Saturday, May 18, 2013

एक मामूली आदमी की डायरी-1

आजकल दो चीज़ों से बहुत परेशान हूं। पहली तो ये कि मेरी किसी भी 'बड़े आदमी' से कोई पहचान नहीं है। जिससे भी मिलता हूं, वो किसी न किसी तगड़ी पहचान के साथ आगे बढ़ता दिखता है। कैरियर में सफल  लोगों पर कोई बातचीत होती है तो अक्सर सुनता हूं कि फलां जगह वो चुना गया क्योंकि वहां उसकी उनसे पहले से ही पहचान थी। उनके लिए स्पॉट फिक्सिंग एक अपराध नहीं जीवनशैली है। हर क्षेत्र में कोई पैनल या कमिटी किसी नई नियुक्ति नहीं करती। एक गिरोह करता है, जिसमें चुने जाने वाले का कोई न कोई सगा ज़रूर होता है। इतनी सी बात से पूरा आत्मविश्वास हिल जाता है। नौकरी में जहां भी रहा, वफादारी से काम करता रहा। लोग काम की तारीफ भी करते हैं। मगर दावे से नहीं कह सकता कि वहां का बॉस या कोई 'बड़ा आदमी' मेरे साथ फुर्सत में उठऩा-बैठना पसंद करे। क्या बडे पद पर पहुंचने के लिए कोई और योग्यता चाहिए होती है। इन दिनों जिस तरह का कंपनी राज है, उसमें अगले दिन नौकरी रहेगी या नहीं, कुछ पता नहीं होता। लेकिन फिर भी उन लोगों की तरह क्यों नहीं हो पाता जो अच्छी तरह जानते हैं कि नौकरी में बने रहने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए। मुझे तो मोहल्ले में भी ठीक से कोई नहीं पहचानता। हमेशा डर लगा रहता है कि कोई भी मुझसे लड़ सकता है, जीत सकता है। कोई पुलिस वाला बिना बात की गाली बक सकता है। कोई दुकानदार मुझे सामान देने के लिए भीड़ के ख़त्म होने तक खड़ा रख सकता है। कोई नया लड़का ऊंची आवाज़ में मुझे नीचा दिखा सकता है। उम्र में जितना बड़ा होता जा रहा हूं, भीतर से उतना ही कमज़ोर भी।

दूसरी चीज़ परेशान करती है खुद को काबू में नहीं रख पाना। इतना कमज़ोर महसूस करने के बावजूद कई बार छोटी-छोटी बातों में ग़लत होता देखकर लड़ जाना अच्छा लगता है। अपना फायदा-नुकसान बाद में समझ आता है। चुप रहने की अदा सीखना चाहता हूं । वो लोग किस चक्की का आटा खाते हैं, जिन्हें कभी गुस्सा नहीं आता। हर बात में वो शांत दिखते हैं। उन्हें किसी चीज से कोई परेशानी नहीं होती। उन्हें लगता है कि जब तक उनके पास मोटी तनख़्वाह है, नौकरी सुरक्षित है, तब तक किसी और के लिए या किसी अच्छी वजह के लिए तर्क करना फालतू का काम है।

वो ग़लती से अगर किसी अनशन या आंदोलन के आसपास से गुजर भी जाएं तो नाक पर रुमाल रख लेते हैं। वो अपने घरों में बच्चों से क्या बातें करते होंगे, सोचता हूं। वो कसरत के लिए बच्चों को सांपों का वीडियो दिखाते होंगे। वो उन्हें इतना लचीला बना देना चाहते होंगे कि वो किसी बिल में दुबक कर आराम से ज़िंदगी गुजार सकें। वो जब स्कूल जाएं तो उनके लिए सबसे अच्छे पराठे हों, सबसे महंगे मोबाइल हों और सबसे अमीर दोस्त। वो अगर कॉलेज में पढने जाएं तो किताबों के बजाय किसी टीचर से सेटिंग करने में ज़्यादा माहिर हो सकें। अगर कभी पढ़ाने लग जाएं तो कॉपियां सही जांचने के बजाय ज्यादा कॉपियों के नाम पर ज़्यादा बिल भरने की कला सीख सकें। वो जिस पेशे में जाएं, महान बनन के तरीके ढूंढ निकालें। उनके लिए दोस्ती और दुश्मनी जेब में रखे चिल्लर से भी कम क़ीमती शब्द हों, जिनका इस्तेमाल मूंगफली खाने से लेकर किताबें छपवाने तक के लिए किया जा सके। ज़िंदगी उनके लिए प्रयोगशाला न होकर दलाली का अड्डा बन जाए। वो कृष्ण पक्ष में जिसके पीठ पीछे गालियां बकते रहें, जिनके खिलाफ उसूलों की दुहाई देते रहें, शुक्ल पक्ष में उनके साथ किट्टी पार्टियां करें, साहित्यिक विमर्श करें, एक-दूसरे की शादियों में लिफाफे लेकर जाएं और 'दोस्ती' के गाने साथ में गुनगुनाने लगें। वो रात को सोने से पहले एक गिलास गरम दूध पिएं, बुद्धिजीवी कहे जाएं और नए सांपों को अपनी तरह का बनाते जाएं। एक दिन वो और उनकी पाली-पोसी नई पीढी महान हो जाएं।

ऐसे कई नाम याद आ रहे हैं, जिनका नाम ले-लेकर ज़िक्र करने और ग़ुस्सा उतारने का मन हो रहा है, मगर इसमें कैरियर का नुकसान भी है और जान जाने का ख़तरा भी। बुद्धिजीवियों के गिरोह किसी आतंकवादी गिरोह से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक होते हैँ। ये बात पूरे होशोहवास में कह रहा हूं और इसका हर जीवित व्यक्ति,कहानी या घटना से पूरा संबंध है। किसी भी हालत में इसे संयोग न समझा जाए।

निखिल आनंद गिरि

Saturday, May 4, 2013

धूप जब टेढ़ी होती है..

आप कैसे ठीक कह जाते हैं इतना..
कि हम संभालते रहते है हिज्जे..
पूर्ण विराम तक पहुंच नहीं पाते कभी,
सांस उखड़ने लगती है हर बार...

आप तो सांस भी ठीक लेते हैं..
छींकते भी ठीक ही हैं माशाअल्लाह..
महान होना का फायदा यही है,
आप कहीं भी महान बने रह सकते हैं..
मंदिर में, मस्जिद में, शौचालय में भी..
अस्पताल तक में डॉक्टर गर्व से भर जाता है
जब ठीक कर रहा होता है आपके बलतोड़..
कि ये एक महान आदमी का पिछवाड़ा है..

ये जो राजधानी बनी फिरती है..
स्वर्ग की फोटोकॉपी लगती है कभी-कभी..
यहां महान आदमी  विचरते हैं लाल बत्ती में..
धुआं छोडते ग़ायब हो जाते हैं देवता..
आम आदमी भी चलता है यहां आसमान में..
और टोकन लेने पर गायब हो जाता है पसीना..

आप ठीक कहते थे अक्सर
किताबों को उलटते-पलटते..
पुस्तकालय किसी दूसरी ग्रह का शब्द लगता है..
लाइब्रेरी एक आसान शब्द है..
जीभ अटकती नहीं कहीं भी..
महानता का आभास होता है..

धूप जब टेढी होती है..
तीखी और गुस्सैल भी..
आप सूरज से बचकर निकलते हैं..
कोई क्रीम लगाते हैं चेहरे पर..
और सूरज का सामना करने लगते हैं..
हमारे पास सूरज नहीं उतना..
कि हम सामना करें सूरज का..

किसी ने सिखाई ही नहीं ये तमीज़..
कमीज़ पहनना ही काफी नहीं है..
पैंट के भीतर होनी चाहिए कमीज़..
आपने ठीक ही कहा,
जूते पॉलिश होने चाहिए
मगर जूता भी होना चाहिए
पॉलिश के लिए सज्जनों...

हमें सिखलाया गया था रंग के बारे में..
कि ख़ून और पानी दो अलग रंग हैं..
पानी बहता है तो खुशी आती है..
खून बहता है तो खुशी जाती है..

आपको क्या सिखलाया गया था..
कौन-सी किताबें पढी थी आपने..
कि प्यास ख़ून से बुझती है..
और पानी बहता है पैसे की तरह ..
खून के धब्बे मिटाने में..
चाहे धब्बा कितना भी पुराना क्यों न हो...

चौरासी या दो हजार दो के धब्बे,
मिटाए जा सकते हैं अदालतों में...
तीस-चालीस-हजार बरस बाद भी..

निखिल आनंद गिरि

Sunday, April 14, 2013

मैं एंकर हूं और रिक्शे पर भी चलता हूं..

कई बार टीवी पर रोज़ सूट-बूट में आने वाले एंकरों पर लिखने का मन करता है। कैसे एक बार कैमरे के सामने आने के बाद उनकी बॉडी लैंग्वेज किसी 'तीसमारखां 'जैसी हो जाती है, कैसे वो ख़ुद को ''लार्जर दैन लाइफ'' समझने लगते हैं। और ये भी कि कैसे दस-बारह हज़ार रुपये की सैलरी में भी ख़ुद को  लखटकिया एंकर जैसा'मेंटेन' करने की मजबूरी उन्हें एक पत्रकार के बजाय किसी ऑर्केस्ट्रा का 'आइटम पीस' बनाकर छोड़ देती है, जिसके लिए चेहरे का चमकना और होठों से मुस्कुराना एक मजबूरी बन जाती है। एनडीटीवी एंकर रवीश कुमार के ब्लॉग पर ऐसा ही एक लेख दिखा तो 'आपबीती' पर भी शेयर करने का मन हुआ..रवीश लंबे समय तक टीवी पर रिपोर्टिंग करते दिखे और अचानक सूट-बूट में कैमरे के आगे बिठा दिए गए..ये लेख उनके एंकर बनने के बाद की घुटन का एक हिस्सा भर है..

महानगरों में आपके रहने का पता एक नई जाति है। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाति की पहचान की अपनी एक सीमा होती है। इसलिए कुछ मोहल्ले नए ब्राह्मण की तरह उदित हो गए हैं और इनके नाम ऋग्वेद के किसी मंत्र की तरह पढ़े जाते हैं। पूछने का पूरा लहज़ा ऐसा होता है कि बताते हुए कोई भी लजा जाए। दक्षिण हमारे वैदिक कर्मकांडीय पंरपरा से एक अशुभ दिशा माना जाता है। इस पर एक पुराना लेख इसी ब्लाग पर है। सूरज दक्षिणायन होता है तो हम शुभ काम नहीं करते। जैसे ही उत्तरायण होता है हम मकर संक्रांति मनाने लगते हैं। लेकिन मुंबई और दिल्ली में दक्षिण की महत्ता उत्तर से भी अधिक है। दक्षिण मतलब स्टेटस। मतलब नया ब्राह्मण।


जब तक रिपोर्टर था तब तक तो लोगों को मेरे ग़ाज़ियाबादी होने से कोई खास दिक्कत नहीं थी। जब से एंकर हो गया हूं लोग मुझसे मेरा पता इस अंदाज़ में पूछते हैं कि जैसे मैं कहने ही वाला हूं कि जी ज़ोर बाग वाली कोठी में इनदिनों नहीं रहता । बहुत ज़्यादा बड़ी है। सैनिक फार्म में भी भीड़ भाड़ हो गई है। पंचशील अमीरों के पते में थोड़ा लापता पता है। मतलब ठीक है आप साउथ दिल्ली में है। वो बात नहीं । फ्रैंड्स कालोनी की लुक ओखला और तैमूर नगर के कारण ज़ोर बाग वाली नहीं है मगर महारानी बाग के कारण थोड़ा झांसा तो मिल ही जाता है। आप कहने को साउथ में है पर सेंट्रल की बात कुछ अलग ही होती है । मैं जी बस अब इन सब से तंग आकर अमृता शेरगिल मार्ग पर रहने लगा हूं। खुशवंत सिंह ने बहुत कहा कि बेटे रवीश तू इतना बड़ा स्टार है, टीवी में आता है, तू न सुजान सिंह पार्क में रहा कर। अब देख खान मार्केट से अमृता शेर गिल मार्ग थोड़ी दूर पर ही है न। सुजान सिंह पार्क बिल्कुल क्लोज। काश ऐसा कह पाता । मैं साउथ और सेंट्रल दिल्ली में रहने वालों पर हंस नहीं रहा। जिन्होंने अपनी कमाई और समय रहते निवेश कर घर बनाया है उन पर तंज नहीं है। पर उनके इस ब्राह्रणवादी पते से मुझे तकलीफ हो रही है। मुझे हिक़ारत से क्यों देखते हो भाई ।


तो कह रहा था कि लोग पूछने लगे हैं कि आप कहां रहते हैं। जैसे ही ग़ाज़ियाबाद बोलता हूं उनके चेहरे पर जो रेखाएं उभरती हैं उससे तो यही आवाज़ आती लगती है कि निकालो इसे यहां से। किसे बुला लिया। मैं भी भारी चंठ। बोल देता हूं जी, आनंद विहार के पास, गाज़ीपुर है न वो कचड़े का पहाड़,उसी के आसपास रहता हूं। मैं क्या करूं कि गाज़ियाबाद में रहता हूं। अगर मैं टीवी के कारण कुछ लोगों की नज़र में कुछ हो गया हूं तो ग़ाज़ियाबाद उसमें कैसे वैल्यू सब्सट्रैक्शन (वैल्यू एडिशन का विपरीत) कैसे कर देता है। एक माॅल में गया था। माॅल का मैनेजर आगे पीछे करने लगा। चलिये बाहर तक छोड़ आता हूं। मैं कहता रहा कि भाई मुझे घूमने दो। जब वो गेट पर आया तो मेरी दस साल पुरानी सेंट्रो देखकर निराश हो गया। जैसे इसे बेकार ही एतना भाव दे दिये। वैसे दफ्तर से मिली एक कार और है। रिक्शे पर चलता फिरता किसी को नज़र आता हूं तो लोग ऐसे देखते हैं जैसे लगता है एनडीटीवी ने दो साल से पैसे नहीं दिये बेचारे को।

कहने का मतलब है कि आपकी स्वाभाविकता आपके हाथ में नहीं रहती। प्राइम टाइम का एंकर न हो गया फालतू में बवाल सर पर आ गया है । तभी कहूं कि हमारे कई हमपेशा एंकर ऐसे टेढ़े क्यों चलते हैं। शायद वो लोगों की उठती गिरती नज़रों से थोड़े झुक से जाते होंगे। मुझे याद है हमारी एक हमपेशा एंकर ने कहा था कि मैं फ्रैड्स कालोनी रहती हूं । डी ब्लाक। फ्रेड्स कालोनी के बारे में थोड़ा आइडिया मुझे था। कुछ दोस्त वहां रहते हैं। जब बारीकी से पूछने लगा तो ओखला की एक कालोनी का नाम बताने लगीं। बड़ा दुख हुआ। आप अपनी असलीयत को लेकर इतने शर्मसार हैं तो जाने कितने झूठ रचते होंगे दिन भर। इसलिए जो लोग मुझे देख रहे हैं उनसे यही गुजारिश है कि हम लोग बाकी लोगों की तरह मामूली लोग होते हैं। स्टार तो बिल्कुल ही नहीं। हम भी कर्मचारी हैं । काम ही ऐसा है कि सौ पचास लोग पहचान लेते हैं। जैसे शहर के चौराहे पर कोई होर्डिंग टंगी होती है उसी तरह से हम टीवी में टंगे होते हैं। मैंने कई एंकरों की चाल देखी है । जैसे पावर ड्रेसिंग होती है वैसे ही पावर वाॅक होती है । ऐसे झटकते हैं जैसे अमित जी जा रहे हों । उनकी निगाहें हरदम नापती रहती हैं कि सामने से आ रहा पहचानता है कि नहीं । जैसे ही कोई पहचान लेता है उनके चेहरे  पर राहत देखिये । और जब पहचानने वाला उन्हें पहचान कर दूसरे एंकर और चैनल का नाम लेता है तो उस एंकर के चेहरे पर आफ़त देखिये !

तो हज़रात मैं ग़ाज़ियाबाद में रहता हूं। मूल बात है कि औकात भी यही रहने की है। इसलिए सवाल मेरी पसंद का भी नहीं है। बाकी एंकरों का नहीं मालूम। आप उनसे पूछ लीजिएगा। लेकिन नाम सही लीजियेगा । बेचारों पर कुछ तो दया कीजिये ।

रवीश कुमार

Monday, March 25, 2013

घर में पधारो 'योयो' जी..

हनी सिंह का रैपर अंश
हिमाचल-पंजाब से लेकर बिहार-झारखंड तक के शादी समारोहों में दो चीज़ें ज़रूर होती हैं। एक तो वीडियो कैमरा और दूसरा डीजे। कैमरे का स्तर तो बहुत ज़्यादा नहीं बदला मगर डीजे का ज़रूर बदल गया है। शहनाई की धुन वाले समारोह मैंने देखे नहीं। 'आज मेरे यार की शादी है', 'बाबुल की दुआएं लेती जा'' का दौर अब पूरी तरह बीत चुका है। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' फिल्म में शारदा सिन्हा का गाया गीत 'तार बिजली से पतले हमारे पिया' भी नया तो है, मगर नए ज़माने का नहीं है। नए ज़माने में तो बस हनी सिंह हैं। हनी सिंह को जानना हो तो गूगल नहीं दिल्ली की गलियों में घूमना चाहिेए।

द्वारका क्षेत्र का बहुत पुराना गांव है ककरौला। जाट इतिहास से जुड़ी कई नामी हस्तियां इस इलाके से रहीं। एक स्थानीय जाट लेखक के बुलावे पर उनके भतीजे की शादी में शिरकत करने का मौका मिला। ऊपर से नीचे तक सफेद कमीज़ और पैंट में छोटे-बड़े तमाम लोग कमाल के लग रहे थे। औरतें साड़ियों में थीं और बच्चे रंग-बिरंगे परिधानों में। शादी के लिए तैयार किए गए शामियाने के ठीक बीच में हुक्के की महफिल लगी हुई थी। खाने में तंदूरी रोटी के साथ गांव का शुद्ध देसी घी भी एक बर्तन में रखा हुआ था।  इन सबके बीच कैमरे और डीजे का इंतज़ाम भी था। गाने वही जो बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश की शादी वाले डीजे में बज रहे थे। कुछ फिल्मी आइटम गीत और बहुत कुछ हनी सिंह। मैंने अपने लेखक 'अंकल' से कहा, बाक़ी सब तो ठीक है, मगर ये डीजे ककरौला गांव के देसी घी की तरह असली नहीं है। मुझे तो ठेठ जाट अंदाज़ वाली शादी देखने का मन था। उन्होंने कहा, 'गांव के लोग हैं, इन्हें असली-नकली की इतनी समझ नहीं, शहर में जो लोकप्रिय है, गांव तक आ ही जाता है।'

इसके कुछ दिन बाद ही दिल्ली के कई कॉलेजों में चल रहे फेस्ट में जाने का मौक़ा मिला। हर जगह ककरौला मेरे साथ ही रहा। सफेद लिबास और देसी घी वाला ककरौला नहीं, डीजे वाला ककरौला। हनी सिंह के गानों पर झूमता ककरौला। हनी सिंह हर कार्यक्रम में खु़द नहीं आए तो उनकी टीम के रैपर (मुख्य गवैये) पधारे और माहौल हनीमय कर दिया। समस्तीपुर और रांची की शादियों में भी कुछ गाने हनी सिंह के थे। हनी सिंह के बारे में मेरी जानकारी इतनी ही है जितनी मनमोहन सिंह के रसोइये के बारे में। मगर मेरी जानकारी के स्तर से हनी सिंह का क़द मत मापिए। हनी सिंह को समझना हो तो दिल्ली के कॉलेजों में हो रहे रंगारंग कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग कहीं से देखिए। हनी सिंह के गीत मंच पर शुरू होते नहीं कि होंठ से होंठ मिलाकर नौजवान उन गीतों पर झूमते-थिरकने लगते। ऐसा कंठस्थ वातावरण मैंने सिर्फ आरती के वक्त मंदिरों में ही साक्षात देखा है।

हनी सिंह दिल्ली-पंजाब की डीजे जेनरेशन के ख़ुदा यूं ही नहीं लगते। 'श्री श्री' की तरह हनी सिंह भी अपने नाम के साथ 'यो यो' लिखते हैं। गूगल पर लाख ढूंढने के बावजूद कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिला कि 'यो यो' विशेषण लगाने से आदमी के नाम में कितने चांद लग जाते हैं। ख़ैर, यो यो की कुछ और ख़ासियतें भी हैं। एक तो ये कि एकदम नई पीढ़ी के बच्चों के नाम अब चीकू, मीकू, पीकू से योयो, जोजो, भोंभों होते जा रहे हैं। दूसरा, शाइरी अपने टूटे-फूटे रूप में भी ज़िंदा बची हुई है। 'बरसात का मौसम है, बरसात न होगी..तू नहीं आएगी तो क्या रात न  होगी' जैसे शेरों पर योयो के भक्त जब 'वंस मोर' का जयकारा लगाते हैं तो लगता है उनके चेहरे से पसीना नहीं, गंगा मैली होकर बह रही हो।

भद्दे गीतों पर झूमते योयो के दीवानों में सिर्फ लड़के ही नहीं, लड़कियां भी हैं। आप उन्हें बुरा-भला कह सकते हैं, मगर वो अपना बुरा-भला ख़ुद सोच-समझ सकने वाली पीढ़ी है। उन्हें पता है कि दिल्ली में कॉलेज के भीतर किस लेक्चरर का कितना लेक्चर सुनना है और किसका कितना संगीत सुनना है। योयो के माध्यम से वो अपनी ज़िंदगी जीने का तरीका चुन रहे हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। अब तो किसी योयो को ही किसी यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर बना देना चाहिए। कम से कम किसी कॉलेज का प्रिंसिपल तो ज़रूर ही। प्रोफेसर, डॉक्टर जैसे विशेषण से अब बुद्धिजीवी ऊबने लगे हैं। उनकी किताबी बातें आजकल किसी के पल्ले भी नहीं पड़तीं। तभी तो वो अपने बच्चों का दिल बहलाने के लिए लाखों का फंड खर्च करके योयो को न्योता भेजते हैं।  कॉलेज में क्लास के भीतर बहुत कम बच्चे होते हैं। योयो को सुनने पूरा कॉलेज आता है। योयो ही इस वक्त की मांग है।

लेकिन ऐसा क्यों हुआ है? हनी सिंह के गाए कुछ गीतों के शब्द और आशय पढ़ने के बाद दिल दहल जाता है। स्त्रियों के खिलाफ शायद इससे घिनौने लहजे में कुछ और नहीं कहा जा सकता। इसके बावजूद एक बड़ा तबका हनी सिंह को सुनकर क्यों दीवाना होता है? क्या वही गीत वह अपने घर की महिलाओं के बारे में सुनकर उसी भाव में झूमेगा? वहां उसकी 'मर्दानगी' कैसे रिएक्ट करेगी? एलीट स्कूल-कॉलेजों से निकली युवतियों को ये समझना क्यों मुश्किल हो रहा है कि हनी सिंह के गाये कुछ गीत  उन्हें किस अंधे कुएं में धकेल कर छोड़ रहे हैं। क्या हमारी पढ़ाई-लिखाई की ज़मीन इतनी खोखली है कि यह अपने ही सम्मान,गरिमा और अस्तित्व को अपमानित करने के कारकों को हमें पहचानने नहीं देती?

निखिल आनंद गिरि
(सभी तस्वीरें सस्ते मोबाइल से खींची गई हैं..)
(25 मार्च 2013 को 'जनसत्ता' अख़बार में प्रकाशित)

Sunday, March 17, 2013

ओ आसमान की परियों !!

जब हर तरफ बसंत था..
हर दिन, हर रात, हर पहर..

तुमने चांद को चांद कहा
मैंने चांद ही सुना..
(ऊब की हद तक चांद)
तुमने जो कहा भला-बुरा
सब भला सुना मैंने...
ग्लोब से बढ़कर..
एक चेहरा तुम्हारा..
उन लकीरों में ही
सब पढ़े मैंने
महाद्वीप, महादेश वगैरह वगैरह..

फूल झरते थे बिना बात के भी..
सपनों में भी उतर आती थी खुशबू..
सब सन्नाटे, संगीत से बढ़कर..
सब भाषाओं से बढ़कर एक अनंत मौन..

तब एक बार आई थी बड़ी बीमारी,
और मैं हंसते-हंसते ठीक हुआ था..
एक बार गिरा था मैं तीसरी मंज़िल से,
मगर जाने किस ख़याल में बचा रहा साबुत...
मैं एक बार आसमान को तकता,
तो तीन परियां कहीं से उतर आतीं..
मेरा माथा सहलातीं और मैं सो जाया करता..

कैसे आई इतनी झूठी
इतनी मीठी, इतनी लंबी नींद
बिना नींद की गोली के..

अब जब जागा हूं..
हर तरफ बंजर है..
हर तरफ अंधेरे..
कोई और नहीं आसपास,
सिवाय एक अनजान चेहरे के..
उजाला बनकर मेरे साथ खड़ा है..
मेरे सब कालेपन के बावजूद..

ये बसंत नहीं है
आसमान की परियों..
कोई नया मौसम है..
मैं जीने लगा हूं शायद..
तुम्हारी यादें धुधला रही हैं..
आसमान की परियों...
मैं जाग रहा हूं..

निखिल आनंद गिरि

Tuesday, March 5, 2013

जिम जाती लड़की...

मेरी पार्वती बुआ घर का सारा काम करती थी
मगर मां की ननद नहीं थीं बुआ...
मां बताती है कि जब हम भी नहीं थे,
तब परबतिया एक लड़की जैसी थी
जिसके बाल उलझे थे
और हाथों में खुरपी थी...
उसके नाम के साथ हरदम एक गाली लगाकर
बुलाती थी बड़की माई...
खेत से दौड़ी चली आती थी बुआ
बिन चप्पल के, फटी साड़ी लपेटे....
 
बुआ दौड़ती थी, सच में दौड़ती थी...
वैसे नहीं जैसे ट्रेडमिल पर दौ़ड़ती हैं लड़कियां
दिल्ली के जिम में...
एसी में हांफतीं, झूठमूठ की..
डेढ़ कोस दूर बांध पर से लौटती थी बुआ
तीन गायों के साथ रोज़ाना
सारा गोबर टोकरी पर उठाए...
कम से कम एक पसेरी तो होगा ही..
सच में लाती थी गोबर...
वैसे नहीं जैसे जिम में होते हैं
झूठमूठ के बटखरे...
दो किलो, पांच किलो वगैरा वगैरा
 
इतना थककर भी बुआ खेलती थी कितकित
और गाती थी सामा चकवा के मीठे गीत
बुआ बैडमिंटन नहीं खेली कभी
जैसे झूठमूठ का खेलती हैं
पार्क में जाने वाली लड़कियां
जिन्हें घूरते रहते हैं हर उम्र के मर्द
बुआ ने शायद ही देखा हो कभी आईना
गोबर से घर लीपती गंदी बुआ
मिट्टी में सनी हुई काली बुआ
बुआ को देखता नहीं था कोई प्यार से
भैंस चराता नेटचुआ भी नहीं..
जैसे जिम वाली लड़की को देखते हैं सब...
और वो एक शोर को निर्गुण समझकर...
रिदम में चलाती है साइकिल झूठमूठ की...
 
अचानक याद आ गई मां जैसी पार्वती बुआ
जिम में लहराती जिस लड़की को देखकर
शर्त लगाकर कह सकता हूं मैं...
परबतिया नहीं हो सकता इसका नाम..
 
 
बुआ और बैडमिंटन वाली लड़की के बीच
मैं किसी बीमारू राज्य के पुल की तरह हूं
जो कभी भी भरभरा कर गिर सकता है
पार करने के बारे में सोचने तक से भी...
निखिल आनंद गिरि

Thursday, February 14, 2013

हमारी रातों में सपने हैं, नींद नहीं...

तुम्हारे बाद भी भूख लगती है पेट को,
और आंखों को आंसू आते हैं...
देश में कहीं कोई हड़ताल भी नहीं हुई,
और आप कहते हैं बेवफाई बड़ी चीज़ है...

जहां राजनीति नहीं, वहां सिर्फ प्यार  है..
और प्यार से कवि बना जा सकता है
लेखक बना जा सकता है...
बहुत हुआ तो वैज्ञानिक भी,
मगर एक ऐसा आदमी नहीं,
जिसे गणमान्य समझा जाए।

मेरे पिता से पूछिए,
उन्हें गणमान्य आदमी कितने पसंद हैं..
वो चाहते रहे हमें एक ख़ास आदमी बनाना...
लाल बत्ती न सही, गाड़ी ही कम से कम...
और हम पैदल चलते रहे सड़कों पर,
पांच रूपये की मूंगफली और हथेली थामे...

हम दोनों एक ही अखबार पढ़ते हैं...
अलग-अलग शहरों में....
पिता का समाज और है,
हमार समाज कुछ और...
फिर भी हम एक परिवार के सदस्य तो हैं....
जहां मां जोड़ती है दोनों को..
और बालों का ख़ालीपन भी...

उन्हें नींद नहीं आती हमारी फिक्र में ...
हमें नहीं आती कि हमारे पास सपने हैं...
जो पूरे नहीं होंगे कभी...
और देखिए किसी सरकारी दफ्तर की तरह,
हर तरफ रातें हैं,
मगर किसी काम की नहीं....

वो सुबह का वक्त था
कि एक दिन पटरियों के दोनों ओर,
पांव फैलाकर चल रहे थे हम
और तुम्हारी हथेली थी मेरी आंखों पर..
मैंने पहली बार एक सपने की आवाज़ सुनी थी...

देखना एक दिन हम भी अमीर हो जाएंगे
और हमारे बच्चे आवारा....
उन्हें मालूम होगा सिर्फ ख़ून का रंग
और फिर भी शरीफ कहे जाएंगे
उस सपने को चुराकर बनेगी फिल्म
तो नाम क्या रखा जाएगा ?

निखिल आनंद गिरि
(संवदिया पत्रिका में प्रकाशित)