बुधवार, 1 जुलाई 2015

सीढ़ियां

सीढियां कहीं नहीं जाती
कोई कंपन,  कोई धड़कन
नहीं उनकी शिराओं में
वो चुपचाप सुनती हैं
धम्म से चढ़ते हैं पैर उनकी छाती पर
और चले जाते हैं रास्ता बनाते।
सीढियां रास्ता नहीं हैं
इसीलिए टूटने लगी हैं।
जो सीढ़ियों की छाती पर चढ़ते हैं
उनसे सविनय निवेदन है
सीढ़ियों को कुछ रोज़ के लिए अकेला छोड़ दें।
उन्हें टूटने का डर नहीं
दुख है फिर से जोड़े जाने का

जोड़ा जाना सहानुभूति नहीं है

स्वार्थ है छातियां रौंदने का।
निखिल आनंद गिरि

ये पोस्ट कुछ ख़ास है

रेडियो पर लाइव कमेंट्री के दौरान क्या करें और क्या नहीं

पटना सिख धर्म के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की धरती है। उनकी जयंती पर तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में कई वर्षों से भव्य प्रकाश पर्व आयोज...