मुफ्त का प्लेस्कूल है दुनिया
मेरी बच्ची देखती है सिगरेट
पीते किसी लड़के को,
और देखती रह जाती है।
एक बकता है गाली, दूसरा थूकता है,
तीन और जुटते हैं संग्राम
में
इस तरह बेटी डर सीखती है।
एक तस्वीर देखती है अखबार
में तानाशाह की
और उसकी दाढ़ी खींचती है
डर ख़त्म होता है इस तरह
तानाशाहों का।
कौवे की
वो कहानी जिसमें
घड़े
में था थोड़ा-सा पानी
कंकड़
डालकर पानी आया था ऊपर
पूरी
तरह याद है उसे।
इसी
तर्क के साथ कहती है वो
किसी
दिन पानी ख़त्म हुआ दुनिया की नलों से
तो क्या
हम उनमें कंकड़ डाल
ला
पाएंग वापस पानी
यह सवाल
मैं दुनिया पर छोड़ता हूं।
खेलने को बहुत कुछ है
दुनिया में
सीखने को बहुत कुछ दुनिया
से।
उसे चीखने और आवाज़ उठाने
में फर्क करना सीखना होगा।
यह सब जल्द ही सीख जाएगी
मेरी बेटी
उसे समझना होगा कि वो एक
लड़की है
और लड़की होने का मतलब इतना
आसान नहीं होता इस देश में
उसे देश का मतलब भी सही-सही समझाना ज़रूरी है
मैं जानता हूं उसे
रात की कहानियों में उसे
परियां नहीं
कई सवालों के जवाब चाहिए
होते हैं।
वो पूछती है कि लड़की के
बड़े होने पर
उसे और सावधान क्यूं होना
चाहिए
मैं इसका जवाब ढूंढने में
लगा हूं इन दिनों।
उसे पसंद है चुटकियों में
ताजमहल थामने वाली तस्वीर
उसे पसंद है अंधेरे में एक
विश्वास भरी आवाज़
उसे अंधेरे से डर नहीं
संभावनाएं सीखनी होंगी।
मुझे उसकी मैम से कोई
शिकायत नहीं
जिसने ये सब नहीं बताया
उसे।
वो उसे कॉपी पर आइसक्रीम
बनाकर देती हैं
कभी स्माइली और स्टार भी
इसीलिए उसे अपनी मैम की सब
बातें सच लगती हैं,
और मुझे इसी बात से शिकायत
है।
बेटी के प्लेस्कूल लौटने का
समय हो गया है।
वो लौटेगी और गिलहरी की तरह
चढ़ जाएगी मेरे सीने पर
मैं उस ऊर्जा में एक
योद्धा देखता हूं
उसे लड़ना है दो-चार अखबारों से
झूठ की मीनारों से।
पड़ोस की आंखों से,
मज़बूत अफवाहों से।
बेटी अभी छोटी है
मगर उसे बचने के लिए अभी से
ही तैयार होना पड़ेगा
घर से बाहर सारी दुनिया से
लड़ना सीखना होगा।
उसकी उम्र कम है
मगर दुश्मन बहुत ज़्यादा।
उसे करना होगा प्लेस्कूल
में ही पक्का इरादा।