रविवार, 28 दिसंबर 2025

रेडियो पर लाइव कमेंट्री के दौरान क्या करें और क्या नहीं


पटना सिख धर्म के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की धरती है। उनकी जयंती पर तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में कई वर्षों से भव्य प्रकाश पर्व आयोजित होता है।
संयोग देखिए कि बिहार आए दो ही बरस हुए हैं और इस बार  27 दिसंबर 2025 को आकाशवाणी (All India Radio) की तरफ से कीर्तन दरबार की लाइव कमेंट्री करने का मौक़ा मिला। दुनिया भर में news on air app के ज़रिए इस कार्यक्रम को सुना जाता है। 15- 20 सालों से रेडियो पर कार्यक्रम वगैरह करने का मौका मिलता रहा मगर पहली बार लगा कि जीवंत प्रसारण करना कितना चुनौती भरा और दिलचस्प अनुभव है। 
अगर मैं कहूं कि पटना आया नहीं हूं, मुझे गुरु गोबिंद सिंह जी ने बुलाया है तो क्या गलत होगा। 
ये पोस्ट इसीलिए भी ज़रूरी है कि कोई मीडिया का नया छात्र पढ़कर सीख सके कि लाइव कमेंट्री करने के दौरान क्या क्या चुनौतियां आ सकती हैं। 
- मौसम के हिसाब से अपने गले का ध्यान रखें। सारा खेल आपके गले से निकली साफ़ आवाज़ का ही है। थोड़ा गरम पानी साथ रखने से मुश्किल कम हो सकती है।
- जिस विषय पर भी बोलना हो, उसके बारे में थोड़े थोड़े नोट्स तैयार कर लें। पत्रकारिता में जिसे हम 5W 1H फॉर्मूला कहते हैं, उसका पालन यहां भी काम आता है। उदाहरण के तौर पर सिख समुदाय के बारे में किसी गैर - सिख की जानकारी आम तौर पर कम ही होगी और प्रसारण लाइव होता है तो संभव है कि बिना तैयारी के या कम जानकारी के आप माइक पर अटकेंगे।
- चूंकि ये एक धार्मिक आयोजन था, तो ध्यान रखना पड़ा कि कोई भी शब्द किसी को आहत करने वाला न हो और सिख धर्म की मर्यादा के अनुकूल हो। जैसे लंगर खाया की जगह लंगर छका या भीड़ की जगह संगत या श्रद्धालु।
- ज़रूरी नहीं कि कोई बंद कैबिन वाला कमेंट्री बॉक्स ही आपके पहले लाइव कमेंट्री प्रसारण के लिए मिले। हमें भव्य दीवान हॉल में चल रहे कीर्तन दरबार में संगत के बीच ही बैठने की जगह मिली जहां रागी जत्था के कीर्तन की आवाज़ और हजारों श्रद्धालुओं के जयकारे सब हमारी आवाज़ के साथ ही सुनाई पड़ रहे थे। तो ऐसे में आपको अपनी आवाज़ तेज़ भी रखनी है, माहौल पर नज़र भी रखनी है और ये भी देखना है कि कीर्तन के लिए अगला जत्था जब जाए तो सही वक्त पर उनके सही नाम लेकर रुकना भी है।
- रेडियो पर बोलने का मतलब ये भी है कि आपके बोलने को सही से प्रसारित करने के लिए तकनीकी टीम भी साथ होगी। तो उनके साथ भी आंखों का तालमेल बनाए रखना है कि कब बोलना शुरू करना है और कब ख़त्म।
वाहे गुरु।


निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

तेज़ आंच पर पाकिस्तान मीट मसाला डालकर दस सीटी में तैयार हुई देशभक्ति थाली है धुरंधर

OTT दौर की फिल्मों और मसाला वेबसीरीज़ों ने भारत सरकार के देशभक्ति वाले मिशन को इस कदर प्रभावित किया है कि इस दौर की देशभक्ति भी सस्ता प्रोपेगैंडा नज़र आती हैं। ताज़ा उदाहरण है "धुरंधर।"

अगर आपने मिर्ज़ापुर देखी हो तो एक बड़े पतीले में मिर्ज़ापुर की नकली बंदूकों वाले किस्से मिलाइए, गद्दी कौन संभालेगा की बहस स्वादानुसार डालिए। ऊपर से गैंग्स ऑफ वासेपुर भी छिड़क दीजिए। विश्वगुरु भारत का डिफेंस मास्टरप्लान थोड़ी देर में पककर दर्शकों को परोसने के लिए तैयार है।

इस फिल्म ने हाल में सोशल मीडिया पर इतना शोर मचाया है कि लगा इसे नहीं देखना देशद्रोह में न शामिल मान लिया जाए। लेकिन अगर आपने अब तक इसे नहीं देखा है तो बेहतर है किसी और बेहतर फिल्म का इंतज़ार कर लें। कांधार विमान अपहरण से शुरू होते हुए फिल्म इतनी लंबी और उबाऊ होती जाएगी कि आप विमान में बैठकर दिल्ली से कोलंबो पहुंच सकते हैं।

फिर भी अगर आपको फिल्म देखनी ही है तो ये बता देना ज़रूरी है कि आप नाश्ते से लंच तक का इंतज़ाम अपने साथ रखें और बच्चों को पड़ोसी के यहां रखकर जाएं। इतना खून बुरी तरह बहाया जाएगा कि कमज़ोर दिलवाले जेन ज़ी के लड़के भी आँखें बंद कर के कई दृश्य देख पाएंगे।

अगर आप अब भी कहानी जानने की इच्छा रखते हैं तो देश के लिए वो भी बता देना ज़रूरी है। कहानी में भारत की सुरक्षा एजेंसी का एक ख़ास मिशन धुरंधर है जो एक ऐसा NIA चीफ तैयार करता है जो सरकारें और दशक बदलने के बावजूद चीफ बना रहता है।

चूंकि भारत की सुरक्षा का सवाल है तो बिना पाकिस्तान और मुसलमान की फ़ज़ीहत किए बिना बन ही नहीं सकता। तो अब चलिए पाकिस्तान और कराची का टूरिस्ट पैकेज लीजिए। वहां के लोकल गुंडे कब बड़े आतंकवादी बन जाएं, पता नहीं, लेकिन लगभग हर गुंडा सड़कछाप गालियां बकता है, होमोसेक्सुअल भी है।

"हिंदू बहुत डरपोक कौम है।" "हिंदुस्तानियों के सबसे बड़े दुश्मन हिंदुस्तानी हैं, पाकिस्तान दूसरे नंबर पर आता है" इस तरह के डायलॉग बोलकर फिल्म के पात्र आपके भीतर आक्रोश का प्रतिशत बढ़ाने की पूरी कोशिश करेंगे मगर आपने घबराना नहीं है।

फिल्म में कुछ रोमांस भी है। तो रणबीर सिंह जो एक गुंडे का सबसे छोटा प्यादा है, उसको सीधा विधायक की बेटी से प्यार हो जाता है। फिर वो बाइक पर घूमेंगे, लड़की इंप्रेस हो जाएगी। पेट्रोल झूठमूठ का ख़त्म हो जाएगा। दोनों पैदल घर तक आयेंगे। लड़की और इंप्रेस हो जाएगी। पाकिस्तान की सड़कें इतनी अच्छी और पुलिस इतनी ख़ाली है कि सब इन दोनों आशिकों को शहर भर में दौड़ाएंगी, पकड़ नहीं पाएंगी।

फिर कहानी में संजय दत्त को भी आना है। अक्षय खन्ना की इतनी तारीफ मैंने पिछले बीस साल में नहीं सुनी, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं है जो "दिल चाहता है" से बेहतर हो। इतने बड़े गुंडे (आतंकवादी) और इतने लोकल टाइप मारपीट के सीक्वेंस है कि लगेगा वो भारत के खिलाफ नहीं दो पीस चिकन के लिए लड़ रहे हैं।

इसके बाद फिल्म मे कुछ बचता है तो वो अच्छा भी है। संसद पर हमला, मुंबई में ताज हमला और इन सबके पीछे के कनेक्शन समझाने की कोशिश पहली बार किसी फिल्म में एक साथ दिखी है।

एक पुराने और अनुभवी दर्शक की तरह कहूं तो इसे वेबसीरीज़ ही बनाने की योजना रही होगी जो अचानक से फिल्म बना दी गई, इसीलिए ज़्यादा बोरियत हुई वरना फिल्म के सभी मसाले मौजूद हैं। फिल्म एक बार शुरू होगी तो ख़त्म ही नहीं होगी। और जब ख़त्म होगी तो कहानी किसी वेबसीरीज़ की तरह अगले भाग का ऐलान भी करेगी।

निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

चार दिसंबर की चिट्ठी

जनवरी को नहीं होना था ऐसा

कि ठंड में एम्स की पर्ची कटानी पड़े

कोहरा सिर्फ शहर में ही नहीं

जीवन में प्रवेश कर जाए।


फरवरी में डॉक्टर बताए कि

नहीं बची है उम्मीद साल पूरा कर पाने की

बसन्त की आहट से लगे डर

और मार्च की एक दोपहर


हम तय कर रहे हों कि

कीमो के लिए सरकारी बेहतर या प्राइवेट

अप्रैल में जब शुरू हो इलाज

क़र्ज़ या मदद तो छोड़िए

मिलने जुलने से भी कतराने लगे परिवार समाज

दवाई की कड़वाहट और हर तरफ़ अवसाद


मई में भी नहीं किसी अच्छे दिन की याद

जून में सिर्फ शरीर रह गया सूख कर

आत्मा इलाज में निचोड़ दी गई


जुलाई अगस्त तक याद हो गई दिनचर्या

पहले कीमो चढ़ेगा

फिर बारिश आयेगी

फिर बुखार आयेगा

फिर सांत्वना के लिए लोग

फिर कड़वी दवाएं

और यही अंतहीन चक्र चलता रहेगा


सितंबर तक सीख चुकी बेटी

बिना खाए हंसना

और बिना रोए जीना


अक्टूबर में छूट गई नवंबर की तैयारी

वेटिंग की टिकट और गांव लौटने की मारामारी

अब तो यह भी याद नहीं

कि आखिरी बार किस नवंबर माथा टेका था

खरना में हमने एक साथ।

कब लड़े थे कि कितने बजे ठेकुआ प्रसाद बनना शुरू होगा


हमारे दिसंबर में एक दिन मुस्कुराता था

तब भी और अब भी

यह उसी तारीख का एक ख़त है तुम्हारे नाम


ये अभिशप्त चिट्ठी ख़ुद ही लिखनी है

और ख़ुद ही पढ़नी है सैंकड़ों बार


काश इस चिट्ठी को उम्मीद के साथ ख़त्म किया जा सकता था -

विशेष मिलने पर।



निखिल आनंद गिरि

ये पोस्ट कुछ ख़ास है

प्रश्न

क्या इस पृथ्वी पर एक भी ऐसा देश नहीं जहां सब घड़ियों में अच्छा समय हो क्या नहीं कोई ऐसी नदी जहां मछलियां एक दूसरे का भोजन नहीं बनतीं क्या मे...