सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

रोटियों के नक्शे बिगड़ जाते होंगे

न चाहते हुए भी,
जब से मासूम पीठों पर,
किताबों का गट्ठर लदा होगा.....
मासूम चेहरों ने बना ली होगी,
बस्ते में अलबम रखने की जगह....

कई बार कच्चे रास्तों पर,
ढेला खाती होगी
आम की फुनगी,
और गिरते टिकोले बढ़ाते होंगे,
प्यार का वज़न...

बिना किसी वजह के,
जब डांट खाते होंगे
बड़े होते बेटे,
प्यार का अहसास,
पहली बार देता होगा थपकी.....

जब नहीं हुआ करते थे मोबाईल,
नहीं पढे जाते थे झटपट संदेश,
आंखें तब भी पढ़ लेती होंगी,
कि किससे होना है दो-चार...
और हो जाता होगा मौन प्यार

ये भी संभव है कि,
अनपढ़ मांएं या बेबस बहनें,
अक्सर याद करती होंगी चेहरा,
तो रोटियों के नक्शे बिगड़ जाते होंगे...

या फिर दाढ़ी बनाते पिता ही,
पानी या तौलिया मांगते वक्त,
अनजाने में पुकारते होंगे कोई ऐसा नाम,
जो शुरु नहीं होता,
मां के पहले अक्षर से....

एक सहज प्रक्रिया के लिए रची गयी रोज़ नयी तरकीबें,
प्यार ने पैदा किये हैं कितने वैज्ञानिक...

ये सरासर ग़लत है कि,
कवि,शायर या चित्रकार ही,
प्यार की बेहतर समझ रखते हैं.....

दरअसल,
जिसके पास मीठी उपमाएं नहीं होतीं
वो भी कर रहा होता है प्यार,
चुपके-चपके....

निखिल आनंद गिरि

10 टिप्‍पणियां:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

जीवन में प्रेम कितना सहज और सरल है.. कितना व्याप्त है.. बिना इजहार और इकरार के... किन किन आयामों में.. उसे आपकी कविता से समझा जा सकता है... खास तौर पर आज के 'लव यू ' संस्कृति के सापेक्ष आपने अनाभिव्यक्त प्रेम को खड़ा किया है.. सुन्दर कविता.. आज सो काल्ड प्रेम दिवस पर इस से सुन्दर कविता शायद ही पढ़ पाऊं...

saanjh ने कहा…

a perfect treat for this day...!

bohot bohot khoobsurat nazm...as usual....saari baatein bohot kamaal ki...toooo good !

Saiam ने कहा…

Loved the Simplicity....;)

Keep writing will wait for ur new write up..
Good Luck...;)

प्रबुद्ध ने कहा…

यार निखिल, कमाल लिखा है। आज शायद पहली बार आया यहां...नाइट शिफ़्ट में वेलेंटाइन से जुड़े तमाम पैकेजेस के पकाऊ वीओ सुनने के बाद एक बेहतरीन नज़्म पढ़कर दिल खुश हो गया। जज़्बातों का समंदर बह निकला...बधाई ! कभी मेरी गली भी आओ..

सागर ने कहा…

ये भी संभव है कि,
अनपढ़ मांएं या बेबस बहनें,
अक्सर याद करती होंगी चेहरा,
तो रोटियों के नक्शे बिगड़ जाते होंगे...

या फिर दाढ़ी बनाते पिता ही,
पानी या तौलिया मांगते वक्त,
अनजाने में पुकारते होंगे कोई ऐसा नाम,
जो शुरु नहीं होता,
मां के पहले अक्षर से....


ये सरासर ग़लत है कि,
कवि,शायर या चित्रकार ही,
प्यार की बेहतर समझ रखते हैं.....

दरअसल,
जिसके पास मीठी उपमाएं नहीं होतीं
वो भी कर रहा होता है प्यार,
चुपके-चपके....

Love U Man. Love u

वन्दना ने कहा…

सच कहा प्यार शब्दो का मोहताज़ नही होता…………एक बेहतरीन प्रस्तुति।

डॉ .अनुराग ने कहा…

शानदार.................बेमिसाल !!!!!!

esp this one.....

दरअसल,
जिसके पास मीठी उपमाएं नहीं होतीं
वो भी कर रहा होता है प्यार,
चुपके-चपके....

Priya ने कहा…

वाह! क्या ओब्सेर्वेशन है ......
अक्सर याद करती होंगी चेहरा,
तो रोटियों के नक्शे बिगड़ जाते होंगे...

अनजाने में पुकारते होंगे कोई ऐसा नाम,
जो शुरु नहीं होता,
मां के पहले अक्षर से....

ये सरासर ग़लत है कि,
कवि,शायर या चित्रकार ही,
प्यार की बेहतर समझ रखते हैं.....

जों कोई पर्यायवाची होता हमारे पास तो ठोक देते यहाँ ..... खुश होकर जा रहें है .....इतना तो काफी होगा ना

richa ने कहा…

कितनी सादगी से बिना किसी भारी भरकम शब्द का प्रयोग किये कितनी ख़ूबसूरती से सब कह दिया निखिल जी... वाह !! ...
किस किस लाइन की तारीफ़ करूँ... पूरी नज़्म ही कोट करने लायक है... दिल ख़ुश हो गया पढ़ कर... :)

ये सरासर ग़लत है कि,
कवि,शायर या चित्रकार ही,
प्यार की बेहतर समझ रखते हैं.....

दरअसल,
जिसके पास मीठी उपमाएं नहीं होतीं
वो भी कर रहा होता है प्यार,
चुपके-चपके....


उफ़... उफ़... उफ़... !!!

विवेक वशिष्ठ ने कहा…

छा गए यार छा गए...