पटना सिख धर्म के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की धरती है। उनकी जयंती पर तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में कई वर्षों से भव्य प्रकाश पर्व आयोजित होता है।
रविवार, 28 दिसंबर 2025
रेडियो पर लाइव कमेंट्री के दौरान क्या करें और क्या नहीं
पटना सिख धर्म के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की धरती है। उनकी जयंती पर तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में कई वर्षों से भव्य प्रकाश पर्व आयोजित होता है।
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025
तेज़ आंच पर पाकिस्तान मीट मसाला डालकर दस सीटी में तैयार हुई देशभक्ति थाली है धुरंधर
OTT दौर की फिल्मों और मसाला वेबसीरीज़ों ने भारत सरकार के देशभक्ति वाले मिशन को इस कदर प्रभावित किया है कि इस दौर की देशभक्ति भी सस्ता प्रोपेगैंडा नज़र आती हैं। ताज़ा उदाहरण है "धुरंधर।"
अगर आपने मिर्ज़ापुर देखी हो तो एक बड़े पतीले में मिर्ज़ापुर की नकली बंदूकों वाले किस्से मिलाइए, गद्दी कौन संभालेगा की बहस स्वादानुसार डालिए। ऊपर से गैंग्स ऑफ वासेपुर भी छिड़क दीजिए। विश्वगुरु भारत का डिफेंस मास्टरप्लान थोड़ी देर में पककर दर्शकों को परोसने के लिए तैयार है।
इस फिल्म ने हाल में सोशल मीडिया पर इतना शोर मचाया है कि लगा इसे नहीं देखना देशद्रोह में न शामिल मान लिया जाए। लेकिन अगर आपने अब तक इसे नहीं देखा है तो बेहतर है किसी और बेहतर फिल्म का इंतज़ार कर लें। कांधार विमान अपहरण से शुरू होते हुए फिल्म इतनी लंबी और उबाऊ होती जाएगी कि आप विमान में बैठकर दिल्ली से कोलंबो पहुंच सकते हैं।
फिर भी अगर आपको फिल्म देखनी ही है तो ये बता देना ज़रूरी है कि आप नाश्ते से लंच तक का इंतज़ाम अपने साथ रखें और बच्चों को पड़ोसी के यहां रखकर जाएं। इतना खून बुरी तरह बहाया जाएगा कि कमज़ोर दिलवाले जेन ज़ी के लड़के भी आँखें बंद कर के कई दृश्य देख पाएंगे।
अगर आप अब भी कहानी जानने की इच्छा रखते हैं तो देश के लिए वो भी बता देना ज़रूरी है। कहानी में भारत की सुरक्षा एजेंसी का एक ख़ास मिशन धुरंधर है जो एक ऐसा NIA चीफ तैयार करता है जो सरकारें और दशक बदलने के बावजूद चीफ बना रहता है।
चूंकि भारत की सुरक्षा का सवाल है तो बिना पाकिस्तान और मुसलमान की फ़ज़ीहत किए बिना बन ही नहीं सकता। तो अब चलिए पाकिस्तान और कराची का टूरिस्ट पैकेज लीजिए। वहां के लोकल गुंडे कब बड़े आतंकवादी बन जाएं, पता नहीं, लेकिन लगभग हर गुंडा सड़कछाप गालियां बकता है, होमोसेक्सुअल भी है।
"हिंदू बहुत डरपोक कौम है।" "हिंदुस्तानियों के सबसे बड़े दुश्मन हिंदुस्तानी हैं, पाकिस्तान दूसरे नंबर पर आता है" इस तरह के डायलॉग बोलकर फिल्म के पात्र आपके भीतर आक्रोश का प्रतिशत बढ़ाने की पूरी कोशिश करेंगे मगर आपने घबराना नहीं है।
फिल्म में कुछ रोमांस भी है। तो रणबीर सिंह जो एक गुंडे का सबसे छोटा प्यादा है, उसको सीधा विधायक की बेटी से प्यार हो जाता है। फिर वो बाइक पर घूमेंगे, लड़की इंप्रेस हो जाएगी। पेट्रोल झूठमूठ का ख़त्म हो जाएगा। दोनों पैदल घर तक आयेंगे। लड़की और इंप्रेस हो जाएगी। पाकिस्तान की सड़कें इतनी अच्छी और पुलिस इतनी ख़ाली है कि सब इन दोनों आशिकों को शहर भर में दौड़ाएंगी, पकड़ नहीं पाएंगी।
फिर कहानी में संजय दत्त को भी आना है। अक्षय खन्ना की इतनी तारीफ मैंने पिछले बीस साल में नहीं सुनी, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं है जो "दिल चाहता है" से बेहतर हो। इतने बड़े गुंडे (आतंकवादी) और इतने लोकल टाइप मारपीट के सीक्वेंस है कि लगेगा वो भारत के खिलाफ नहीं दो पीस चिकन के लिए लड़ रहे हैं।
इसके बाद फिल्म मे कुछ बचता है तो वो अच्छा भी है। संसद पर हमला, मुंबई में ताज हमला और इन सबके पीछे के कनेक्शन समझाने की कोशिश पहली बार किसी फिल्म में एक साथ दिखी है।
एक पुराने और अनुभवी दर्शक की तरह कहूं तो इसे वेबसीरीज़ ही बनाने की योजना रही होगी जो अचानक से फिल्म बना दी गई, इसीलिए ज़्यादा बोरियत हुई वरना फिल्म के सभी मसाले मौजूद हैं। फिल्म एक बार शुरू होगी तो ख़त्म ही नहीं होगी। और जब ख़त्म होगी तो कहानी किसी वेबसीरीज़ की तरह अगले भाग का ऐलान भी करेगी।
गुरुवार, 4 दिसंबर 2025
चार दिसंबर की चिट्ठी
जनवरी को नहीं होना था ऐसा
कि ठंड में एम्स की पर्ची कटानी पड़े
कोहरा सिर्फ शहर में ही नहीं
जीवन में प्रवेश कर जाए।
फरवरी में डॉक्टर बताए कि
नहीं बची है उम्मीद साल पूरा कर पाने की
बसन्त की आहट से लगे डर
और मार्च की एक दोपहर
हम तय कर रहे हों कि
कीमो के लिए सरकारी बेहतर या प्राइवेट
अप्रैल में जब शुरू हो इलाज
क़र्ज़ या मदद तो छोड़िए
मिलने जुलने से भी कतराने लगे परिवार समाज
दवाई की कड़वाहट और हर तरफ़ अवसाद
मई में भी नहीं किसी अच्छे दिन की याद
जून में सिर्फ शरीर रह गया सूख कर
आत्मा इलाज में निचोड़ दी गई
जुलाई अगस्त तक याद हो गई दिनचर्या
पहले कीमो चढ़ेगा
फिर बारिश आयेगी
फिर बुखार आयेगा
फिर सांत्वना के लिए लोग
फिर कड़वी दवाएं
और यही अंतहीन चक्र चलता रहेगा
सितंबर तक सीख चुकी बेटी
बिना खाए हंसना
और बिना रोए जीना
अक्टूबर में छूट गई नवंबर की तैयारी
वेटिंग की टिकट और गांव लौटने की मारामारी
अब तो यह भी याद नहीं
कि आखिरी बार किस नवंबर माथा टेका था
खरना में हमने एक साथ।
कब लड़े थे कि कितने बजे ठेकुआ प्रसाद बनना शुरू होगा
हमारे दिसंबर में एक दिन मुस्कुराता था
तब भी और अब भी
यह उसी तारीख का एक ख़त है तुम्हारे नाम
ये अभिशप्त चिट्ठी ख़ुद ही लिखनी है
और ख़ुद ही पढ़नी है सैंकड़ों बार
काश इस चिट्ठी को उम्मीद के साथ ख़त्म किया जा सकता था -
विशेष मिलने पर।
निखिल आनंद गिरि
शुक्रवार, 7 नवंबर 2025
एक पीठासीन अधिकारी की डायरी
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025
पायल की झंकार
मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025
अलिफ़ की तरह हूं, बिल्कुल अकेला
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025
मैं बुरा था जब तलक ज़िंदा रहा
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025
कीमोथेरेपी: शोक और यथार्थ
शनिवार, 9 अगस्त 2025
ग़लत पता
मंगलवार, 15 जुलाई 2025
फ़िक्र
सोमवार, 23 जून 2025
एक आईने का ख़त
रविवार, 22 जून 2025
भयानक अंधेरे में दीवार टटोलते कवि का संग्रह है – ‘गीली मिट्टी पर पंजों के निशान’
इस संग्रह की कविताएँ सिर्फ अतीत की मीठी गोलियां ही नहीं, अतीत की बुनियाद पर वर्तमान में खड़े कवि और उसके भविष्य की शंकाएँ भी बताती हैं। एक छोटी कविता है, जो इस संग्रह की दूसरी कविता है - ‘वह’, देखिए -
वह गली नुक्कड़ पर तनकर खड़ा था।
लोग आते जाते सिर नवाते चद्दर चढ़ाते उसको।
दीमक ने अपना महल बना लिया था, अंदर ही अंदर उसके।
मैंने जब वरदान मांगा तो वह ढह गया। (कविता – वह)
दीमक का महल बना लेना एक दिन की प्रक्रिया नहीं होती। लंबा समय लगता है। दीमक जहां घर बना ले, उस जगह को छोड़ देना ही बेहतर होता है। एक कवि अगर इस ख़तरे को पहचानता है तो उसे पढ़ा जाना चाहिए। उस कवि ने अपने समय में, इन कविताओं के रचना काल के लिहाज़ से देखें तो पंद्रह सालों के दौरान, इस दीमक को महल बनाते देखा है और उसमें एक कवि का डर यह है कि वह इन दीमकों से बचकर कहीं नहीं जा सकता। यह बचपन या डर की मीठी स्मृतियां कवि के डर की निर्मिति और प्रवेश भी कविताओं के ज़रिए बताती है।
यह डर सिर्फ मनुष्य के भीतर पनप रहा डर नहीं है। वह हर तरफ से आता है, हर तरफ़ पसरता है। एक बाघ जो शिकारियों से घिर चुका है, वह पलटकर कहता है – ‘मैं तुम्हारे बच्चों के लिए बहुत ज़रूरी हूं, मुझे मत मारो’
बाघ फ़रीद की कई कविताओं में कई तरह से आता है। मां ने बाघ के आकार वाली रोटी अपने बच्चे को खाने में दी, नानी के चश्मे से बच्चे बाघ की तरह दिखते हैं।
बाघ से याद आया कि इस कविता के आवरण पृष्ठ पर उदय प्रकाश की टिप्पणी है, जो उन्होंने ‘एक और बाघ’ कविता की तारीफ़ में कही थी। यह कविता अंधेरे में कंदील की तरह है, हाशिये में पड़ी एक ऐसी कविता जो हिंदी कविता में एक प्रस्थान बिंदु की तरह है और आकस्मिक है। यह टिप्पणियां कविता संग्रह के शुरू में नहीं देनी चाहिए वरना रणजी ट्रॉफी में विराट कोहली के खेलने से पैदा हुई अश्लील भव्यता जैसा ख़तरा रहता है। बहरहाल..
जिन कविताओं में शहर, डर, भविष्य, ख़तरा जैसे तत्त्व एक साथ गुंथकर आते हैं, कविता मारक बनकर उभरती है।
‘मैंने पूछा उससे केवल एक ही सवाल
जिसने उठा रखा था हथियार क्रांतिकारी के वेश में,
बस एक ही सवाल,
कि अगर सौंप दी गई देश की बागडोर तुम्हें,
तो पहला काम क्या होगा जो तुम करोगे?
हमारा पक्ष चाहिए तो देना होगा जवाब!!!
उसने चला दी गोली, और मैं मारा गया सरेआम!!!! (कविता – मारा गया मैं)
इस तरह से देखें तो यह संग्रह फ़रीद ख़ां की स्मृति, शहर और डर की सूक्ष्म पहचान और उसमें भविष्य के ख़तरे पहचानने का संग्रह है। वर्तमान का डर और भविष्य का ख़तरा इतना अधिक है कि मजबूरी में स्मृतियों के सहारे ख़ुद को पुचकारने की कोशिश की गई है। जैसे फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में ख़तरे को ‘’ ALL IS WELL” कहकर टरकाता नायक। असलियत यह है कि फ़रीद ख़ां नाम के कवि के पास वर्तमान में मीठी स्मृतियां बस लॉलीपॉप की तरह ही हैं, और इस व्यवस्था या सत्ता में कुछ मीठा सोचने को नहीं है।
पटना की स्मृति में छठ का आना (कविता – छठ की याद में) या गंगा के पानी का मस्जिद को लात मारकर छेड़कर कहना कि ‘अबे मुसलमान, कभी मेरे पानी स नहा भी लिया कर’ (कविता – गंगा मस्जिद) अनायास नहीं है। यह एक इंसानियत का सपना संजोते हिंदुस्तानी कवि का बारीकी से कविता में राजनैतिक दख़ल है। कविता गंगा की छेड़छाड़ से अठारह साल बाद उस मीनार पर पहुंचकर देखती है कि सरकार ने अब वुज़ू के लिए साफ पानी की सप्लाई करवा दी है। गंगा कवि को देखती है, कवि गंगा को मगर मस्जिद किसी और तरफ़ देख रही है।
जिस रिदम में यह आलेख लिख रहा हूं, उसमें कवि की प्रेम कविताओं का ज़िक्र न किया जाना ही लाज़िम है। कुछ अच्छे मुहावरे हैं (तुमने मुझे सेंका और पकाया है), मेटाफ़र हैं, मगर यह कवि का मूल स्वर नहीं है।
फ़रीद की कविताओं में किस्सागोई बहुत है। लगभग हर कविता कहानी से शुरू होकर कविता बन जाती है। डर की कहानी है। बाघ की कहानी है। लकड़ सुंघवा की कहानी है। दादाजी साइकिल वाले की कहानी है जो इंदिरा गांधी की हत्या पर गुरु नानक की तरह सिर झुकाए निर्विकार से बैठे थे। कंस्ट्रक्शन साइट पर रोटी सेंक रही आदिवासी औरत, व्यवस्था से तंग आकर मजबूरी में नक्सली बने आम आदमी की कहानी है, हत्यारे तक की कहानी है।
कुछ कविताओं के विषय या कहानियां अच्छी हैं, मगर कविता नहीं। कविता की शुरुआत ही एक अच्छी पंक्ति या सूक्ति से होती है और फिर पूरी कविता अपने पूरा होने की औपचारिकता ढोती है। कई बार यह सूक्ति भी अपने आप में एक मुकम्मल कविता या हिंदी काव्य पंक्तियों में पैराडाइम शिफ्ट की तरह हैं –
उसकी बीवी ने अपनी जान बचाने कि लिए आत्महत्या कर ली (कविता – सोने की खान)
वह पंजा ही है जो बाघ और साहित्यकार को बनाता है समकक्ष।
दोनों ही निशान छोड़ते हैं।
मारे जाते हैं। (कविता – बाघ के पंजे)
देश को ज़रूरत है सच के प्रशिक्षण की। (कविता – इंसाफ़)
अब अख़बार पढ़ने से ज़्यादा बेचने के काम आते हैं (कविता -बिक रहे हैं अख़बार)
हिंसा का इतिहास पुरुषों का इतिहास रहा है। (कविता - अपमान की परम्परा का इतिहास)
आज़ान की आवाज़ नहीं थी मेरे कान में पहली आवाज़। वह मां की चीख़ थी। (कविता – मैं काफ़िर हूं)
कुछ कविताए इस कसौटी पर भी अद्भुत हैं जैसे – ‘क्यों लगता है ऐसा’
पता नहीं क्यों हर बार लगता है,
रेल पर सफ़र करते हुए कि टीटी आएगा और टिकट देखकर कहेगा
कि आपका टिकट ग़लत है
या आप ग़लत गाड़ी में चढ़ गए हैं...
संग्रह में शिल्प के लिहाज़ से अच्छी और अनुभव की दृष्टि से साहसी कविताओं की कमी नहीं – जैसे मुस्कुराहटें, अल्लाह मियां, चांद, पिटने वाली औरतें, धोखा, मादक और सारहीन।
इस तरह से कुछ ख़राब कविताओं का ज़िक्र भी यहां किया जा सकता था, मगर पंक्तियों के बीच बहुत कुछ छोड़ देना भी ज़रूरी होता है।
कविता संग्रह - गीली मिट्टी पर पंजों के निशान
मूल्य - 260/- रुपए
प्रकाशक - सेतु प्रकाशन
कुल पृष्ठ - 144
गुरुवार, 17 अप्रैल 2025
आख़िरी मुलाक़ात
मंगलवार, 4 मार्च 2025
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025
मौन रहिए
शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025
बसंत का शोकगीत
शनिवार, 1 फ़रवरी 2025
ठंडी प्रेम कथाएं
रविवार, 26 जनवरी 2025
शोर करने वालों से सावधान
गुरुवार, 9 जनवरी 2025
डायपर
मंगलवार, 7 जनवरी 2025
मर्दानगी
ये पोस्ट कुछ ख़ास है
रेडियो पर लाइव कमेंट्री के दौरान क्या करें और क्या नहीं
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कौ न कहता है कि बालेश्वर यादव गुज़र गए....बलेसर अब जाके ज़िंदा हुए हैं....इतना ज़िंदा कभी नहीं थे मन में जितना अब हैं....मन करता है रोज़ ...
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छ ठ के मौके पर बिहार के समस्तीपुर से दिल्ली लौटते वक्त इस बार जयपुर वाली ट्रेन में रिज़र्वेशन मिली जो दिल्ली होकर गुज़रती है। मालूम पड़...
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कवि मित्र अंचित ने जर्नल इंद्रधनुष पर कुछ दिन पहले मेरी कुछ कविताएं पोस्ट की थीं जिस पर एक सुधी पाठिका की विस्तृत टिप्पणी आई है। कीमोथेरेपी...















