वह कॉल सेंटर वाले दिन थे। तब मोहम्मदपुर का नाम मोहम्मदपुर ही था। अर्जुन भैया से बातचीत में मैंने इसे मोहब्बतपुर सुना था। ट्रेन में रांची से दिल्ली आने तक में अर्जुन भैया के सौ किस्से दिमाग में घूम रहे थे।
गोरे-चिट्टे, छह फीट के अर्जुन भैया। गांव से पढ़ाई छोड़कर अचानक दिल्ली भागे और जर्मनी की किसी कंपनी में बढ़िया पैकेज पर लगे थे। दिल्ली से गुड़गांवा कैब लेने आती है। टाई पहनते हैं। ऑफिस में आठ लड़का है, बारह लड़की। आधी रात को सब एक साथ रहते हैं। घंटे-घंटे क़ॉफी मिलती है, मैगी भी। ख़ूब अंग्रेज़ी बोलते हैं।
मेरी ट्रेन लेट थी। रात के नौ बजे उनके कमरे तक पहुंचा। बताया गया था कि सुबह भेंट होगी। रात को तीन बजे से ड्यूटी है, तो जगाना नहीं है। मैं नीचे ही जहां जगह थी, गद्दे पर सो गया। रात को गहरी नींद में ढनढन हुई तो आधी आंखों से देखा नाइट बल्ब की रोशनी में कोई टाई में और चड्डी में खाना भकोस रहा था। मैं आधा डर, आधा विस्मय से आंखे मूंदे रहा। फिर वो गए तो देखा प्लेट में चूड़ा और आम जैसे-तैसे चूस कर जल्दबाज़ी में कोई भागा है।
आई कार्ड छूट गया था। नाम लिखा था- अर्जुन झा, ट्रेनी।
(सम्मुख पोर्टल पर 50 चयनित कहानियों में शामिल
कथांक: आज का अर्जुन / निखिल आनंद गिरि - सम्मुख https://sammukh.com/kathank-nikhil-aanand-giri/)
निखिल आनंद गिरि