मंगलवार, 28 सितंबर 2010

मैं ज़िंदा हूं अभी...

मुझे टटोलिए,
हिलाइए-डुलाइए,
झकझोरिए ज़रा...
लगता है कि मैं ज़िंदा हूं अभी...

चुप्पी मौत नहीं है,
चीख नहीं है जीवन,
मैं अंधेरे में चुप हूं ज़रा,
भूला नहीं हूं उजाला...
ये शहर कुछ भी भूलने नहीं देगा...

नौ घंटे की बेबसी,
दुम हिलाने की....
फिर चेहरा उतारकर
गुज़ारते रहिए घंटे...

फोन पर मिमियाते रहिए प्रेमिका से,
उसे हर वाक्य के खत्म होते खुश होना है...
मां से बतियाने में ओढ लीजिए हंसी,
कितनी भी...
पकड़े जाएंगे दुख...

कुछ चेहरे हैं
जिनसे बरतनी है सावधानी...
कुछ नज़रें हैं..
जिन्हें पलट कर घूरना नहीं है..
दिन एक थके-मांदे आदमी की तरह है..
हांफ रहा है आपके साथ..
रात के आखिरी पहर तक...
बिस्तर पर लेटकर निहारते रहिए दीवारें..
क्या पता शून्य का आविष्कार,
इन्हीं क्षणों में हुआ हो..

26 साल की बेबस  उम्र
नींद की गोली पर टिकी है...
गटक जाइए गोली,
विश्राम लेंगे दुख...
बदलते रहिए केंचुल,
शर्त है जीने की...

निखिल आनंद गिरि

6 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

नौ घंटे की बेबसी,
दुम हिलाने की....
फिर चेहरा उतारकर
गुज़ारते रहिए घंटे...
आज्का आदमी बस बेबसी सी की हालत मे ही तो जी रहा है फिर
ताकते रहिये दिवारें----
शायद शून्य का जन्म यहीं से हुया हो
चिन्तन भी ज़िन्दगी मे निहायत ही जरूरी है मगर हम चिन्तन भी तभी करते हैं जब पास कुछ नही होता। नही तो दुनिया की रंगीनियों फुर्सत ही कब है आदमी को। गहरा चिन्तन हैिस रचना मे। बधाई। बहुत दिन बाद आज आपको पढा है। शुभकामनायें

Deepali Sangwan ने कहा…

nice

AKHILENDRA ने कहा…

मां से बतियाने में ओढ लीजिए हंसी,
कितनी भी...
पकड़े जाएंगे दुख...
ये पंक्ति दिल को छु गई.
मॉ तुम बहुत याद आती हो.......

संजय भास्कर ने कहा…

सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत आभार.

बहुत दिन बाद आज आपको पढा है

अकबर महफ़ूज़ आलम रिज़वी ने कहा…

शानदार और भावपूर्ण होने के साथ ही करारे व्यंग्य की धार वाली कविता।

अकबर महफ़ूज़ आलम रिज़वी ने कहा…

शानदार... भावपूर्ण और व्यंग्य की तीखी धार से सज्जित कविता। साधुवाद