बुधवार, 5 जनवरी 2011

ठूंठ पीढ़ियां, बेबस माली...

जिन पेड़ों ने फल नहीं दिए,

उन्हें भी सींचा गया था सलीके से

भरपूर खाद-पानी और देखभाल के साथ..

हवा भी उतनी ही मिली थी उन्हें,

जितनी बाक़ी पेड़ों के नसीब में थी....

उम्मीद के लंबे अंतराल ने दिया

माली को ठूँठ पेड़ों का दुख..


ये दुख नहीं बना चर्चा का विषय

बुद्धू बक्से के बुद्धिजीवियों के बीच

या किसी भी अखबार के पन्ने पर,


पीढ़ी दर पीढ़ी उगते रहे ठूंठ

और घेरते रहे जगह,

फलदार पेड़ों के बरक्स....


फलदार पेड़ों को क्या था..

झूमकर लहराते रहे अपनी किस्मत पर....

ठूंठ पेड़ों से बिना उलझे,

मुंह घुमाकर समझते रहे,

कि हर ओर हरी है दुनिया....


उधर मालियों ने फिर भी सींचा,

नए बीजों को, नई उम्मीद से...

जब तक नीरस नहीं हुई पूरी पीढ़ी...


फिर बेबस मालियों ने सोचा उपाय

ठूंठ पेड़ों से कुछ काम निकाला जाये..

गर्दन में फंसाकर फंदे,

वो झूल गए इन्हीं पेड़ों पर...

और थोड़े-से फलदार पेड़ देखते रहे

अपनी तयशुदा मौत का पहला भाग...


काश! फलदार पेड़ों ने किया होता प्रतिरोध

ज़रा-सा भी,

तो ठूंठ पेड़ों में फल तो नहीं आते,

मगर वो समय रहते शर्म से

टूटकर गिर ज़रूर जाते,


ज़िंदा रहते माली

ताकि,

फलदार पेड़ों की भी हरी रहती डाली....


निखिल आनंद गिरि

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13 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

कविता के माध्यम से बडी गहरी बात कह दी।

sada ने कहा…

गहन भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

itni saandaar rachna ke liye sirf do comment:(

sir....bura mat manana lekin likhne ke alawa blogging me ab padhwana bhi bahut badi baat ho gyee hai:)

काश! फलदार पेड़ों ने किया होता प्रतिरोध

ज़रा-सा भी,

तो ठूंठ पेड़ों में फल तो नहीं आते,

मगर वो समय रहते शर्म से

टूटकर गिर ज़रूर जाते,


ज़िंदा रहते माली

ताकि,

फलदार पेड़ों की भी हरी रहती डाली....

bahut khub!! ab follow kar raha hoon, barabar aaunga...

मनोज कुमार ने कहा…

बेमिसाल!
हृदयस्पर्शी रचना।

दीपक बाबा ने कहा…

सारगर्भित कविता..........

बढिया लेखन.

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

मुकेश जी,
ब्लॉग पर आने और फॉलो करने का शुक्रिया...ये पढ़वाने वाला काम हमसे होता नहीं है...अगर आपके पास कोई तरकीब हो तो बताएं...बाक़ी दुकान तो चल ही रही है अपनी....आप ज़रूर आते रहें....

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

मुकेश जी,
ब्लॉग पर आने और फॉलो करने का शुक्रिया...ये पढ़वाने वाला काम हमसे होता नहीं है...अगर आपके पास कोई तरकीब हो तो बताएं...बाक़ी दुकान तो चल ही रही है अपनी....आप ज़रूर आते रहें....

pooja ने कहा…

kisanon kee haalat par achchhi bhavabhivyakti hai nikhil ji. kaash kisaanon evam pedhon ke saath saath aur log bhi samjhen is dard ko.

विश्व दीपक ने कहा…

निखिल भाई,
फलदार पेड़ों और ठूंठों का बिम्ब देकर आपने पूरे समाज की मनोस्थिति पर बड़ी हीं जोरदार टिप्पणी की है.. काश "आसमान" में रहने वाले प्राणी समझ लेते कि उनकी ज़िंदगी इन्हीं "ज़मीन" वालों के कारण है तो आज शायद ऐसी स्थिति नहीं होती।

बेहद उम्दा कविता!

बधाई स्वीकारें!
-विश्व दीपक

विश्व दीपक ने कहा…

जितनी बार पढ रहा हूँ, उतनी बार यह कविता मुझे कुछ और हीं मायने दे जा रही है।

कभी इसमें मुझे "गरीब" और "अमीर" का अंतर दिख रहा है तो क्भी "ईमानदार" और "बेईमानों" का...

संभव है कि आपने कुछ और हीं सोच कर यह कविता लिखी हो, लेकिन मैं हर अर्थ में इससे जुड़ने में सफल हुआ हूँ... यही एक कवि की सफलता है।

फिर से बधाई स्वीकारें!
-विश्व दीपक

रूप ने कहा…

केवल एक शब्द... वाह.

ravi_journalist@yahoo.com ने कहा…

शब्दों की जादूगरी, लेकिन अर्थ की पवित्रता और उससे भी कहीं ज्यादा....गंभीर संदेश...इससे ज्यादा शब्द सूझ नहीं रहें....

manish kumar ने कहा…

imandari se kahun to aapko likhne ke alawa koi aur kam karna chahiye. Bakwas likhna logon ka samay nasht karna hai aur apna bhi samay nasht karana hai. Guzaarish hai aapse, aur han! Ghazalen achchhi bana leten hain.