शुक्रवार, 18 मार्च 2011

कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की...

अवध की होली पर आधे घंटे का प्रोग्राम बनाना था। इसी फेर में नज़ीर अकबराबादी की होली पर लिखी नज़्म से दोबारा मुलाकात हुई। पहली बार आकाशवाणी के लिए होली विशेष बनाना था तो ज़रूरत पड़ी थी। आगरा के थे नज़ीर अकबराबादी (आगरा को पहले अकबराबाद कहते थे), जिन्होंने कई मुद्दों पर आम ज़ुबां में लिखा। अवध जब श्रीराम की अयोध्या थी, होली तब से मनती रही है। फिर राम के रंग में नवाबों का दौर मिला तो होली त्योहार न होकर तहज़ीब बन गई। अवध दुनिया भर को संदेश देता है कि होली सिर्फ हुड़दंग नहीं, प्यार करने का तरीका है। मर्यादा पुरुषोत्तम की मिट्टी में इस त्योहार की मर्यादा आज कितनी है, कहना मुश्किल है मगर इस नज़्म में अवध की होली खूब सलीके से छलकती है। आप भी पढिए...छाया गांगुली की आवाज़ में इसे यू-ट्यूब पर सुना भी जा सकता है।

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।

परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।

ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।

महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।


हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे

कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे

दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे

कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे

कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की


गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।

कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।

मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।

उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।

सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।


और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,

हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,

कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,

कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,

कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।


ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो

उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो

माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो

लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो

जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।

नज़ीर अकबराबादी

होली की शुभकामनाओं सहित... 

2 टिप्‍पणियां:

दीपक बाबा ने कहा…

भूल जा झूठी दुनियादारी के रंग....
होली की रंगीन मस्ती, दारू, भंग के संग...
ऐसी बरसे की वो 'बाबा' भी रह जाए दंग..


होली की शुभकामनाएं.

Minakshi Pant ने कहा…

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
happy holi dost ji