शनिवार, 4 जून 2011

तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगता है...

दो साल पहले लिखी गई एक नज़्म शेयर करने का मन कर रहा है...

तुम कैसे हो?


दिल्ली में ठंड कैसी है?

....?

ये सवाल तुम डेली रूटीन की तरह करती हो,

मेरा मन होता है कह दूं-

कोई अखबार पढ लो..

शहर का मौसम वहां छपता है

और राशिफल भी....



मुझे तुम पर हंसी आती है,

खुद पर भी..

पहले किस पर हंसू,

मैं रोज़ ये पूछना चाहता हूं

मगर तुम्हारी बातें सुनकर जीभ फिसल जाती है,

इतनी चिकनाई क्यूं है तुम्हारी बातों में...

रिश्तों पर परत जमने लगी है..

अब मुझे ये रिश्ता निगला नहीं जाता...

मुझे उबकाई आ रही है...

मेरा माथा सहला दो ना,

शायद आराम हो जाये...



कुछ भी हो,

मैं इस रिश्ते को प्रेम नहीं कह सकता...

अब नहीं लिखी जातीं बेतुकी मगर सच्ची कविताएं...

तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगने लगा है,

या किसी पेपरवेट-सा....

भरम में जीना अलग मज़ा है...



मेरे कागज़ों से शब्द उड़ न जाएं,

चाहता हूं कि दबी रहें पेपरवेट से कविताएं....

उफ्फ! तुम्हारे बोझ से शब्दों की रीढ़ टेढी होने लगी है....



मैं शब्दों की कलाई छूकर देखता हूं,

कागज़ के माथे को टटोलता हूं,

तपिश बढ-सी गयी लगती है...

तुम्हारी यादों की ठंडी पट्टी

कई बार कागज़ को देनी पड़ी है....



अब जाके लगता है इक नज़्म आखिर,

कच्ची-सी करवट बदलने लगी है...

नींद में डूबी नज्म बहुत भोली लगती है....

जी करता है नींद से नज़्म कभी ना जागे,

होश भरी नज़्मों के मतलब,

अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

 
निखिल आनंद गिरि

10 टिप्‍पणियां:

Sonal Rastogi ने कहा…

bahut khoob

वन्दना ने कहा…

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मन की सच्चाई को कहती नज़्म ...

सागर ने कहा…

मैं शब्दों की कलाई छूकर देखता हूं,

कागज़ के माथे को टटोलता हूं,

तपिश बढ-सी गयी लगती है...

तुम्हारी यादों की ठंडी पट्टी

कई बार कागज़ को देनी पड़ी है....



अब जाके लगता है इक नज़्म आखिर,

कच्ची-सी करवट बदलने लगी है...

नींद में डूबी नज्म बहुत भोली लगती है....

जी करता है नींद से नज़्म कभी ना जागे,

होश भरी नज़्मों के मतलब,

अक्सर ग़लत गढे जाते हैं.



...कसम से, आपको पढ़ते हुए हमको हमारी जवानी याद आ जाती है.

निवेदिता ने कहा…

खूबसूरत पंक्तियाँ........

anupama's sukrity ! ने कहा…

होश भरी नज़्मों के मतलब,

अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

bahut sunder abhivyakti ..!!

prerna argal ने कहा…

yathart batati hui saarthak rachanaa.badhaai.



please visit my blog.thanks.

मनोज कुमार ने कहा…

भाई, तुम अलग हट के सोचते हो और लिखते भी वही हो जो सोचते हो ... अलग हटके।

Prem Chand Sahajwala ने कहा…

ऐ निखिल रिश्तों के मामले में तुम इतना अकड़ते क्यों हो! एक गुरूर सा तुम्हारे सर पर सवार रहता है और हर रिश्ते को नकारने की एक व्यर्थ सी प्रवृत्ति! अपनी दृष्टि और कोण दोनों को ठीक करो, यानी दृष्टिकोण सुधारों.

himani ने कहा…

कविता बेहद खूबसूरत है ग्लोब की तरह
प्रेम जी की सलाह पर भी गौर कीजियेगा