मंगलवार, 23 जून 2015

नहीं

एक सुबह का सूरज
दूसरी सुबह-सा नहीं होता
एक अंधेरा दूसरे की तरह नहीं होता।
संसार की सब पवित्रता
एक स्त्री की आंखें नहीं हो सकतीं
एक स्त्री के होंठ
एक स्त्री का प्यार।
तुम जब होती हो मेरे पास
मैं कोई और होता हूं
या कोई और स्त्री होती है शायद
जो नहीं होती है कभी।
मेरे भीतर की स्त्री खो गई है शायद
ढूंढता रहता हूं जिसे

संसार की सब स्त्रियों में।
निखिल आनंद गिरि

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