शनिवार, 1 अप्रैल 2017

देश के लिए ही सही, 'अनारकली ऑफ आरा' ज़रूर देखिए

आरा एक आदर्श शहर है। खाँटी लोग अगर इस धरती पर जहाँ कहीं भी बचे हुए हैं तो उनमें से एक आरा भी है। यहाँ के लोगों के स्वभाव में अदम्य साहस और दुस्साहस का मणिकांचन योग मिलता है। आरा के लोगों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने बदलाव को बहुत धीरे-धीरे आने दिया है। पतलून सिलाने के बाद भी अपनी लुंगी को खूँटी पर टाँगे रखा और टी शर्ट के आ जाने को बाद भी गंजी का परित्याग नहीं गया। अंग्रेज़ी भाषा को भोजपुरी के फार्मेट में स्वीकार किया। हिन्दी को भोजपुरी पर हावी होने नहीं दिया।
आरा के बारे में ये सब बातें टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने 10 फरवरी 2017 को अपने ब्लॉग पर पोस्ट की थीं। रवीश का ज़िक्र इसीलिए क्योंकि फिल्म अनारकली ऑफ ऑराके क्रेडिट में पहला नाम उन्हीं का आता है। पता नहीं उनका इस फिल्म से या फिल्म के डायरेक्टर अविनाश दास से कितना गहरा नाता रहा मगर आरा के बारे में ये सब फिल्म में कहीं नहीं है। रवीश आगे लिखते हैं -
‘’इस फ़िल्म से एक नया आरा सामने आएगा? मुझे नहीं पता कि अनारकली आरा पर ग़ज़ब ढाएगी या क़हर ढाएगी लेकिन इतना पता है कि आरा आगे निकल चुका है। वो अब लड़ाकू नहीं,पढ़ाकू शहर है।’’

एक नया आरा अविनाश दास ने दिखलाया तो है, मगर वो न तो पढ़ाकू दिखता है, न लड़ाकू। अविनाश दास का आरा एक ठरकी शहर है। जहां के सारे पढ़ाकू छात्र अनारकली का नाच देखते हैं, उन छात्रों के भविष्य का मालिक वाइस चांसलर नाच के वक्त दारू भी पीता है और स्टेज पर चढ़कर अनारकली को छेड़ता है, थप्पड़ खाता है। इस तरह से फिल्म को देखें तो आरा शहर को अविनाश दास के खिलाफ मानहानि का मुकदमा कर देना चाहिए। आरा टाउन थाना के दारोगा को तो अविनाश दास को जेल में डाल देना चाहिए। फिल्म बनाने की छूट में एक पूरे शहर को इस तरह बदनाम कर देना ठीक बात नहीं।
मगर अविनाश दास दुनिया को शायद इसी तरह देखते हैं। यही उनकी ख़ूबी है। यही उनका परिचय। उनका अपना पक्ष इतना लाउड है कि कोई और पक्ष बौना ही नज़र आता है उनके सामने। इस तरह से फिल्म पर अविनाश दास की पकड़ भी ज़बरदस्त है। वो फिल्म को अपनी कल्पना के हिसाब से आगे ले जाते हैं। सभी स्थापित सत्ता-केंद्रों पर हमला बोलते हुए। एकदम लाउड।
फिल्म की कहानी बहुत छोटी है, मगर गीत-संगीत ने उसे संवार दिया है। फिल्म में आरा जितना द्विअर्थी और बुरा नज़र आता है, गीत उतने ही तरल और पवित्र सुनाई देते हैं। रोहित शर्मा का संगीत लाजवाब है। कहीं से नहीं लगता कि ये अविनाश दास की पहली फिल्म है। उन्होंने इस फिल्म की बारीकियों पर बहुत मेहनत की है। जब दिल्ली के एक ढाबे में हिरामन तिवारी अनारकली से कहता है कि देश के लिए बुनिया खा लीजिए तो लगता है अनारकली को देश के लिए अपना दिल हिरामन को दे देना चाहिए। या फिर अविनाश दास को। जिनके लिए दिल्ली घूमने की शुरुआत यमुना के गंदे किनारे से भी हो सकती है।
फिल्म के डायलॉग और गाने बहुत दिनों तक याद रखे जाने चाहिए। मगर वो इतने ज़्यादा हैं कि फिल्म की छोटी सी कहानी पर भारी पड़ते हैं। फिल्म का पहला आधा घंटा तो भारी-भरकम डायलॉग्स और लोकगीतों का चित्रहार जैसा है, जिसमें कहानी अचानक से एंट्री मारती है। हिंदी फिल्मों को अनारकली ऑफ आरासे क्या मिला पता नहीं, मगर भोजपुरी सिनेमा को इस फिल्म के सामने कान पकड़कर माफी मांगनी चाहिए। याद नहीं मुझे कि हाल की कोई भोजपुरी फिल्म इस तरह के सरोकारों के साथ सफलता से आई हो। फिल्म का आखिरी शॉट जहां अनारकली हिसाबबराबर कर कैमरे की तरफ अकेली लौट रही है, न्यू फ्रेंच सिनेमाके क्लाइमैक्स की याद दिलाता है। भोजपुरी के निर्देशकों को भी ये सब सीखना चाहिए।
फिल्म अनारकली पर इतना फोकस करती है कि बाकी सब कुछ गायब हो जाता है। ये नई तरह की फिल्मों में ज़रूरी भी है। अपनी बात को इतना मज़बूती से कहो कि लगे कुछ कहा है। नये निर्देशक ऐसे ही जमते हैं। नई फिल्में ऐसे ही याद रह पाती हैं।
चलते-चलते –
मैं दिल्ली के जिस हॉल में फिल्म को देखने गया था वहां फिल्म लगी तो थी मगर फिल्म का एक भी पोस्टर नहीं था। इस तरह से बिना पोस्टर वाली कोई फिल्म अपने दम पर दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर जाए तो बधाई की हक़दार है। मेरे मित्र दिलीप गुप्ता को अनारकली फिल्म में एक्टिंग भी नसीब हुई है, और अनारकली की चप्पलें भी। उनको अलग से बधाई।

निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 9 मार्च 2017

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन : देश घंटा बदल रहा है

पुरानी दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर 7 मार्च की रात जिस तरह का मानसिक टॉर्चर मैंने झेला, वो किसी न किसी भले आदमी को रेल मंत्रालय तक ज़रूर पहुंचाना चाहिए। ये छोटी-सी आपबीती उसी की कोशिश भर है।
 
जयनगर से चली शहीद एक्सप्रेस में समस्तीपुर से मेरे कुछ घरेलू सामान की पार्सल बुकिंग थी। यहां जो ट्रेन दोपहर के बारह बजे पहुंचनी थी, रात के साढ़े ग्यारह बजे पहुंची। पार्सल छुड़वाने का कोई अनुभव नहीं होने के कारण मैं क़रीब तीन घंटे पहले से वहां पहुंचकर पार्सल ऑफिस के आसपास के चक्कर काट रहा था। बताया गया कि आजकल मामला डिजीटल है, तो ट्रेन से सामान उतरते ही प्लैटफॉर्म से ही ले जाया जा सकता है। प्लैटफॉर्म वाला बाबू अपनी इलेक्ट्रॉनिक एंट्री करेगा। फिर प्लैटफॉर्म से कोसों दूर स्टेशन के किसी सुदूर हिस्से में पार्सल ऑफिस के काउंटर से एक गेट पास बनाकर सामान रिलीज़ कराया जा सकता है। इसी उम्मीद से जब ट्रेन आई और मेरा सामान दिखा तो मैंने ठीक ऐसा ही किया। प्लैटफॉर्म वाले बाबू (बूढ़े बाबा) ने अपना काम तुरंत कर दिया तो पार्सल ऑफिस की तरफ दौड़ा। वहां जो बीती वो बताने लायक तो है, भुगतने लायक नहीं।
 
एक बुज़ुर्ग हरियाणवी मैडम आधी रात की ड्यूटी में थीं (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर इसे नोट किया जाना चाहिए)। वो समय से दस मिनट पहले आ गई थीं तो अपने साथी पार्सल बाबूकी आखिरी फाइल वर्क निपटाने में मदद कर रही थीं। जो पोर्टर उनके सामने क्लियरेंस के लिए खड़ा था, उससे पूरे पारंपरिक तरीके से 100-100 रुपये बांट रही थीं। मैंने बहुत ही विनम्रता से आधी रात का हवाला देते हुए मेरा गेट पासबनाने को कहा तो बोलीं घोड़े पर सवार होकर आया है के, अभी तो ड्यूटी शुरु भी नहीं हुई मेरी। मैं आधे घंटे तक उनकी ड्यूटी शुरू होने का इंतज़ार करता रहा। घूमकर आया तो देखा बाहर ताला लगा है। पता चला कि मैडम भीतर सोती हैं और सुबह पांच बजे से ही काम शुरू करती हैं। किसी तरह ताला खुला तो मैडम का कंप्यूटर भी खुला। वो छत्तीस बार कोशिश करती रहीं, मगर मेरे पार्सल की ठीक से एंट्री नहीं कर पाईं। मुझे ताने देती रहीं कि उन्हें रात को परेशान कर रहा हूं और फिर किसी दूसरे साथी की मदद से लगभग ढाई बजे छह सौ ज़्यादा देने पर एक पास बन सका। मैं पैसे देने का विरोध करता तो बोलीं, कौण सा हमारी जेब में जाने हैं, ये तो सरकार का पैसा है। फिर स्टेशन से कहीं जाने लायक नहीं बचा। सारी रात मैंने पुरानी दिल्ली की सड़कों पर गुज़ारी।
 
किसी का नाम लेकर नौकरी खाने की कोई मंशा नहीं है। बस बताना चाहता हूं कि ये जो रेल मंत्री अपनी रेल को वर्ल्ड क्लास क्लेम करते रहते हैं, वो दरअसल पार्सल ऑफिस तक आते-आते थर्ड क्लास हो जाती है। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर निकलते ही दिल्ली मेट्रो के दफ्तर भी हैं, जहां एक बार इन बेकार रेलवे कर्मचारियों को सज़ा के तौर पर भेजा जाना चाहिए। एक आम यात्री की पूरी रात ख़राब होने पर न इन्हें कोई मलाल होगा, न इन्हें समझ आएगा कि ये देश का कितना नुकसान कर रहे हैं। फिर भी देश बदल रहा है’, ‘अच्छे दिनके प्रचारकों का मुंह बंद करके एक बार इन पार्सल ऑफिस तक ज़रूर भेजना चाहिए। ये हमारी राजधानी दिल्ली के एक रेलवे स्टेशन की कहानी है, जिसे आप भारत के हर हिस्से की कहानी के तौर पर देख सकते हैं। बस वो स्टेशन राजधानी से जितना दूर हो, उसके निकम्मेपन का अनुपात स्वादानुसार बढ़ाते जाइएगा।
 
अब आप राष्ट्रगान के लिए खड़े हो सकते हैं।

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 8 मार्च 2017

विशाल भारद्वाज को ‘रंगून’ हो जाए तो बचना मुश्किल है

रंगून मैंने गुजरात के वापी शहर में देखी। मुंबई यहां से बहुत नज़दीक है, मगर सिनेमा हॉल अब भी दो-चार ही। विशाल भारद्वाज का सिनेमा देखने वाले उससे भी कम। देश की इंडस्ट्रीज़ से फैलने वाले केमिकल प्रदूषण में वापी का बहुत बड़ा योगदान है। यहां जितने गुजराती हैं, उससे ज़्यादा बिहार-यूपी के मजदूर लोग। लिहाज़ा शाहरूख-सलमान की नाच-गाने वाली फिल्मों के कद्रदान यहां ज़्यादा हैं, रंगून के बिल्कुल नहीं। रिलीज़ के दूसरे दिन ही हॉल में मुश्किल से 20-25 लोग थे।

पहले फिल्म का एक सीन। हीरोइन पर सैनिकों का हमला हुआ है और उस पार ले जाने के लिए गदहे बुलाए गए हैं। हीरोइन हीरो को गधाबुलाकर मज़ाक करती है तो हीरो बताता है कि ये गधी है। इत्तेफाक देखिए कि राजनीति के जिस गदहाकालमें गुजरात से आने वाले पीएम भी ज़ोर-शोर से लगे हुए हैं, ‘रंगूनमें भी गधे दिख गए तो अचानक ही हंसी आ गई। रंगून विशाल भारद्वाज की सबसे कमज़ोर फिल्म है। जैसे प्रकाश झा परिणति, दामुलसे होते हुए आरक्षणतक आ गए हैं, विशाल भारद्वाज भी अपने ही पुराने फॉर्मूले में उलझ गए हैं। जब फिल्म कमज़ोर पड़ने लगे, फिर गुलज़ार के गीत भी फार्मूला से ज़्यादा नहीं लगते। मेरे पिया गए इंग्लैंड, बजा के बैंड, करेंगे लैंड.. जैसे गीत गुलाल वाले पीयूष मिश्रा के गीतों का एक्सटेंशन भर लगते हैं।

ऐसा नहीं कि फिल्म में कोई कहानी नहीं है। फिल्म विशाल भारद्वाज की है तो कहानी के कई लेयर हैं। मगर इस बार एक परत देशभक्ति की भी है जो विशाल भारद्वाज का असली फ्लेवर नहीं लगता। लगता है जैसे वो किसी दबाव में फिल्म बना रहे हैं। फिल्म शुरू होने से पहले एक राष्ट्रगानऔर फिर बीच-बीच में आज़ाद हिंद फौज का राष्ट्रगान। नवाब (शाहिद कपूर) कहता है कि अपनी जान से कीमती वो होता है जिसके लिए मरा जा सके यानी देश, मातृभूमि। ये उस निर्देशक का स्टेटमेंट है जो ओंकारा, मकबूल, सात ख़ून माफमें प्यार के हज़ारों सैंपल दिखा चुका है।

इसके अलावा फिल्म में मांभी है। एक बंधक जापानी सैनिक हीरो-हीरोइन को रास्ता दिखाते हुए एक दिन इन्हें मारने को ही होता है कि रो पड़ता है। उसे सिखाया गया है कि जापान में युद्ध से हारकर ज़िंदा लौटने का रिवाज नहीं है। कोई ये नहीं मानेगा कि दुश्मनने उन्हें ज़िंदा जाने दिया। शाहिद कपूर कहते हैं कि कोई समझे, न समझे- मां समझेगी। इतना संवेदनशील सैनिक ऊपरवाला ख़ूबसूरत लड़कियों को इतना बेवकूफ क्यूं बनाता है जैसा हल्का डायलॉग मारता है तो लगता है ये व्हाट्सऐप के दौर की ही कोई फिल्म है। फिल्म के कई हिस्से बहुत भी अच्छे हैं। मगर पूरी फिल्म एक साथ अच्छी नहीं हो पाई। हिटलर की मिमिक्री, प्यार किया अंग्रेज़ी में जैसे गाने और अंग्रेज़ अफसर हार्डिंग की वो बात कि अगर कभी अंग्रेज़ हिंदुस्तान को छोड़ के गए भी तो ये दुनिया के सबसे करप्ट समाज में से एक होगा।

क्लाइमैक्स इतना लंबा है जैसे एडिटर को फिल्म काटने के बजाय रंगून भेज दिया गया हो। एक पुल है जिस पर फिल्म के पंद्रह मिनट लटके हैं। पुल के उस पार कंगना हैं। इस पार उनका पीछा कर रहे अंग्रेज़, उससे प्यार करने वाला रूसी (सैफ) और उसे देशभक्ति का दिव्य ज्ञान देने वाला आज़ाद हिंद फौज का नवाब (शाहिद)। बीच में बहुत से गोले-बारुद हैं जो सबका सबकुछ बिगाड़ सकते हैं, मगर हीरो-हीरोइन का नहीं। विलेन भी इस नाज़ुक पुल पर तभी मरेगा जब हीरो (एंटी-हीरो) उछल कर एक तलवार से उसकी गर्दन उड़ाएगा। यकीन कीजिए आप विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशक की ये फिल्म 2017 में देख रहे हैं!


सैफ अली ख़ान पूरी फिल्म में फ्रस्ट्रेटेड नज़र आते हैं। लगता है आधे मन से एक्टिंग कर रहे हैं। शायद विशाल भारद्वाज से नाराज़ हैं कि उनका ख़ानदानी टाइटल नवाबफिल्म में शाहिद कपूर को दे दिया। कंगना और शाहिद ने बढ़िया एक्टिंग की है। मगर विशाल भारद्वाज ने इन्हें इश्क के नाम पर नंगे बदन से आगे नहीं जाने दिया है। ये बॉलीवुड की सीमा है, जो रंगून जाकर भी बदल नहीं पाती। 

निखिल आनंद गिरि

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

लालकिला कवि सम्मेलन : वो कविताएं पढ़ती रहीं, हम सीटियां बजाते रहे


4 फरवरी को लालकिले पर आयोजित कवि सम्मेलन में इस बार दो वजहों से गया। एक तो ये कि मैं पिछले बारह सालों से दिल्ली में रहते हुए कभी लालकिला नहीं गया। दूसरा कि मेरे पुराने साथी अभिनव शाह से आखिरी बार जब क़रीब छह साल पहले मिला था तो वो कुंवारे थे और अब एक बच्चे के पिता हैं और ऐसा ही विकास मेरा भी हुआ है। ऐसे में इस तरह के कवि सम्मेलनों से अच्छी कोई जगह नहीं जहां घिसी-पिटी बातें सुनने से ज़्यादा अपनी बात करने के हज़ार मौक़े मिलते हैं।

एक ऐसा खचाखच भरा कवि सम्मेलन जिसे दूरदर्शन के ज़माने में टीवी पर देखकर लगता था कि शर्ट या कोट पर फूलों वाला गोल बैज लगाकर कविताएं पढ़ने वाले कवि ही आगे चलकर महान कहलाते होंगे। इस बार वहां पहुंचा तो पाया कि जितनी कुर्सियां भरी थीं, उससे ज़्यादा ख़ाली थीं। 8 बजे से तय कवि सम्मेलन का पहला डेढ़ घंटा फूल मालाएं देने, एक-दूसरे की पीठ खुजाने और मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री, उप-उप-मंत्री, गुपचुप मंत्री को सम्मानित करते ही बीता। कुमार विश्वास सिर्फ अतिथि के तौर पर बुलाए गए थे मगर अपनी आदत से बाज़ नहीं आए और कम से कम 15 मिनट कवियों का परिचय पढ़कर ख़राब किया। जिस दिल्ली हिंदी अकादमी ने इस सम्मेलन की मेज़बानी की थी उसकी उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा को इस फालतू के डेढ़ घंटे में एक शब्द भी बोलने का मौक़ा नहीं मिला। इस बीच लालकिला और आसपास से लोग आते रहे और फूलों से लदे,पंजाब से लौटे आम आदमी पार्टी के मंत्री जाते रहे।
इसके बाद के डेढ़ घंटे में एक-एक कर जिस भी कवि को बुलाया गया उसने कविता के अलावा इतनी बातें कहीं जिन्हें पढ़-पढ़ कर हम सोशल मीडिया, व्हाट्स ऐप पर हज़ार बार हंस चुके हैं और इतनी ही बार फॉरवर्ड-म्यूट कर चुके हैं। कविता के नाम पर चार पंक्तियां, चार पंक्तियां कहते-कहते कवि इतना कुछ फालतू कहते रहे कि अफसोस हुआ कि ये सब नमूने हमारी बिरादरी के ही हैं। डियर राष्ट्रवादी-सांस्कृतिक चेतना के कवियों! भीड़ को बांधनेका मतलब रस्सी से बांधना थोड़े होता है। उसे कविताएं भी चाहिए। कोई संपत सरल, सुदीप भोला या कुंवर बेचैन जैसे ठीकठाक कवि बिठाकर 25 बुरे कवियों को दिल्ली के लालकिले से पेश करने का जो अपराध साल-दर-साल सरकारी खर्चे से हो रहा है, उसका पाप पता नहीं श्रोताओं के सर जाना चाहिए या प्रस्तोताओं के।

आम आदमी पार्टी के सबसे ख़ास आदमी केजरीवाल ने सम्मेलन के शुरू में कहा कि कवि हमारी पार्टी और मोदी जी की पार्टी को भर-भर के गालियां दे सकते हैं। ऐसा आदेश प्राप्त होते ही, चूंकि इस सम्मेलन का चेक दिल्ली सरकार से मिलना था, कवियों ने अपने बासी चुटकुले नोटबंदी, छप्पन इंच वगैरह पर ही सीमित रखे और दिल्ली सरकार को बेनिफिट ऑफ डाउटमिला। कुमार विश्वास से इस कदर विश्वास उठता जा रहा है कि वो केजरीवाल की तुलना लाल बहादुर शास्त्री से कर बैठे मगर फिर भी कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

मंच संचालक रास बिहारी गौड़ साहब एक (अ)भूतपूर्व मंच संचालक कुमार विश्वास की मौजूदगी से इस कदर नर्वस और मर्द-बरबस दिखे कि एक महिला कवि के कुछ सेकेंड देर से माइक तक पहुंचने पर पूरे घटियापन से बोल गए कि माइक तक आने से पहले भी मेक-अप करना नहीं भूलतीं। महिला कवि ने माइक पर आने से पहले सबके सामने उन्हें ऐसे घूरा कि वो उनका संचालन अंत-अंत तक कुरूप और नीरस ही रहा होगा। बिहार से आए एक सांवले सज्जन शंभू शिखर अपने रंग-रूप पर कटाक्ष सुनकर इतने उत्साहित थे कि ज़ोर-ज़ोर से पानी का तुक वानी और निष्ठा का तुक विष्ठासे लगाकर तालियों की भीख मांगते रहे। जनता ने किसी भी कवि को इस मामले में निराश नहीं किया। राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में आयी लालकिले की जनता ने महिला कवियों के ताली मांगने पर सीटियां भी बजाईं और जवान, पाकिस्तान, नौजवान जैसा कुछ भी सुनने पर उछल-उछल कर भारत माता की जय के नारे से पूरे चांदनी चौक की रात ख़राब की।

मुझे कवि सम्मेलनों से कोई चिढ़ नहीं है। मैं ख़ुद भी माइक पर कविताएं पढ़ने में बहुत भावुक महसूस करता हूं। लेकिन अगर आपको पिछले दस-बारह साल से इस तरह के मंचों पर एक ही धुन सुनने को मिले, बस गवैयों के चेहरे बदलते रहे तो चिढ़ होनी चाहिए। अगर आपको कुमार विश्वास की नर्सरी से निकले तमाम झाड़-झंखार, घास-फूस ही एक मंच पर लालकिले तक राष्ट्रीयसम्मान बटोरते कवियों की लिस्ट में दिखें तो गुस्सा भी आना चाहिए। कवि सम्मेलनों के आगे राष्ट्रीय लगा देने से कोई आयोजन महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। तालियों और सीटियों के बीच कविताएं आखिरी मेट्रो पकड़कर घर भाग गई हैं। हो सके तो उन्हें पकड़िए। राष्ट्र हित में जारी।

आखिरी बात -
अगर दिल्ली की हिंदी अकादमी को लगता है कि रात के आठ बजे कोई कवि सम्मेलन शुरू करवाकर वो कविता को सबके लिए (महिलाओं, बच्चों के लिए भी) उपलब्ध करवा सकती है तो अभी दिल्ली दूर है। ऐसे कवि सम्मेलन में सिर्फ मैत्रेयी पुष्पा आ सकती हैं क्योंकि उन्हें उपाध्यक्ष होने की मजबूरी है, एक-दो महिला कवि आ सकती हैं क्योंकि उन्हें संचालक सरस्वती वंदना के लिए बुलाएगा। या फिर कुछ घरेलू महिलाएं जिन्हें आखिरी मेट्रो तक पति के साथ प्रोग्राम देखने की इजाज़त है।
इसके अलावा मर्द ही मर्द हैं राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में।

निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 28 जनवरी 2017

शाहरूख ही सनी लियोनी है, शाहरूख ही सनातन सत्य है !

अगर आप पिछले दस सालों की भोजपुरी फिल्में देखें तो एक जैसी ही नज़र आएंगी। जैसे भोजपुरी फिल्म का नायक कोई देहाती मूर्खजैसा होगा, आइटम सांग गाएगा, शहरी हो जाएगा, हीरोइन खुश हो जाएगी वगैरह वगैरह। ऐसे ही बॉलीवुड की डॉन-आधारित फिल्मों का भी इतिहास देखें तो फॉर्मूला ही सनातन सत्य है। अमिताभ बच्चन से लेकर अजय देवगन से लेकर शाहरूख खान तक सब इस फॉर्मूले के आगे कठपुतलियां हैं। कौन कब और किस नाम से रिलीज़होगा, कोई नहीं जानता। और अगर फिल्म में शाहरूख हैं तो ये फॉर्मूला भी एमडीएच मसाले में लिपटा होगा। लेख के अगले हिस्सों में स्वादानुसार इसका विवरण मिलेगा।
डियर ज़िंदगीके बाद अगर आप शाहरूख खान से बहुत ज़्यादा उम्मीदें लगाए बैठे थे तो आप अत्यंत भोले दर्शक हैं। शाहरूख इस फिल्म में वही करते नज़र आते हैं जो हर दौर में हिट होने के लिए नौसिखिए लोग करते रहे हैं। फिर 50 साल के बाद शाहरूख को ऐसा करने की ज़रूरत क्यूं पड़ी, ख़ुदा जाने! एक ऐसा डॉन जो मरते-मरते भी तीन-चार बेस्टसेलर डायलॉग मारकर जाएगा और फिल्म इंडस्ट्री पर एहसान कर जाएगा।
कहते हैं कि रईसगुजरात के बड़े डॉन अब्दुल लतीफ की असली कहानी पर आधारित है। गुजरात में क़रीब दो दशक पहले जिस तरह बीजेपी ने कुर्सी हथियाई, उसमें वहां के वांटेड गुंडों को शरण देने में उस वक्त के मुख्यमंत्री की चमचई और मौकापरस्ती ही फिल्म का सबसे साहसी कदम है। इसके अलावा आदि से अंत तक बस शाहरूख ही शाहरूख है।
बॉलीवुड की फिल्म का नायक कोई मोस्ट वांटेड क्रिमिनल हो या महापुरुष, उसका बचपन नैतिक शिक्षा से ही शुरू होना है। मां थोड़ा ग़रीब ही होनी है और बहुत इंसाफ पसंद। वो बेटे की कमज़ोर नज़र के लिए दो रुपये की उधारी भी बर्दाश्त नहीं करती। और चूंकि भविष्य के डॉन की मां है तो ऐसे नाज़ुक मौक़ों पर भी ब्रह्मवाक्य की तरह के डायलॉग मारनी नहीं भूलती - 'मैं इसे उधार का नज़रिया नहीं, चौकस नज़र देना चाहती हूं डॉक्टर साहब।' और फिर बेटे की चौकस नज़र सबसे पहले गांधी जी की मूर्ति से चश्मा चुराती है, पुलिस की गाड़ी के आगे आकर शराब के माफियाओं को बचा लेती है वगैरह वगैरह।
फिर जैसे अमिताभ दौड़ते-दौड़ते या राजेश खन्ना रोटी को लेकर भागते-भागते बड़े होते रहे हैं, ये 'रईस' भी मोहर्रम के कोड़े खाते-खाते बड़ा हो जाता है। फिर एक मोहर्रम में जब इस रईस को मारने का प्लान बनता है तो बंदूक वाले शूटर भैया ठीक वहीं खड़े होते हैं जहां से 'चौकस' नज़र वाले रईस की नज़र पड़ जाए। आप एक कॉमेडी नहीं, ख़तरनाक डॉन की फिल्म देख रहे हैं। फिर रईस अचानक शाहरूख खान से शक्तिमान बन जाता है। दीवारों पर चढ़कर, छतों पर गुलाटियां मार-मारकर अपने जानी दुश्मन को मार डालता है। उसे अभी फिल्म में सवा घंटे और बने रहना है।
उसे अभी सबसे अच्छे पुलिस अफसर को ख़ाली ट्रक दिखाकर चकमा देना है। खाली ट्रक में अपने माल की जगह चाय का एक कप छोड़ना है। एक बेवकूफ लड़की से प्रेम करना है। एक ऐसी लड़की जो डॉन की सभी बदमाशियों को गाने गाकर भूल जाती है। वक्त-वक्त पर डॉन की फिल्म में गाने का ब्रेक लेती है। जेल जाने पर रईस जैसे बड़े डॉन को भी पहला कॉल रोमांस के लिए करने पर मजबूर करती है। ख़ुदा बचाए ऐसी प्रेमिकाओं से।
हम 'रईस' को क्यूं याद रखें। क्योंकि 'परज़ानिया' जैसी गंभीर फिल्म देने वाले निर्देशक राहुल ढोलकिया को इस बार शाहरुख ही चाहिए। क्योंकि हम इस तरह की छप्पन हज़ार फिल्में पहले भी देख चुके हैं और इस बार शाहरूख खान है। क्यूंकि आपकी फ्रेंड लिस्ट में आज भी पंद्रह लड़कियां ऐसी हैं जो शाहरूख खान के नाम पर करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं। क्योंकि दिन और रात लोगों के लिए होते हैं, शाहरूख जैसे शेरों का तो ज़माना होता है। ओवर एंड आउट!
चलते - चलते : ''पाबंदी ही 'बग़ावत' की शुरुआत है।'' फिल्म का शुरुआती डायलॉग शराबबंदी फेम बिहार सरकार के लिए चेतावनी की तरह है। यानी नए ज़माने के किसी डॉन का बिहार से उदय होने ही वाला है। इंतज़ार कीजिए।

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

कौन छिपा है?

ये ज़िंदगी से लंबी सड़कें किसने बना दीं
किसने बिछा दिए कंकड़?
कौन है रातें इतनी अंधेरी कर गया
किसने छीन ली आग कलेजे से।
कोई तो है छल से
रहता है छिपकर भीतर।

एक लड़की भी हो सकती है शायद
छोटे बालों वाली
या कोई गौरेया दाना लिए
छिपकर बैठी किसी कोने में
घुटनों में चेहरा छिपाए
कैसे तोड़ दूं छिपना किसी का।

आकाश छिप गया मन के भीतर
मौसम छिप गए सारे वहीं
मैं भूल गया वो कोना

जहां छिपना था सबसे बचकर।

निखिल आनंद गिरि
('तद्भव' पत्रिका में प्रकाशित)

सोमवार, 16 जनवरी 2017

पुस्तक मेला हो तो दिल्ली में हो वरना नहीं हो

प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन से ही मुंह में भोंपू (लाउडस्पीकर) लगाकर सीआईएसएफ का जवान जब दाएं जाएं-बाएं जाएं करता है तो एहसास हो जाता है कि कितनी भीड़ होगी मेले में। नीचे उतरिए तो मेले के बाहर भी मेला। फुचके का, गुब्बारे का, मोबाइल कवर का, 80 प्रतिशत छूट वाली डिक्शनरी का। फिर भीतर सारे स्टॉल।

हिंदी के हॉल में मिलने वाले ज्यादा, ख़रीदने वाले कम। लिखने वाले ज़्यादा पढ़ने वाले कम। हिंदी वाले हॉल में किसी राजा बुकस्टॉल पर नज़र गई और वहां अंग्रेज़ी की किताबों पर मछली ख़रीदने जैसी भीड़ दिखी तो मन रुक गया - ‘अंग्रेज़ी की किताबें 100 रुपये, सौ-सौ रुपये। जो मर्ज़ी छांट लो।एक दुबला-सा लड़का एक स्टूल पर खड़ा होकर लोगों को बुलाए जा रहा था। लोग किताबें छांट रहे थे। जैसे पालिका मार्केट में लोअर छांटते हैं, लड़कियां जनपथ में ऊनी चादरें छांटती हैं।
मैंने धीरे से पूछा-हिंदी की किताबें?  तो उसी सुर में बोला – ‘’उधर। पच्चास रुपये, पच्चास रुपये।‘’ उधर नज़र गई तो एक तरफ सुख की खोजथी, एक तरफ कॉल गर्लऔर बीच में भगत सिंह की अमर गाथा’! सब पचास रुपये में। मैंने सोचा कि हिंदी की किताबों को सम्मान से रख तो लेते कम से कम। भगत सिंह के साथ कॉल गर्ल को बेच रहे हैं, वो भी अंग्रेज़ी से आधे दाम पर। शर्म आनी चाहिए। फिर आगे बढ़ा तो एक बाबा चिल्ला-चिल्ला कर सत्यार्थ प्रकाशबेच रहे थे। बोल रहे थे आधे घंटे में जीवन नहीं बदला तो पैसे वापसी की पूरी गारंटी। मैंने चुपके से रास्ता ही बदल लिया। सिर्फ स्टॉल ही नहीं पूरी हॉल ही छोड़ आया।
अंग्रेज़ी वाले हॉल में घुसा तो वहां पेंग्विन और नेशनल बुक ट्रस्ट पर भारी भीड़ थे। लोग वहीं बैठकर पूरी-पूरी किताब पढ़ रहे थे। मुझे बढ़िया आइडिया लगा। सात दिनों में कम से एक किताब तो पूरी की ही जा सकती है। साल में कम से कम एक किताब तो पढ़नी ही चाहिए। वहां भी ‘’किताबों का पालिका बाज़ार’’ लगा हुआ था। अंग्रेज़ी वाले नए पाठकों की भीड़ उस दुकान पर थी। बिना जाने-सुने-पहचाने लेखकों की सुंदर किताबें 100 रुपये में ख़रीदना अंग्रेज़ी वालों के लिए मोज़े ख़रीदने जैसा रहा होगा। हिंदी वाले तो इतना जेब में रखे-रखे नई हिंदी वाले स्टॉल पर चार दिन घूम आते हैं।
ज़्यादा नहीं लिखूंगा। आप बस तस्वीरों को देखकर फील कीजिए। दिल्ली की सबसे ख़ास बात ये है कि ये सबको बराबर दिखने-महसूस करने के पूरे मौके देती है। किताबों की इतनी दुकानों में आप सिर्फ घूम कर लौट आते हैं या एकाध किताबें ख़रीदते भी हैं, क्या फर्क पड़ता है। सबके साथ मेले में रहने का भरम अकेले लौटने से ही पूरा होता है। जैसे हम दुनिया से लौटते हैं एक दिन। 
निखिल आनंद गिरि