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गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

दुनिया अब रात-रात लगती है..

जो उन्हें क़ायनात लगती है,
मुझको तो वाहियात लगती है।
आपको चांद इश्क लगता है
हमको उसकी बिसात लगती है।
हमसे इक ज़िंदगी भी जी न गई,
आपको दाल-भात लगती है।


हम भी आंखों में ख़ुदा रखते थे,
अब तो बीती-सी बात लगती है।

एक ही रात लुट गया सब कुछ,,
दुनिया अब रात-रात लगती है।
उनके नारों में इनकलाब नहीं,
जलसे वाली जमात लगती है।

आप कहते हैं डेमोक्रेसी है,
हमको चमचों की जात लगती है।

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आज़ाद भारत को महामहिम अमेरिका का संदेश !!


सारे जहां से अच्छा..
मैं अमेरिका हूं। मुझे गर्व है कि मैं भारत में भारत से ज़्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण हूं। सिर्फ भारत ही क्यों, दुनिया भर में सारे देश मुझे अपनी-अपनी शिद्दत से याद करना नहीं चूकते। कुछ सिरफिरे लोग ऐसा समझते हैं कि कई देश मुझे नफरत के रिश्ते से याद करते हैं। मगर, मैं बता देना चाहता हूं कि ये सब कोरी अफवाहें हैं। नफरत प्यार का ही आखिरी सिरा है। नफरत करने वाले गुपचुप प्यार करते हैं,सच्चा प्यार करते हैं। कम से कम भारत जैसे महान देश ने तो ये साबित कर ही दिया है। अमेरिका के नाम पर गालियां लिखने वाले किसी अमेरिकी अख़बार में कॉलम भेजकर छपने का इंतज़ार करते हैं। स्वदेशी स्वदेशी की रट लगाने वाले हिंदुस्तानी एक बार अमेरिका आना मोक्ष से कम नही समझते। सारे हिंदुस्तानी बिस्मिल्लाह खान तो होते नहीं कि बनारस के नाम पर अमेरिका को ठुकरा दें। अब तो तुम्हारे यहां रामदेव है। हरिद्वार की रोटी खाता है और अमेरिका में योग सिखाने के सपने देखता है। हमने हर कदम पर तुम्हारा साथ दिया है। तुम्हें पहनने को कपड़े दिए हैं। तुम्हें खाने को नई दुकाने दी हैं। तुम्हारी हिंदी तुम जितना बोलते हो, उससे कहीं ज़्यादा तो अब हमारे यहां लोग बोलते हैं। तुम हिंदुस्तानी ख़ुद को गौर से देखो। अमेरिकन ही लगते हो कई एंगल से। तुम्हें खुश होना चाहिए। गर्व होना चाहिए खुद पर। सुपर पावर का हिस्सा हो तुम। भले ही तुम्हारे मुल्क में पावर नहीं है चौबीस घंटे। हमने जहां तक हो सका है, दुनिया का भला चाहा है। भला किया भी है। दुनिया भर में हमें हर तरह के फैसले लेने की नैतिक आज़ादी है।

अपने यहां की पॉलिटिक्स को देखो। क्या मिला तुम्हें 1947 की आज़ादी से। संसद भवन से पैदल दूरी पर रोज़ सांसदों को गाली पड़ती है। पीएम को खुलेआम गालियां पड़ती हैं। प्रेसि़डेंट को गाली पड़ती है। अंटशंट (अनशन) होते हैं। आंदोलन होते हैं। चलो, किसी को गालियां तो मिलती हैं, तुम आम लोगों को लोकतंत्र के नाम पर क्या मिलता है। अन्ना, खन्ना, रामदेव, कामदेव, कांडा, पांडा, सुज़ुकी, फुजुकी, राहुल, आउल, मोदी और बहुत सारी बकचोदी। पूछो ज़रा अपने देश में। सात समंदर पार की दूरी से कोई हमें गाली दे सकता है क्या। पूछो इन सबको एक लाइन में खड़ा करके पूछो। कौन नहीं जानता कि भारत में खाने को पूरा अन्न तक नहीं जुटता है। और जिन लोगों तक अनाज आसानी से पहुंच जाता है, उनके लिए हम बेहद फिक्रमंद हैं। वो चमचमाते लोग और वो मरियल-सा अनाज। तभी तो हमने वॉलमार्ट जैसी कई महान संस्थाएं वहां की देखभाल के लिए भेजने का मन बना लिया है।  जो सत्य है, उसे मान लेने में क्या बुरा है। हमारे बिना तुम्हारा काम चल ही नहीं सकता। हम भगवान न सही, अन्नदाता तो हैं हीं। अणुदाता भी हैं। तुम्हारे परमाणु दाता भी। और किसने देखा है कि भगवान कैसे होते हैं।

अपने न्यूज़ चैनलों को देखो। अपने अखबारों को देखो। अपने इंजीनियरों को देखो। अपने कॉल सेंटर्स को देखो। सब हमारे भरोसे चलते हैं। हमारे यहां जब सुबह होती है, तो हमारे टट्टी जाने से पहले तुम नाइट शिफ्ट में जुत जाते हो। हमारे यहां कॉल करते हो। हमें अपनी पॉलिसी बेचते हो। सॉफ्टवेयर बेचते हो। हमसे गालियां खाते हो। गालियां समझने के लिए हमारी अंग्रेज़ी ज़ुबान सीखते हो। वगैरह-वगैरह। हम चार-पांच-दस साल पहले जो प्रोग्राम या फिल्म बना चुके होते हैं, तुम उसे या तो खरीदते हो या फिर नकल करने की कोशिश करते हो। कमाते-खाते हो। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। हम तो ऐसा ही चाहते हैं। सारे खंभे हमारे होंगे, तभी तो मकान हमारा होगा।

मैं 15 अगस्त के इस मौके पर इतना ही कहना चाहता हू कि एक दिन ख़ूब याद करो अपने देश को। अपने सच्च देशभक्तों को। मगर, साल के 364 दिन मुझे मत भूलना। देश भावनाओं से नहीं रोटी से चलता है। वो रोटी तुम्हें हम देंगे। देते हैं। देते रहेंगे। जाने-अनजाने।  तुम्हारी सात पुश्तों में से किसी एक छोरे-छोरी ने डॉलर कमा लिया तो तुम ही सोचो उसकी क्या कद्र होती है। और तुम हो कि नकली नोट के पीछे पड़े हो। जाली नोट। जाली आंदोलनों जैसे। जाली देशभक्तों जैसे। दुनिया ग्लोबल हो चुकी है। इस ग्लोबल दुनिया का एक ही लालकिला है। उसे व्हाइट हाउस कहते हैं। एक ही राष्ट्रपति है। सर्वसम्मति से। तो एक बार ज़ोर से जयकारा लगाओ इंडियावालों - ज़ुबां पे इंडिया, दिल में अमरीका

कम लिखा, जादा समझना
तुम्हारा,
'सबका मालिक एक है'

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

स्तब्ध कर देने का सुख...

आईए ज़रा-सा बदलें,
खुश होने के तरीके...

जो भी दिखे सामने,
उछाल दें उसकी टोपी
और हंसें मुंह फाड़कर
बदहवासी की हद तक...

जिसे सदियों से जानने का भरम हो,
सामने पाकर ऐंठ ले मुंह
उचकाकर कंधे, बोलें-
'हालांकि, चेहरा पहचाना-सा है
मगर दिमाग का सारा ज़ोर लगाकर भी
माफ कीजिए, याद नहीं आ रहे आप'!
स्तब्ध कर देने का सुख,
फैशन है आजकल...

पिता की अक्ल भरी बातें,
सुनते रहें लगाकर कानों में हेडफोन,
और नाश्ते के लिए रिरियाती मां को
दुत्कार दें हर सुबह,
साबित कर दें भिखारन....
आह! सुख कितना सहज है..

आईए हम हो जाएं अश्वत्थामा
नहीं, नहीं, युधिष्ठिर
और खूब फैलाएं भ्रम
कि जो मरा वो हम थे...
आह! छल का सुख
मरते रहें अश्वत्थामा, हमें क्या...

पृथ्वी से निचोड़ ली जाएं
सब प्राकृतिक संपदाएं,
पेड़, फूल, जानवर और प्यार...
सब हो जाएं निर्वस्त्र...
ममता से बांझ धरती पर,
अभी-अभी नवजात जैसे...

आह! एक पीढ़ी का वर्तमान
बोझिल, सूना, नीरस
आह! एक बांझ भविष्य का रेखाचित्र...
खुश होने को गालिब ये खयाल अच्छा है....

निखिल आनंद गिरि

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