शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

छोटे आदमी के लिए कविताएं

1) जल्दी लौट आऊंगा

यह कहकर रोज़ निकलता हूं

देर से लौटता हूं रोज़।


ट्रैफिक के नियम एक बच्चे के लिए नहीं बदले जा सकते

नहीं बदली जा सकती बच्चे की महत्वाकांक्षा भी

मैं कैसे बदलूं एक शाम का अपराधबोध में

अनायास बदल जाना।


2) उसके सपनों में शेर दलिया खाते हैं

वो चिड़ियों से घंटों बातें करता है 

उसे लगता है उसके पिता ने जंगल में शार्क छोड़ रखे हैं

ताकि शहर में बच्चे स्कूल जा सकें।

वो गांव और शहर में फर्क नहीं कर सकता

जैसे मां उसके लिए पिता है और 

पिता उसके लिए घोड़ा।


3) ऐसी निर्दोष आँखें है उस बच्चे की

कि वो घंटों निहार सकता है मजदूर को मसाला मिलाते

उसे छेनी हथौड़ी पेचकस लगते हैं दिलकश

उसे बुलडोजर देखकर लगता है

नींद से थोड़ी देर पहले

देवता अपनी लीला करते हैं


4) विद्या क्या है?

यह पूछने पर उसने बताया डांस करना

फिर कहा सोचकर गूगल

इसके बाद मुझे पूछने की इच्छा नहीं हुई

विद्या की देवी कौन है?


5) घर इसलिए घर है

कि घर के भीतर जो सबसे छोटा है

उसकी सबसे अधिक कद्र है

भर निकलकर देखिए

छोटे आदमी के लिए

दुनिया कितनी मुश्किल है।


6) उसे लगता ही नहीं वो छोटा है

मेरे खड़ा होने पर वो मेरी जेब जितना बड़ा है

बैठ जाने पर छाती जितना

थोड़ा और बड़ा कैसे होगे?

वो कहता है

मशीन में डालकर बड़ा हो जाऊंगा जल्दी।


निखिल आनंद गिरि

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छोटे आदमी के लिए कविताएं

1) जल्दी लौट आऊंगा यह कहकर रोज़ निकलता हूं देर से लौटता हूं रोज़। ट्रैफिक के नियम एक बच्चे के लिए नहीं बदले जा सकते नहीं बदली जा सकती बच्चे ...