सोमवार, 22 नवंबर 2010

तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगता है...

तुम कैसे हो?
दिल्ली में ठंड कैसी है?
....?

ये सवाल तुम डेली रूटीन की तरह करती हो,
मेरा मन होता है कह दूं-
कोई अखबार पढ लो..
शहर का मौसम वहां छपता है
और राशिफल भी....

मुझे तुम पर हंसी आती है,
खुद पर भी..
पहले किस पर हंसू,
मैं रोज़ ये पूछना चाहता हूं
मगर तुम्हारी बातें सुनकर जीभ फिसल जाती है,
इतनी चिकनाई क्यूं है तुम्हारी बातों में...
रिश्तों पर परत जमने लगी है..

अब मुझे ये रिश्ता निगला नहीं जाता...
मुझे उबकाई आ रही है...
मेरा माथा सहला दो ना,
शायद आराम हो जाये...
कुछ भी हो,
मैं इस रिश्ते को प्रेम नहीं कह सकता...

अब नहीं लिखी जातीं
बेतुकी मगर सच्ची कविताएं...
तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगने लगा है,
या किसी पेपरवेट-सा....
मेरे कागज़ों से शब्द उड़ न जाएं,
चाहता हूं कि दबी रहें पेपरवेट से कविताएं....

उफ्फ! तुम्हारे बोझ से शब्दों की रीढ़ टेढी होने लगी है....
मैं शब्दों की कलाई छूकर देखता हूं,
कागज़ के माथे को टटोलता हूं,
तपिश बढ-सी गयी लगती है...

तुम्हारी यादों की ठंडी पट्टी
कई बार कागज़ को देनी पड़ी है....
अब जाके लगता है इक नज़्म आखिर,
कच्ची-सी करवट बदलने लगी है...
नींद में डूबी नज्म बहुत भोली लगती है....

जी करता है नींद से नज़्म कभी ना जागे,
होश भरी नज़्मों के मतलब,
अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

निखिल आनंद गिरि...
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10 टिप्‍पणियां:

saanjh ने कहा…

beautiful....simply beautiful !

yaadon ki thandi patti, shabdon ki reedh.....sabhi kuch, ek ek metaphor, poori painting, kamaal ki hai, bohot hi khoobsurat nazm dost...awesome :)

विश्व दीपक ने कहा…

पूरी कविता हीं काबिल-ए-तारीफ़ है.. इसलिए एक शब्द या पंक्ति को चुनकर बाकी हर्फ़ों और लफ़्ज़ों के साथ नाइंसाफ़ी नहीं करूँगा। कविता ईमानदार है, आपकी सोच सटीक है और भाव अर्थपूर्ण हैं.. इससे ज्यादा किसी कविता में किस चीज की जरूरत होती है!!

आपकी यह पंक्ति न जाने कितने समझदारों की समझ का कच्चा-चिट्ठा खोलती है:

होश भरी नज़्मों के मतलब,
अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

बधाई स्वीकारें!
-विश्व दीपक

वन्दना ने कहा…

होश भरी नज़्मों के मतलब,
अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....
इसिलिये तो होश मे ना आना ही बेहतर है…………बेहद गहन अभिव्यक्ति।

दिपाली "आब" ने कहा…

maine is pr pehle teen baar comment kr chuki hun
Abki ba ye hi kahungi
Its my fav frm ur collection.

N yes
Hw cn i forget to mention
''yeh hain tewar asli nikhil ji ke'' :p
Hehehheehehe

gurvinder ने कहा…

DILKASH

बेनामी ने कहा…

Loved the poem.....no words to describe the beauty of it

डॉ .अनुराग ने कहा…

होश भरी नज़्मों के मतलब,
अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

शानदार .....दोस्त कुछ कुछ गुलज़ार साहब का असर है ......

AKHILENDRA ने कहा…

very beautiful....
par jiske liye hai agar wo pad li to aapki khair nahi.....

neelam ने कहा…

नींद में डूबी नज्म बहुत भोली लगती है....

जी करता है नींद से नज़्म कभी ना जागे,
होश भरी नज़्मों के मतलब,
अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

ये पंक्तियाँ दिल को छू गयी हैं .

निखिल तुम्हारा ग्लोब तो सफ़ेद या काला होना चाहिए ,क्यूंकि ग्लोब में बहुत कुछ होता है डूब जाने के लिए ,नदिया ,पर्वत ,शहर ,गाँव रेगिस्तान ,जंगल और पत्थर न जाने क्या क्या ...........

rakesh tiwari ने कहा…

निखिल बस इतना ही कहूंगा...

नज़्म उलझी हुई है सीने में..
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ती-फिरती तितलियों की तरह
शब्द हैं कि क़ाग़ज़ पर बैठते ही नहीं