रविवार, 28 नवंबर 2010

एक उदास कविता...जैसे तुम

गांव सिर्फ खेत-खलिहान या भोलापन नहीं हैं,

गांव में एक उम्मीद भी है,

गांव में है शहर का रास्ता

और गांव में मां भी है...


शहर सिर्फ खो जाने के लिए नहीं है..

धुएं में, भीड़ में...

अपनी-अपनी खोह में...

शहर सब कुछ पा लेना है..

नौकरी, सपने, आज़ादी..


नौकरी सिर्फ वफादारी नहीं,

झूठ भी है, साज़िश भी...

उजले कागज़ पर सफेद झूठ...

और जी भरकर देह हो जाना भी..


देह बस देह नहीं है...

उम्र की मजबूरी है कहीं,

कहीं कोड़े बरसाने की लत है...

सच कहूं तो एक ज़रूरत है..


और सच, हा हा हा..

सच एक चुटकुला है....

भद्दा-सा, जो नहीं किया जाता

हर किसी से साझा...

बिल्कुल मौत की तरह,

उदास कविता की तरह....


और कविता...

...................

सिर्फ शब्दों की तह लगाना

नहीं है कविता,..

वाक्यों के बीच

छोड़ देना बहुत कुछ

होती है कविता...

जैसे तुम...

निखिल आनंद गिरि
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6 टिप्‍पणियां:

Saiam ने कहा…

great work bhai...

Keep it up...

saanjh ने कहा…

ek se doosre aur doorse se teesre khayaal tak....kamaal ka transition hai....one of its kind hai ye nazm, bohot alag....bohot khoobsurat.....

वन्दना ने कहा…

वाक्यों के बीच

छोड़ देना बहुत कुछ

होती है कविता...

जैसे तुम...

गज़ब कर दिया…………शब्दो की जादूगरी से चमत्कृत हूँ…………बेहतरीन अभिव्यक्ति।

अनुपमा पाठक ने कहा…

वाक्यों के बीच
छोड़ देना बहुत कुछ
होती है कविता...
सच है , कविताओं में पूर्णविराम और अल्पविराम भी बोलते हैं...!!

AKHILENDRA ने कहा…

गांव सिर्फ खेत-खलिहान या भोलापन नहीं हैं,

गांव में एक उम्मीद भी है,

गांव में है शहर का रास्ता

और गांव में मां भी है...


वाकई मज़ा आ गया पढ़ कर...

डॉ .अनुराग ने कहा…

शानदार है दोस्त ........शानदार