बुधवार, 9 नवंबर 2011

वो उजालों के शहर, तुम को ही मुबारक हों...

सहरा-ए-शहर में खुशबू की तरह लगते थे...
किस्से माज़ी के वो जुगनू की तरह लगते थे

हमने उस दौरे-जुनूं में कभी उल्फत की थी ,
जब कि ज़ंजीर भी घुँघरू की तरह लगते थे.

हर तरफ लाशें थी ताहद्दे-नज़र फैली हुईं
ज़िंदा-से लोग तो जादू की तरह लगते थे

ऊंगलियां काट लीं उन सबने ज़मीं की ख़ातिर
बाप को बेटे जो बाज़ू की तरह लगते थे...

मुझ को खामोश बसर करना था बेहतर शायद
हंसते लब भी मेरे आंसू की तरह लगते थे...

वो उजालों के शहर, तुम को ही मुबारक हों,
रात में सब के सब उल्लू की तरह लगते थे

दिन ब दिन रहनुमा गढते थे रिसाले अक्सर
चेहरे सब कलजुगी, साधू की तरह लगते थे
 
आज बन बैठे अदू कैसे मोहब्बत के 'निखिल'
वो भी थे दिन कि वो मजनू की तरह लगते थे
माज़ी - बीता हुआ कल
अदू - दुश्मन
 
निखिल आनंद गिरि

12 टिप्‍पणियां:

Sonal Rastogi ने कहा…

bahut khoob

विश्व दीपक ने कहा…

गिरि जी, जबरदस्त ग़ज़ल है.. दिल खुश हो गया... हम ऐसे हीं आपको गुरू नहीं कहते...

वैसे भी "गिरि" और "गुरू" में कुछ हीं मात्राओं का फ़र्क है :)

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर!

Tulika vividh rang ने कहा…

मुझ को खामोश बसर करना था बेहतर शायद
हंसते लब भी मेरे आंसू की तरह लगते थे....वाह भैया ...उम्दा :)

मनोज कुमार ने कहा…

लाजवाब!!

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhaut hi sundar umda gazal....

दीपक बाबा ने कहा…

@वो उजालों के शहर, तुम को ही मुबारक हों,
रात में सब के सब उल्लू की तरह लगते थे


लाजवाब कर दिया जी.

बेनामी ने कहा…

wah nikhil bhai kya bat hai .bahut khub kahi hai janab aapne !!!

Pankaj gupta

kanu..... ने कहा…

bahut khoob.sundar

बेनामी ने कहा…

Bahut khoob Nikhil

Sikandar Hayat Khan
Jamshedpur

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

मज़ा आ गया निखिल बाबू!!

Prem Chand Sahajwala ने कहा…

निखिल शायद इस गज़ल का एक एक मिस्र हम बहुत पहले डिस्कस कर चुके हैं. एक से एक बढ़ कर शेर हैं हालांकि मैंने शायद यह भी कहा था कि कुछ मिसरों में बह्र की गडबड है. इस के शीर्षक में ही देख लो. बहरहाल एक बार फिर कि बह्र से ख़ारिज मिसरे ठीक कर लो, तब यह A क्लास गज़ल होगी.