रविवार, 27 मई 2012

वो मेरी चुप्पियां भी सुनता था...

मैंने सब जुर्म याद रखे हैं...
मैंने सब कटघरे सजाए हैं...
कोई तो आए, सज़ा दे मुझको...

लोग कहते हैं अजब पूनम है...
चांद सूजा हुआ-सा लगता है...
तुमने फिर नींद की गोली ली क्या?

मैंने दुनिया से कुछ कहा भी नहीं
जाने क्या उसने सुना, रुठ गया...
वो मेरी चुप्पियां भी सुनता था...

देखो ना रिस रहा है आंखो से
एक रिश्ता कोई हौले-हौले
कोई 'चश्मा' भी नहीं आखों में !!

मैंने हर खिड़की खुली रखी है..
कोई परवाज़ भरे, लौट आए...
कल से हड़ताल है उड़ानों की...

मैं बुरा हूं तो मैं बुरा ही सही
आप अच्छे हैं, मगर भूल गए...
हमने बदले थे आईने कभी...

सारे आंसू नए, मुस्कान नई
ज़िंदगी में नया-नया सब कुछ..
बस कि गुम हैं पुराने कंधे...

होंठ सिलकर ज़बान की तह में
मैंने एक सच छिपाए रखा था
रात उसने ली आखिरी सांसे...

एक दिन ऐसे टूट कर रोये,
गुमशुदा हो गया ख़ुदा मेरा...
हम भी आंखों में ख़ुदा रखते थे...

निखिल आनंद गिरि

9 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

भावपूर्ण कविता के लिए आभार...

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सारे आंसू नए, मुस्कान नई
ज़िंदगी में नया-नया सब कुछ..
बस कि गुम हैं पुराने कंधे...

बहुत बढ़िया तुम्हारा लिखा हमेशा ही बहुत सच के करीब होता है .सबसे अच्छी लगी यह पंक्तियाँ

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मैं बुरा हूं तो मैं बुरा ही सही
आप अच्छे हैं, मगर भूल गए...
हमने बदले थे आईने कभी...वाह ... अरसे बाद पढ़ा , लिंक ही खो गया था मुझसे

अजय कुमार झा ने कहा…

101….सुपर फ़ास्ट महाबुलेटिन एक्सप्रेस ..राईट टाईम पर आ रही है
एक डिब्बा आपका भी है देख सकते हैं इस टिप्पणी को क्लिक करें

Suresh kumar ने कहा…

Behatreen rachna....

सदा ने कहा…

बहुत ही गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट लेखन ।

दीपिका रानी ने कहा…

ये तो त्रिवेणियों का एक समूह सा लग रहा है। हर त्रिवेणी अपने आप में पूर्ण है। और कई तो बहुत सुंदर अर्थ देती.. नायाब..

taruna ने कहा…

wonderful...

Vikesh Badola ने कहा…

आपकी कविता ने अनेक अनुभवों के आयाम छुए हैं। बहुत सुन्‍दर।