ‘राजपूत’ शब्द हर दूसरे मिनट पर एक बार बोल दिया गया है। आज की तारीख में इससे
मिलता-जुलता शब्द ‘विकास’ है, जो भक्त किस्म के लोग हर सांस के साथ बोलने के आदी हैं।
खिलजी के डायलॉग, नाच-गाने की वजह से फिल्म मज़ेदार दिखती है। राजपूत सेनापति
का वो शॉट जिसमें वो गर्दन कटने के बाद भी तलवार भांजता है, रोंगटे
खड़े करने वाला है।मगर जैसे ही हम चित्तौड़ प्रवेश करते हैं, वहां एक छत से राजपूत बहादुर इतनी दूर तक देख लेता है, जितनी दूर से चित्तोड़ आने में खिलजी को सुबह से शाम हो जाए। ऐसे ‘दूरदर्शी’, बहादुर लोगों का इतिहास जौहर वाली
रानियों के साथ ही लिखा गया, इसीलिए बार-बार इस काम के लिए
भंसाली को कोसना ठीक नहीं।शुक्रवार, 23 जून 2017
इस देश का हर दर्शक ‘ट्यूबलाइट’ है, जिसे सलमान खान पसंद है
तो इस तरह ‘ट्यूबलाइट’
सलमान के यक़ीन की फिल्म है, जिसे इस बार ईद तो क्या नरेंद्र मोदी
भी फ्लॉप होने से नहीं बचा पाएंगे, ऐसा मेरा यक़ीन है। फ्लॉप-हिट तो ख़ैर अपनी जगह
है, फिल्म में बेवकूफी का भी एक लॉजिक होता है, जो सलमान की फिल्मों में नहीं है।
अच्छा हुआ कि वो इस फिल्म के प्रोड्यूसर ही बने, निर्देशक नहीं वरना एकाध अच्छे
गाने और सुंदर कैमरा भी दर्शकों को नसीब नहीं होता। शनिवार, 1 अप्रैल 2017
देश के लिए ही सही, 'अनारकली ऑफ आरा' ज़रूर देखिए
निखिल आनंद गिरि
बुधवार, 8 मार्च 2017
विशाल भारद्वाज को ‘रंगून’ हो जाए तो बचना मुश्किल है
शनिवार, 28 जनवरी 2017
शाहरूख ही सनी लियोनी है, शाहरूख ही सनातन सत्य है !
डियर ज़िंदगी’ के बाद अगर आप
शाहरूख खान से बहुत ज़्यादा उम्मीदें लगाए बैठे थे तो आप अत्यंत भोले दर्शक हैं।
शाहरूख इस फिल्म में वही करते नज़र आते हैं जो हर दौर में हिट होने के लिए नौसिखिए
लोग करते रहे हैं। फिर 50 साल के बाद
शाहरूख को ऐसा करने की ज़रूरत क्यूं पड़ी, ख़ुदा जाने! एक ऐसा डॉन जो मरते-मरते भी तीन-चार बेस्टसेलर डायलॉग मारकर जाएगा
और फिल्म इंडस्ट्री पर एहसान कर जाएगा। गुरुवार, 29 दिसंबर 2016
‘डियर 2016’ के ‘दंगल’ में ‘उड़ता’ बॉलीवुड
‘वज़ीर’ अमिताभ बच्चन के लिए एक और शानदार फिल्म रही।
कोरियन फिल्म ‘मोंटाज’ मैं देख चुका था इसीलिए इसकी हिंदुस्तानी नकल
में मेरी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। फिर भी महिला मित्र के साथ हॉल जाने का सुख
मैं कभी मिस नहीं करता।ये पोस्ट कुछ ख़ास है
"सतलुज" फिल्म के बहाने
"यहां गोली मार देने के लिए ये ज़रूरी नहीं कि आपका झगड़ा हो इतनी वजह काफ़ी है कि आपके पास बंदूक है" मुझे लगता है कि हमारी सरकार हम...
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कौ न कहता है कि बालेश्वर यादव गुज़र गए....बलेसर अब जाके ज़िंदा हुए हैं....इतना ज़िंदा कभी नहीं थे मन में जितना अब हैं....मन करता है रोज़ ...
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छ ठ के मौके पर बिहार के समस्तीपुर से दिल्ली लौटते वक्त इस बार जयपुर वाली ट्रेन में रिज़र्वेशन मिली जो दिल्ली होकर गुज़रती है। मालूम पड़...
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कवि मित्र अंचित ने जर्नल इंद्रधनुष पर कुछ दिन पहले मेरी कुछ कविताएं पोस्ट की थीं जिस पर एक सुधी पाठिका की विस्तृत टिप्पणी आई है। कीमोथेरेपी...







