मंगलवार, 11 मई 2021

गिरते हुए

कोई जगह थी बहुत बंजर या निर्वात 
जहाँ गिरा मैं
एक भरा पूरा जीवन लिए मनुष्य 
अकस्मात्

मैं जिस ऊंचाई से गिरा
टूटा
टूटने की आवाज़ गिरने से पहले खत्म हुई
रोना भी गिरने गिरने तक सूख चुका

अंतिम सांस से पहले
पृथ्वी भर का दुःख
तुम्हारी नरम हथेलियों ने थाम लिया
मेरी चुप्पियों की भाषा पढ़ी तुमने
और मैं एक नयी भाषा में रोया
चीखा, चिल्लाया
तुम्हारे क़रीब आया

तुम्हारा एक स्पर्श
समर्पण से भरा हुआ
मेरा जीवन- छलनी, आहत
फिर से हरा हुआ

मेरा सारा वजूद
तुम्हारे सीने में दुबका दिया है मैंने
तुम उसे महफूज़ रखना

फिर-फिर आऊंगा 
और शिखर लांघकर 
और अधिक ऊंचाइयों से 
और भयावह अंधेरी अकेली रातों में
थर थर काँपता हुआ
तुम्हें पुकारता 
हाँफ़ता हुआ ..

निखिल आनंद गिरि

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