शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

दिल्ली के आंदोलन को वीकएंड चाहिए, सेलेब्रिटी चाहिए...

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे..
23 जुलाई को मेट्रो में सफर के दौरान अपनी सीट के बगल में बैठे एक सज्जन पर अचानक आया मैसेज मैंने चुपके से पढ़ लिया था। किसी 'एल एम अन्नाजी' ग्रुप की तरफ से मैसेज था जिसमें अपील लिखी थी कि '24 को अन्ना दिल्ली आ रहे हैं। मोटरसाइकिल वगैरह कुछ भी हो,  भारी संख्या में दिल्ली एयरपोर्ट आकर उनका सहयोग करें। सज्जन ने चुपचाप मोबाइल बंद कर जेब में रख लिया था। मैसेज डिलीट कर दिया था।

मैं लगभग रोज़ दिल्ली मेट्रो में लंबा सफर करता हूं। अच्छा लगे या बुरा, करना ही पड़ता है। पिछले साल इन दिनों में अच्छा लगा था। सफ़र आसानी से कट जाता था। ठसाठस भीड़ में अचानक 'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना' का एक कोरस सुनाई पड़ता और फिर देशभक्ति के तमाम नारे। सबके चेहरे खिल जाते। फिर कपिल सिब्बल को जमकर गालियां पड़तीं। बूढ़े लोग युवाओं को देश की हालत समझाने लगते। सफर आसानी से कट जाता था।  इस बार मेट्रो तक में भी 'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना' का कोरस ग़ायब है। किसी ने अब तक फोन करके नहीं पूछा कि 'अन्ना के आंदोलन में गए क्या?'

भ्रष्ट और चमचे नेता सेलेब्रिटी की तरह प्रोमोट हुए जा रहे हैं। राष्ट्रपति बन रहे हैं। दिल्ली में ही नया राष्ट्रपति शपथ ले रहा है। अंग्रेज़ी हुकूमत तो हमने देखी नहीं, मगर यहां देख रहे हैं कि एक बूढे आदमी के आगे-पीछे कैसे सैंकड़ों जवान, गाड़ियां, बंदूकों की सलामी, करोड़ों रुपये बर्बाद हुए जाते हैं। दिल्ली में ही उनके मुंह पर काला कपड़ा ढंका जा रहा है। एक ही दिन। न्यूज़ चैनल के मेरे दोस्त कहते हैं  अन्ना ने आंदोलन का ग़लत दिन चुन लिया है। कोई और दिन होता तो ठीकठाक कवरेज मिल जाती। अन्ना को फायदा मिल जाता ! क्या आंदोलन भी दिन देखकर करने पड़ते हैं?

दिल्ली में हो रहा एक आंदोलन वीकएंड (weekend) का इंतज़ार कर रहा है। शायद वीकेंड में भीड़ जुटे, सेलेब्रिटी आएं। अकेले अन्ना, अकेले युवा, अकेले मीडिया कुछ नहीं कर सकता। इस देश में आंदोलन को भी सेलेब्रिटी चाहिए। ओलिंपिक की मशाल को भी सेलेब्रिटी चाहिए। कैमरे फिर कुत्ते की तरह पीछे भागते हैं। इतने अरब लोगों के लिए इतने करोड़ भगवान पहले से ही हैं। हमें लोकपाल नहीं चाहिए, हमें ज़िंदा भगवान चाहिए। यही सच है। भगवान, जो कहीं नहीं है, कभी नहीं था।

(पिछले साल हुए टीम अन्ना के आंदोलन पर मेरे विचार यहां (लोकतंत्र का अगला भाग, अंतराल के बाद) पढ़ सकते हैं...)

निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी क़रीब हैं..


मेरी मां ने आज तक कोई फिल्म पूरी नहीं देखी होगी। सती अनुसुईया, गंगा किनारे मोरा गांव जैसी अमर भोजपुरी फिल्में पूरी देखने के दौरान भी दो-तीन बार झपकी ज़रूर मार ली होगी। आप उसके सामने किसी भी दौर की अच्छी से अच्छी फिल्म लाकर रख दीजिए, फिर कुर्सी पर उसे बिठा दीजिए, फिल्म का ख़ूब बखान कीजिए कि ये सिनेमा के फलां तीसमारखां की फिल्म है वगैरह वगैरह, वो फिल्म देखने के साथ कभी दाएं, कभी बाएं ज़रूर डोलती नज़र आएगी। मां की सिनेमाई नींद के आगे किसी भी सुपरस्टार या महानायक की ऐसी की तैसी न हो जाए तो फिर कहिए। 'हाथी मेरे साथी' और 'स्वर्ग' ही हिंदी फिल्मों के नाम पर उनकी देखी गईं, बार-बार याद की गईं हिंदी फिल्में याद आती हैं। 'हाथी मेरे साथी' देखने और याद रखने का एक कारण अगर फिल्म में हाथी की मौजूदगी को मान लें तो भी 'स्वर्ग' फिल्म में सिर्फ और सिर्फ राजेश खन्ना ही वो किरदार थे, जिन्होंने मेरी मां को भी प्रभावित किया। हां, 'स्वर्ग' में गोविंदा भी मां की पसंद रहे हैं मगर राजेश खन्ना पहली पसंद हैं।

हमने वीसीआर पर घर में पहली बार स्वर्ग फिल्म एक साथ देखी थी। मैं तब स्कूल के शुरुआती सालों में पढ़ता था। मुझे याद है मेरे घर में ये फिल्म कई बार देखी जा चुकी है। वो भी सिर्फ मां की वजह से। मां को न तो वीसीआर चलाना आता है और न ही फिल्में देखने का शौक है। उसे तो ये भी नहीं पता कि कौन किस दौर में कौन सुपरस्टार हुआ है या फिर सुपरस्टार जैसी कोई चीज़ भी होती है। ये राजेश खन्ना का कोई जादू ही था कि मां उनका नाम जानती है, चेहरे से पहचानती है। जैसे बाद में मेरे टीवी या क्रिकेट देखने के शौक की वजह से वो अमिताभ को 'अमितभवा' और सचिन को 'सचिनमा' के नाम से पहचान चुकी है। और कई बड़े लोगों का नाम पूछकर कई बार देख चुका हूं, मगर उन्हें पहचानने में वो आत्मविश्वास नहीं दिखता।

बात 'स्वर्ग' की। तब समस्तीपुर में पापा ने अपनी कमाई से पहली बार ज़मीन ख़रीदी थी और हमारा घर बन रहा था। हम पापा की नौकरी की वजह से बिहार के जिस कोने में भी होते, घर में 'अपने घर' को लेकर कुछ न कुछ बात ज़रूर होती। मां 'अपने घर' को 'स्वर्ग' ही कहकर बुलाती। ये बहुत बाद में समझ आया कि सिनेमा और एक दर्शक का रिश्ता क्या हो सकता है। जिस महिला ने शायद ही कभी सिंगल स्क्रीन थियेटर में (ऊपर लिखी दो-चार फिल्मों को छोड़कर) क़दम रखा हो, शायद ही कभी मॉल या मल्टीप्लेक्स के दर्शन करने की सोच पाए, उसके लिए राजेश खन्ना घर का हिस्सा थे। इसके बाद शायद ही कुछ कहने को बचता है कि राजेश खन्ना क्यों हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहे जाते हैं। वो भी तब, जब राजेश खन्ना के गुज़रने पर 'हाथी मेरे साथी' या 'स्वर्ग' का ज़िक्र एक भी चैनल या वेबसाइट पर उनकी चुनिंदा फिल्मों में देखने को नहीं मिल रहा है। यानी एक सुपरस्टार की कामयाबी इसी में है कि उसकी दूसरे दर्जे की सफल फिल्म भी एक विशुद्ध हाउसवाइफ को उसका ऐसा फैन बना सकती है कि वो ताउम्र अपने घर का नाम उसकी एक फिल्म के नाम पर रखना चाहे।

जैसे मां की पसंद से बहू घर आए तो बेटे को उसका ख़याल रखना ही पड़ता है, ठीक वैसे ही राजेश खन्ना मेरे लिए बेहद ख़ास रहे। हालांकि मेरे लिए पहले सुपरस्टार का मतलब आज भी अमिताभ बच्चन ही हैं, लेकिन राजेश खन्ना को मैं पहला म्यूज़िकल सुपरस्टार ज़रूर मानता हूं। पहला ही क्यों, इकलौते सदाबहार म्यूज़िकल सुपरस्टार थे राजेश खन्ना। राजेश खन्ना को याद करने का मतलब बेशकीमती हिंदी गानों को याद करना है। भारतीय सिनेमा की उस विशेष परंपरा को याद करना है, जिसकी मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। वो शायद दुनिया के पहले ऐसे सुपरस्टार थे, जिन्होंने सिर्फ गानों के दम पर ऐसा स्टारडम हासिल कर लिया था। शायद यही एक कमज़ोरी भी रही कि अमिताभ बच्चन झट से उनकी कुर्सी खींच पाए और किशोर कुमार रातों रात अमिताभ की आवाज़ बन गए।

राजेश खन्ना को याद करते वक्त अचानक अमेरिका का चार्ल्स मैंसन याद आता है। वो अमरीकी अपराध की दुनिया का 'कल्ट गुरु ' रहा। गुनाहों का देवता। उसने अपनी एक मायावी दुनिया बनाई थी जिसे मैंसन फैमिली कहते थे। उसके लिए रोमांस की हद के पार अपराध का वो चरम था, जिसके दम पर उसे लगता था कि जब एक दिन कयामत आएगी और सिर्फ उसी के अनुयायी जीवित बचेंगे। राजेश खन्ना ने रोमांस की दुनिया में वही 'कल्ट' पैदा किया। रोमांस के देवता। एक ऐसा भरम जो उस दौर के भारतीय हालात में हर नागरिक जीना चाहता था। उम्मीदों की आखिरी डोर थामकर ये यक़ीन बचाना चाहता था कि आज़ाद भारत में अब भी वो सुबह आनी बाक़ी है, जहां सब कुछ राजेश खन्ना की तरह पलक झपकते ही रुमानी हो जाना है। कभी-कभी ये भी लगता है कि अगर राजेश खन्ना न होते तो आज भारतीय जनमानस में जिस कदर हर सेलेब्रिटी के आगे-पीछे आंखे मूंद कर डोलने का चलन है, वो बीमारी हमारे समाज से कोसों दूर रहती। ऐसा कहते हुए मोनिका बेदी से लेकर कसाब के वकील तक याद आ रहे हैं।

अपने आखिरी दिनों में किया गया राजेश खन्ना का वो पंखे का विज्ञापन भी याद आ रहा है, जिसमें राजेश खन्ना की एक्टिंग का सबसे बुरा इस्तेमाल ये कहलवाने में हुआ कि मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता। हालांकि, ये बात बिल्कुल सच है कि राजेश खन्ना के फैन्स हमेशा बचे रहेंगे। जब तक धरती पर प्यार बचा है। जब तक भारतीय सिनेमा बचा है। जब तक गीत लिखने वालों और संगीत रचने वालों की कद्र बची है।

निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 16 जुलाई 2012

कई संपादक अब चीयरलीडर होते जा रहे हैं..


राजदीप सरदेसाई
भारतीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी हस्तियों में से एक स्व प्रभाष जोशी की 76वीं सालगिरह पर उन्हें याद करते हुए CNN-IBN के एडिटर-इन-चीफ राजदीप सरदेसाई से हुई हमारी (प्रेम भारद्वाज और मेरी) ये  बातचीत पाखी पत्रिका के प्रभास जोशी विशेषांक में छपी है...चूंकि राजदीप अंग्रेज़ी के पत्रकार हैं, तो इस पूरी बातचीत को लगभग हिंदी में उतारने का काम आपके इस ब्लॉगर साथी निखिल आनंद गिरि ने किया है..आप पढ़कर अपनी राय दे सकते हैं...


हम ये जानना चाहेंगे कि प्रभाष जोशी जिस मूड की पत्रकारिता करते थे, जिस सरोकार की,या मूल्यों की..या फिर जिनसे उनकी टकराहटें थीं..उस तरह की पत्रकारिता में उनके जाने के बाद जो वैक्यूम या शून्यता पैदा हुई है..या क्या हुआ है? वो चीज़ें बढ़ी हैं, घटी हैं...किस रूप में देखते हैं उनकी पत्रकारिता को...
देखिए, मैं..25 साल का था 1990 में और मुझे मेरे अख़बार टाइम्स ऑफ इंडिया ने तब कहा, आडवाणी जी की जो रथयात्रा थी, उसको आप रिपोर्ट कर लीजिए..समय था 1990 का और सोमनाथ से लेकर भोपाल तक मैंने वो रथयात्रा कवर की थी। उस समय पहली बार मैंने प्रभाष जोशी के जो लेख थे, उस समय, वो पढ़े और काफी प्रभावी रहे मेरे लिए। क्योंकि जिस तरह का माहौल बन रहा था, जिस तरह का, एक तरह से एक नई सोच आ रही थी, उस पर या तो ज़्यादातर लोग उस लहर में आकर उसके साथ चल रहे थे या तो हम केवल उसको देखकर रिपोर्ट कर रहे थे। प्रभाष जोशी, उस समय जिस तरह से उन्होंने उस समय पत्रकारिता की, जिस तरह के लेख लिखे, उस लहर से एक तरह विपरीत होकर, उसमें आखिर में बड़ी तस्वीर क्या है..क्या हो रहा है देश में, किस वजह से इतने लोग बाहर आ रहे हैं आडवाणी की रथयात्रा के साथ..और उस रथयात्रा और भारतीयता और राष्ट्रवाद के जो प्रश्न उठ रहे थे, उन पर जिस तरह से उन्होंने सवाल उठाये, जिस तरह के लेख लिखे, उस पर एक रिपोर्टर की हैसियत से मैं प्रभावित रहा। और फिर आप देखेंगे कि 1991-92 का जो पूरा पीरियड है, मस्जिद की डिमॉलिशन (विध्वंस) तक...लगातार उन तीन सालों में जो लेख उन्होंने लिखे, उसमे एक चीज़ साफ थी कि राष्ट्रवाद की जो उनकी एक कल्पना थी..


उस पर उन्होंने एक किताब भी लिखी बाद में...
हां, किताब भी लिखी..लेकिन जनसत्ता में जो उन्होंने उस वक्त आर्टिकल्स (लेख) लिखे, सबसे बड़ा सवाल उन्होंने यही पूछा था कि राष्ट्रवाद यानी क्या। ये नेशनलिज़्म (राष्ट्रवाद) पर जो डिबेट (बहस) होना चाहिए, वो किस तरह का डिबेट होना चाहिए। सेक्युलरिज़्म पर, धर्मनिरपेक्षता क्या है..और अच्छी बात क्या थी कि वो केवल एक इंग्लिश स्पीकिंग, वेस्टर्नाइज़्ड एजुकेटेड (अंग्रेज़ी बोलने वाले, पश्चिम से प्रभावित शिक्षाप्राप्त) जो एक क्रिटिसिज़्म (आलोचना) होती है उस मूवमेंट की, उस नज़रिए से वो नहीं लिख रहे थे। वो लिख रहे थे, वो ख़ुद एक रिलीजियस (धार्मिक) आदमी थे, He was proud of his Hinduism, वो कोई Atheist नहीं थे। तो उन्होंने...क्या कहेंगे उसको...He was rooted in the reality of India..उनका जो 40-50 साल का अपना तजुर्बा था, उन्होंने उसको लेकर जो लिखा है, मुझे लगता है शायद बहुत कम ऐसे लोग होंगे जिन्होने उस समय , उस हालात में उस तरह की writing (पत्रकारिता) की हो।
और ये करना जब उनके पर्सनल रिलेशन्स (निजी संबंध) बड़े अच्छे थे। आडवाणी जी के साथ, अटल जी के साथ...क्योंकि इमरजेंसी में उनका रोल रहा था। प्रभाष जी इन सबको जानते थे। लेकिन, मुझे लगता है कि उन्होंने पत्रकारिता में ये दिखाया कि मेरे पर्सनल रिलेशन जो भी हों, लेकिन मेरे लिखने पर उसका कोई असर नहीं होगा। और आपको मैं अगर क्रिटिसाइज़ (आलोचना) करता हूं तो मैं मेरी neutral independent position से, मुझे जो सही लगता है, उस हैसियत से करता हूं। क्योंकि एडिटर या एक कमेंटेटर की जो विशेषता होती है, कि आप जब किसी इशु (मुद्दे) पर लिखते हैं, आप उसे अपने पर्सनल इक्वेशन (निजी संबंधों) से दूर रखकर एक बड़ी तस्वीर लोगों के सामने लाने की कोशिश करते हैं। तो जिस एग्रेशन (आक्रामकता) से उन्होंने लिखा, जिस डायरेक्शन (नज़रिए) से लिखा..हालांकि, कुछ लोग कह सकते हैं कि वो उनके लिए एक 'finest hour' था। कई लोग कहते हैं कि इमरजेंसी में जिस तरह से उन्होंने जुड़कर जेपी के साथ काम किया था, वो तो बात अलग है..लेकिन उन दो-तीन सालों में जो उन्होंने लगातार लेख लिखे और जिस तरह से उन्होंने प्रश्न उठाए, एक तरह से 'That would be his finest hour' हम कह सकते हैं।


अच्छा, क्रिकेट भी तो आप दोनों के बीच कॉमन रहा होगा।
जवाब - हां, वो क्रिकेट के बहुत शौकीन थे। जब मैं उनसे पहली बार मिला तो हमने क्रिकेट पर कई बातें की। और वो मेरे पापा (दिलीप सरदेसाई) के बहुत शौकीन थे। तो, कई बार मैं जब बात करना चाहता था 91-92 में जो हो रहा था, उस पॉलिटिक्स की, और वो बात करने लगते थे क्रिकेट की। मुझे ये भी हमेशा अच्छा ही लगता था। वो शायद तब की बात है जब मैं एक बार उनके साथ एक दौरे पर गया था, शायद पीएम का दौरा रहा होगा या ऐसा ही कुछ, तो मैं लगातार उनसे बात करना चाहता था पॉलिटिक्स के बारे में और वो बात करना चाहते थे क्रिकेट की।


और कोई ख़ास बात जो याद हो...
उन्होंने कभी ऐसा नहीं सोचा कि कोई यंग है या बुजुर्ग है..कभी उनमें ऐसी भावना नहीं थी। और वो मराठी बड़ा अच्छा बोलते थे। मुझे लगता है ये उनका इंदौर का प्रभाव रहा होगा कि वो हमेशा मुझसे मराठी में बोलते थे। मैं सवाल उनसे हिंदी में पूछता था मेरी हिंदी बेहतर करने के लिए और वो जवाब हमेशा दिया करते थे मराठी में। तो ये दो-तीन बातें मुझे उस समय की याद हैं। फिर लगातार संपर्क रहा उनसे। उनसे सीखने का काफी मौका मिला मुझे। उनमें कभी bitterness (कड़वाहट) नहीं देखी। उनमें हमेशा ये था कि उनका जो एक्सपीरिएंस था, वो हमेशा लोगों से बांटना चाहते थे। पिछले पांच-छह सालों में जो उनको गुस्सा आया होगा, वो मुझे लगता है, पेड न्यूज़ को लेकर।


हां, आपसे भी काफी टकराहटें हुई थीं इसे लेकर?
हां, कि पेड न्यूज़ क्या होना चाहिए। किस तरह का होना चाहिए। पेड न्यूज़ का मतलब क्या है। मेरा हमेशा ये कहना था कि disclosure (खुलासा) होना चाहिए। कि अगर आप कोई ख़बर कर रहे हैं और उस ख़बर के पीछे 'कोई' है तो आपको ज़रूर ये बताना चाहिए। उनको लिए तो पूरी तरह से Advertising (विज्ञापन) ही...

आपके क्या मतभेद रहे?
नहीं, मतभेद नहीं थे। मुझे लगता है कि उन्हें लगा कि कहीं न कहीं जो आज की पत्रकारिता इतनी भटक गई है..उन्हें डर था पेड न्यूज़ की वजह से आज की पत्रकारिता भटक गई है। मेरा ये कहना है कि आज के ज़माने में आप मार्केटिंग से दूर नहीं रह सकते। आप बेशक पेड न्यूज़ करें। मेरा कहना था कि आप लोगों के सामने डिस्क्लोज़र करें। आगर आपकी कोई ख़बर है और उसके पीछे किसी की स्पांसरशिप है तो लोगों को बताइए। आप सीधा रखिए। मैं आज भी वही मेंटेन करता हूं, कि पूरा डिस्कलोज़र होना चाहिए। पेड न्यूज़ तब है, जब आप लोगों से छल करते हो कि किसी के नाम से आप ख़बर छपवा लो और उसकी जानकारी viewer को नहीं दो। वो एक ऐसे ज़माने के पत्रकार थे जिसमें उनको मार्केंटिग और एडवर्टाइज़िंग (विज्ञापन) से कोई लेना-देना ही नहीं था।

मतलब, बाज़ार के खिलाफ था एकदम?
राजदीप - हां, उनको लगा एकदम बाज़ारीकरण हो रहा है। कमर्शियलाइज़ेशन हो रहा है। मेरा ये कहना है कि कमर्शियलाइज़ेशन को हम पूरी तरह से नकार नहीं सकते। और इसके कुछ benefits (फायदे) भी हैं। वो ज़माना चला गया कि आप जर्नलिज़्म को उस तरह से देख सकें। दुनिया कमर्शियल हुई है। क्या पत्रकार उससे पूरी तरह से हट सकता है। नहीं। क्या पत्रकार अलग रह सकता है। ज़रूर। पत्रकार अलग इस तरह से रह सकता है कि बाज़ारीकरण जो हो रहा है, उसमें आप मार्केंटिंग और एडिटोरियल में एक फर्क तो ज़रूर रखना पड़ेगा। एक चाइनीज़ वॉल रखनी ही पड़ेगी। उनका कहना था कि कोई ज़रूरत नहीं है एडवर्टाइज़िंग की। एडवर्टाइज़िंग से हमें कोई लेना-देना नहीं है। मेरा ये कहना है कि एडवर्टाइज़िंग से आपको कहीं न कहीं एक रिलेशनशिप बनानी पड़ेगी। लेकिन, उस रिलेशनशिप में आपका अपना दायित्व, अपना कर्तव्य viwer या पाठक के पास है, किसी एडवर्टाइज़र के पास नहीं है। तो आपके पास कोई ख़बर है तो वो ख़बर रहती है, आप कोई पीआर नहीं कर रहे। इसमें और उनमें कोई मतभेद नहीं है। उनका इतना ही कहना था कि ये जो भी हो रहा है वो बाज़ारीकरण है। और मैं समझता हूं कि हर चीज़ को अगर हम बाज़ारीकरण के रूप में लें तो वो ग़लत होगा।

वो मीडिया के कारपोरेटाइज़ेशन के सख्त खिलाफ थे।
हां, मगर मेरा ये कहना है कि आप कारपोरेटाइज़ेशन को अगर रावण की तरह देखा करोगे, हर चीज़ जो कॉरपोरेट इंडिया करता है, वो ग़लत है तो ये भी कहना ग़लत होगा, मुझे लगता है। हां, उसके कई निगेटिव पहलू भी आए हैं। पेड न्यूज़ उनमें से एक है। पेड न्यूज़ के खिलाफ हम भी हैं, वो भी थे। मुझे लगता है पेड न्यूज़ किसी भी हालत में हमें मंज़ूर नहीं है। मगर पेड न्यूज़ की परिभाषा क्या है। पेड न्यूज़ मेरे ख़याल में वो है जबकि आप न्यूज़ छपवाते हैं किसी के इशारे पर और वो अपने पाठक या दर्शक को बताते नहीं हैं। उनकी परिभाषा में कोई भी ख़बर जिसमें एडवर्टाइज़र किसी भी तरह से शामिल हो या कोई प्रोग्राम स्पांसर्ड (प्रायोजित) हो, वो सब....

लेकिन, वो जिस हद तक ख़िलाफ थे पेड न्यूज़ के, वो पूरी आज़ादी से स्टैंड ले सकते थे, लेते रहे। आप उस आज़ादी से खिलाफ नहीं हो सकते। आप पर कहीं न कहीं से 'प्रेशर' (दबाव) रहेगा।
मुझे नहीं लगता। मैं तो दूसरी तरफ से देखता हूं। आपका प्रेशर तब कम होता है जब आप कमर्शियली स्ट्रांग (आर्थिक स्थिति मज़ूबत) हैं। आज ख़ास कर के रीजनल मीडिया में क्या हुआ है। रीजनल मीडिया में पेड न्यूज़ ज़्यादा क्यों बढ़ गया है। क्योंकि रीजनल मीडिया एक तरह से फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट (आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर) नहीं है। जब तक आप इंडिपेंडेंट (आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर) नहीं है, तब तक आपको डर हमेशा रहेगा कि एडवर्टाइज़र जो है, वो डिक्टेट करेगा। आप कॉरपोरेटाइज़ेशन को ग़लत देखोगे तो मुझे लगता है कहीं न कहीं हम मिसटेक कर रहे हैं। मैं इस बात की...ये जो ख़बरें चलती हैं कभी-कभी टीवी पर, क्या ये कॉरपोरेटाइज़ेशन की वजह से हैं। कि शाहरुख को कहीं मोच आई या आप बिहार के फ्लड्स(बाढ़) की ख़बर नहीं करेंगे, कोई प्रेम कहानी करेंगे। तो मेरा उनसे उतना ही कहना था कि ये जो डिक्लाइन (पतन) हुई थी, और हमारे मीडिया में डिक्लाइन हुई है। एडिटोरियल पेज पर डिक्लाइन हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार में जो एडिटोरियल एक समय मज़बूत था, अब कमज़ोर हुआ है। उसकी वजह कॉरपोरेटाइज़ेशन नहीं है। उसकी वजह है कि हमारी जो रीढ़ है, हमारी जो बैकबोन है, वो कमज़ोर हुई है। हम ख़ुद कमज़ोर हुए हैँ। हम एक तरह से कॉरपोरेटाइज़ेशन का एक्सक्यूज़ (बहाना) दे रहे हैं कि सब कुछ (ग़लत) कॉरपोरेटाइज़ेशन की वजह से ही हो रहा है। तो वहां, उनमें और मुझमें थो़ड़ा फर्क था। उनका कहना था कि कॉरपोरेटाइज़ेशन को किसी भी हालत में आने नहीं देना चाहिए। मेरा ये कहना है कि कॉरपोरेटाइज़ेशन को आप अकेले ज़िम्मेदार मत ठहराइए। मीडिया में जो डिक्लाइन हो रहा है, उसके लिए हम उतने ही ज़िम्मेदार हैं, जितने कॉरपोरेट्स।

उस दौर की संपादकीय टीम में और आपके दौर की एडिटोरियल टीम में कैसा फर्क आया है। ख़बरों के चयन को लेकर जो बदलाव आए हैं, वो क्या यहीं से नहीं शुरू होते।
देखिए, एक तो मुझे लगता है कि ज़माना बदल गया है। आज मार्केट कांपटीशन बहुत है। कॉरपोरेटाइज़ेशन नहीं मार्केट कांपटीशन। टीवी चैनल जो हैं। अब आप 20-30-40 चैनल लाएंगे, हर चैनल अगर ब्रेकिंग न्यूज़ कर रहा है तो कहीं न कहीं आपका जो दिमाग है, वो ब्रेकिंग न्यूज़ की दुनिया में चला जाता है। वो ख़बरों से दूर हटकर नहीं देखता कि बड़ी तस्वीर क्या है। आप सिर्फ उस समय को भुनाने के चक्कर में चले जाते हैं। और छोटी ख़बर को बड़ी ख़बर करना कैसे है। क्योंकि दर्शक तो एक है। चैनल 25-30 हैं। तो उसको कैसे अपनी तरफ खींचें। और दर्शक का अटेंशन स्पैन (रुके रहने का सब्र) जो है, वो भी कम हुआ है। उसके पास दो घंटे नहीं हैं। जैसे एक ज़माने में पांच दिनों के टेस्ट मैच हुआ करते थे, आज टी-20 है। उसी तरह टीवी में भी हुआ है। एक ज़माने में आप एक घंटे की डॉक्यूमेंट्री करते थे, आज लोग चाहते हैं कि उनको सौ ख़बर दे दो एक मिनट में।


लेकिन, अख़बार क्यों टीवी बनता जा रहा है?
क्योंकि, अख़बार एक तरह से उस टीवी के प्रेशर में आकर, कि यही मेरा भी जो पाठक है, वो मेरे साथ एक घंटा नहीं गुज़ारेगा, उसके पास सिर्फ दस मिनट का समय है। तो आप जो ख़बर हज़ार शब्दों में देते थे 10-15 साल पहले, वही आप उसको सौ अक्षरों में दे दो। कहीं न कहीं टीवी का दबाव तो है। पर, मैं फिर कह रहा हूं कि इसके लिए ज़िम्मेदार हम हैं। हम इससे दूर हट सकते हैं। मैं अभी भी समझता हूं कि इतने बड़े देश में ऐसे भी दर्शक या पाठक होंगे जो चाहते हैं कि आप उनको अच्छी ख़बरें दें। आप उनको ख़बरें सोच-समझ कर दें।

लेकिन, यहां फिर वहीं लोग टीआरपी का रोना रोने लगते हैं।
देखिए, जर्नलिज़्म बॉक्स ऑफिस नहीं है। हमें ये बात अच्छी तरह से समझनी होगी। ये बॉक्स ऑफिस नहीं है कि हम हफ्ते के हफ्ते अपनी कलेक्शन देखें। और मैं समझता हूं कि यही एडवर्टाइज़र भी चाहेगा। कोई भी एडवर्टाइज़र किसी चड्डी-बनियान चैनल के साथ जुड़ना नहीं चाहेगा। एडवर्टाइज़र भी चाहता है कि सबसे बड़ी चीज़ हो उस चैनल या अख़बार की विश्वसनीयता। और विश्वसनीयता कोई एक हफ्ते में नहीं बढ़ती। विश्वसनीयता पाने के लिए आपको दिन पर दिन, साल भर साल लगे रहना होगा। हर दिन लोगों को दिखाना पड़ेगा कि किस तरह की ख़बर होती है। असम में बाढ़ आई तो इसका मतलब नहीं कि आप उसको फर्स्ट हेडलाइन (पहली ख़बर) नहीं बनाएंगे। दिल्ली में सात लोग मरते हैं आग में, आप उसको टॉप हेडलाइन बनाते हैं। असम में सौ लोग मरते हैं बाढ़ में, आप उस पर ध्यान नहीं देते। मेरा आपसे कहना है कि किसने आपको कहा कि असम की हेडलाइन मत बनाओ पहले। दर्शक तो नहीं कह रहा है। आप सोच रहे हैं कि दर्शक सिर्फ दिल्ली की ख़बर देखना चाह रहा है। मैं हमेशा ये कोशिश करता हूं कि इस तरह का 'daring' (चुनौतीपूर्ण) कदम लिया जाए। हमने कल अपनी पहली हेडलाइन असम बनाई थी। आज हमने बिजली के संकट को पहली हेडलाइन रखी है। कौन कहता है कि आप न बनाएँ। ताक़त तो आपके पास है। हां, ये हो सकता है कि कोई कहे, यार ये ख़बर सेक्सी नहीं है, चलेगी नहीं। पर अगर हम इस तरह से सोचें तो बेहतर है पिक्चर बनाएँ फिर। हम फिल्म बनाएं राउडी राठौर जैसी। हमें फिल्म बनानी है या हकी़कत दिखानी है, ये तय करना होगा।

यानी बाज़ार भी है, आपसी रेस भी है, और क्या संकट हैं पत्रकारिता के?
संकट तो हैं। ऐसा नहीं है कि सब कुछ इतना आसान है। कल अगर टीआरपी गिरी तो मार्केटिंग वाला एडिटर पर दबाव ज़रूर डालेगा, ये बात सही है। लेकिन कहीं न कहीं हमें उस मार्केंटिग वाले को भी सिखाना पड़ेगा कि आपके लिए भी, आपका जो स्पांसर है, वो विश्वसनीयता देखकर ही आपके पास आएगा।

तो इतने 'डेयरिंग' (साहसी) संपादक अब हैं कहां?
वही तो मुसीबत है ना। हुआ क्या है कि जो मैनेजमेंट है, उसने संपादक का जो रोल है, उसे ख़त्म कर दिया है। हमारी सेल्फ रिस्पेक्ट...। प्रभाष जोशी जो थे, एक ऐसे संपादक थे, जिनके पीछे गोयनका (रामनाथ गोयनका) भी थे, और उनसे मार्केटिंग वाले मिलने से डरते थे, कि प्रभाष जोशी जी हैं। एक 'वेट' (क़द) था। आज भी किसी संपादक के पास 'वेट' हो तो मार्केटिंग वाला दो बार सोचेगा उससे टकराव करने की। पर चूंकि मैनेजमेंट और मार्केंटिंग वालों ने ऐसे संपादकों या पत्रकारों को ख़त्म करने की कोशिश की है,जिस वजह से इतनी समस्या आई है। पर अगर संपादक 'टफ' हुआ तो..

तो प्रभाष जी भी कहीं न कहीं उसी चीज़ से डर रहे थे कि संपादक के व्यक्तित्व को ये कॉरपोरेट ख़त्म कर देंगे?
हां, लेकिन हम अपने आप पर ज़िम्मेदारी लें। जैसे इमरजेंसी के दौरान कुछ एडिटर्स ने उसका सामना किया, कुछ झुक गए। उसी तरह से कारपोरेटाइज़ेशन के साथ उसका सामना करें। मैं समझौता नहीं करुंगा पर उनके साथ बराबर का एक 'इक्वेशन' (समीकरण) बनाकर खड़ा रहूंगा। मगर कुछ लोग बिल्कुल झुक जाते हैं।

कुलदीप नैय्यर जी से बात हो रही थी तो उन्होंने बताया था कि कैसे इमरजेंसी के दौरान करीब 150 पत्रकार एकजुट हुए थे, मगर इंदिरा शासन के खिलाफ साइन करने की बात आई तो केवल 37 लोगों ने किया। इसका मतलब पत्रकार पहले भी डरते थे और अब भी डरते हैं।
डर है, जायज़ भी है। लेकिन पत्रकार की एक विशेषता यही होती है कि वो अपना वज़न बनाए रखता है। हमारा वज़न सोसाइटी से आता है। हमारा वज़न न तो सैलरी से आता है और न कहीं और से। हमारा वज़न सिर्फ हमारी राइटिंग (लेखन), हमारी पत्रकारिता से आता है। वो एक तरह से यूनीक है। और एक पास आपके पास वज़न हो, तो फिर कोई भी मार्केटिंग वाला भी आपके पास आएगा। क्योंकि आपमें जो विश्वसनीयता है, वो किसी और में नहीं है। स्पांसर एक तरह से आपकी विश्वसनीयता ख़रीदना चाहता है।

संकट तो और भी कई हैं। जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया में कई लोगों के शेयर लगे हुए हैं। तो कम से कम जिन कंपनियों के शेयर लगे हुए हैं, उनके ख़िलाफ तो वहां ख़बरे जाएंगी नहीं।
वही तो पेड न्यूज़ की समस्या है। कि कारपारेट आपको शेयर दे दे और उसके शेयर के बदले में आप उसके बारे में अच्छा लिखें तो कैसे चलेगा। क्योंकि आप अपने पाठक या दर्शक को तो नहीं बता रहे हैं कि यहां इनका शेयर है। मैं कहता हूं आप बताइए कि मेरा शेयर है और फिर स्टोरी करिए। वरना आप सबको धोखा दे रहे हैं। पर मैं ये नहीं मानता कि स्ट्रांग एडिटर्स (मज़बूत संपादकों) के लिए जगह नहीं है। रास्ता ज़रूर है। हां, एक फर्क ये है कि प्रभाष जोशी जी के ज़माने में जर्नलिस्ट (पत्रकारों) के लिए रिस्पेक्ट (सम्मान) था। आज रिस्पेक्ट चला गया है। 'फियर' (डर) है। लोग हमसे डरते हैं। लेकिन, हमें रिस्पेक्ट नहीं करते। ये फर्क है। उस समय लोग पत्रकारों से डरते नहीं थे।

उस समय पत्रकारों में एक तरह से 'एक्टिविज़्म' भी था। प्रभाष जी ख़ुद भी घूम-घूम कर पत्रकारिता किया करते थे। पहले समाज से बहुत जुड़े हुए थे पत्रकार, अब तो गूगल से ही काम चल जाता है?
देखिए, एक्टिविज़्म का क्या है मतलब। कुछ लोग कहेंगे कि उस ज़माने में जो एक्टिविज़्म थी, वो एक तरह से पार्टिज़न (पक्षपाती) भी थी। कुछ लोग ये भी कहेंगे कि आप कैंपेन हमारे खिलाफ चला रहे थे। जैसे प्रभाष जी एक्टिविज़्म करते थे, दूसरे कुछ और भी कहते।

आप लोगों ने भी तो गुजरात में एक स्टैंड लिया था?
देखिए, आप एक्टिविज़्म कब कर सकते हैं। जब आपको बिल्कुल आपमें विश्वास हो कि जो हो रहा है, वो एकदम ग़लत है। वो लोगों के सामने आप दिखाएं। मेरा ये कहना है कि अब कांग्रेस ग़लत करती है, आप कांग्रेस के खिलाफ एक्टिविज़्म करें। जब बीजेपी ग़लत करती है, आप बीजेपी के खिलाफ एक्टिविज़्म करें। अब ये एक्टिविज़्म है या जर्नलिज़्म है। मेरे ख़याल में जर्नलिज़्म है। मैं अपने आप को एक्टिविस्ट नहीं मानता। एक्टिविस्ट जो होगा, वो अक्सर दूसरे (पक्ष) की बात सुनने से हिचकिचाएगा। क्योंकि उसको लगता है कि दूसरा जो है, वो ग़लत ही है। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जर्नलिस्ट जब एक्टिविस्ट बनने लगते हैं तो हम हमारी निष्पक्षता भूल जाते हैं। मैं एक्टिविज़्म में विश्वास नहीं करता। मैं समझता हूं आपके जर्नलिज़्म में इतना दम होना चाहिए कि वो अपने आप एक्टिविज़्म जैसा हो जाए। मैं नहीं समझता कि मैंने जो गुजरात में किया वो एक्टिविज़्म था। तीस्ता सीतलवाड एक्टिविस्ट हैं। इसीलिए अगर मैं आज कहूं कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात में कृषि के लिए अच्छा काम किया है, तो तीस्ता नहीं मानेंगी क्योंकि उनकी एक्टिविज़्म के मुताबिक नरेंद्र मोदी 'विलेन' हैं। मैं पत्रकार हूं। मैंने उनको कहा भी कुछ दिन पहले, जब ये SIT की रिपोर्ट आई और मैंने उनसे कुछ सवाल पूछे, उन्होंने मुझे कहा कि आप क्या कर रहे हैं। आप तो नरेंद्र मोदी के साथ अब हो गए हैँ। मैंने कहा कि साथ का सवाल नहीं है। अगर रिपोर्ट आई है, रिपोर्ट में कुछ सवाल उठे, तो पत्रकार का दायित्व है कि वो सवाल उठाए। दरअसल, जो Tolerance (सहनशीलता) थी, वो अब नहीं है। वो बहुत ही कम हुआ है। और हमारे पत्रकार भी politicized हो गए हैं। और एक्टिविस्ट भी हो गए हैं। इसकी वजह से हम कैंप्स (गुटों) में बंट गए हैं। नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाला कैंप या उसके पक्ष में। मैं कहता हूं जो अच्छी बातें हैं हम कहेंगे, जो बुरी बातें हैं वो भी कहेंगे। लेकिन जब हम अच्छी बातें कहते हैं आप कहेंगे हम बिक गए हैं।

चलिए, मोदी से हटकर बात करते हैं। आपके बारे में एक सीनियर जर्नलिस्ट कह रहे थे कि आप कई जगहों पर अंबानी के साथ खड़े दिखते हैं, उनके फैमिली फंक्शन में भी रहते हैं। तो ऐसे में आपकी पत्रकारिता या 'एक्टिविज़्म' वहां कमज़ोर नहीं पड़ जाती है? 
नहीं, नहीं। देखिए, मैं पत्रकार हूं। अगर मैं अंबानी के साथ खड़ा रहूं फंक्शन में और उसके बाद अगर कोई स्टोरी आए अंबानी की और मैं उस स्टोरी को दबा दूं तो आप मुझे कह सकते हैं। देखिए, पत्रकार जो है कई लोगों से मिलेगा। उनके कई रिलेशनशिप्स (संबंध) होंगे। लेकिन, आखिर में आप अपने चैनल पर क्या चलाते हैं या एडिटोरियल में क्या लिखते हैं, उससे फर्क पड़ता है। अब मैंने एक आर्टिकल लिखा तीन दिन पहले नीतीश पर। नीतीश जी और मोदी की तुलना करते हुए। अब नीतीश जी गुस्सा हैं। वो कह रहे हैं कि आपने मेरी कंपैरिज़न (तुलना) मोदी के साथ कर दी। अब कल तक वही नीतीश जी मुझे कह रहे थे कि आप बड़े धर्मनिरपेक्ष जर्नलिस्ट हैं। मेरी यही तो मुसीबत है। अगर सबको मुझसे दिकक्त है और सब मुझ पर आक्षेप लगाते रहें तो ये ठीक ही है। मुझे न नरेंद्र मोदी से लेना-देना है, न नीतीश कुमार से। तो प्रॉब्लम यही है कि नेताओं में भी tolerance (सहनशीलता) बहुत घटी है पहले की तुलना में। प्रभाष जोशी भले ही कुछ भी लिखते रहे आडवाणी या वाजपेयी जी के खिलाफ, ख़ास कर वाजपेयी जी पर, इसका मतलब ये नहीं कि वाजपेयी जी और उनके निजी संबंध ख़राब हो गए। या वाजपेयी जी ने उनकी स्टोरीज़ को दबाने की कोशिश की या कहा हो कि प्रभाष जोशी आप बिक गए हैं। लेकिन अगर मैं आज उसी तरह की पत्रकारिता करने की कोशिश करूं तो लोग कहेंगे कि आप बिक गए हैँ। तो सोच का फर्क है। ज़माना बदल गया है। प्रभाष जोशी का जो ज़माना था, वो एक तरह से बदल गया है।

प्रभाष जोशी का ज़माना ख़त्म हो गया है या बदल गया है?
नहीं. बदल गया है। ख़त्म भी कह सकते हैं। देखिए, अब दर्शक बदल गये हैं, नेता बदल गए हैं, संपादक बदल गए हैं, बाज़ार बदल गया है।

अब उस दौर की कोई ज़रूरत है क्या ?
देखिए, इंटेग्रिटी (इमानदारी) की ज़रूरत तब भी थी, आज भी है। Integrity के लिए अभी भी स्पेस है। अपनी पर्सनल इंटेग्रिटी के लिए जो जगह 20-30 साल पहले थी, वो आज भी है। आज थोड़ा मुश्किल है। हमारे सामने चुनौतियां और हैं। क्योंकि स्थितियां और भी जटिल हो गई हैं। प्रॉफिट का प्रेशर होता है। बाज़ार का प्रेशर होता है। ये सब चुनौतियां हैं। पर इसके बावजूद ये कहना कि क्या उनकी ज़रूरत नहीं है, बिल्कुल है। मैं समझता हूं आज ज़रूरत ज़्यादा है। क्योंकि इस प्रोफेशन को अगर हम पटरी पर लाना चाहें तो ये तभी ला सकते हैं जब जो आइडियलिज़्म (आदर्श), जो सोच प्रभाष जोशी जी में था, वो वापस लाएं। तो राह से हम भटक गए हैं ये बात सही है लेकिन अगर वापस पटरी पर आना है तो उस तरह की पत्रकारिता एक बार फिर करनी पड़ेगी। भले ही जो भी दबाव या चुनौतियां हों।

आइडियलिज़्म के लिहाज से पूछूं तो अभी हाल ही में जो एकाध आंदोलन देश में होते दिखे, उसमें संपादक कितने एक्टिव या इनएक्टिव दिखे?
देखिए, अन्ना के आंदोलन की बात कर रहे हैं तो मेरा तो एक तरह से क्रिटिसिज़्म (आलोचना) है उस पर। हम (कई संपादक) अन्ना के चीयरलीडर बन गए। तो मैं कहना चाह रहा हूं कि एक्टिविस्ट की भूमिका में जर्नलिस्ट आ जाए तो डेंजरस (ख़तरनाक) है। क्योंकि जब आप एक्टिविस्ट बन जाते हैं तो उस मूवमेंट की जो कमियां हैं, वो लोगों के सामने नहीं लाते। या तो आपको दिखाई देती हैं और आप लाते नहीं हैं या आप देखना नहीं चाहते। हमने देखा कि कैसे कुछ संपादक अन्ना के मूवमेंट में चीयरलीडर बन गए थे और मुझे वो अच्छा नहीं लगा। अच्छा, मेरे साथ प्रॉब्लम ये हो गई कि मैंने क्रिटिसाइज़ किया तो लोग कहने लगे कि अरे, आप करप्ट के साथ जुड़ गए हैं। अब मैंने अगर जनलोकपाल बिल पर कुछ प्रश्न उठाए तो इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं करप्ट हूं। दरअसल, हम ये फर्क नहीं सोच पाते एक पत्रकार और एक्टिविस्ट का। मैं चीयरलीडर नहीं हूं। मैं टीम अन्ना का सदस्य नहीं हूं। मुझे नहीं होना है। अगर होना होता तो मैं शामिल हो जाता फिर। हां, जब आप संपादकीय लिखें तो उसमें ज़रूर लिख सकते हैं कि अन्ना जो कर रहे हैं वो सही है पर हर रोज़, ये दिक्कत है।

अच्छा, ये तो बता दीजिए कि प्रभाष जोशी और सचिन के बीच क्या जादुई रिश्ता था।
वो सचिन के बहुत शौकीन थे। उनकी हमेशा सचिन से मिलने की बहुत ख़्वाहिश थी। और देखना भी चाहते थे सचिन को। मुझे जहां तक याद है 1992 में हमलोग वर्ल्डकप के लिए साथ में ऑस्ट्रेलिया गए थे। और वहां हम सचिन से मिले थे। वो बहुत खुश हुए थे। मैं टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए लिख रहा था और वो जनसत्ता के लिए। सचिन को देखना उनके लिए एक तरह से मोक्ष ही था।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

आइए दारा सिंह की तरह मुंह फुलाएं, हमारी बहनें असुरक्षित हैं...

ज़ी न्यूज़ पर दस बजे 'बड़ी ख़बर' लेकर आते हैं पुण्यप्रसून वाजपेयी। बढ़ी हुई दाढ़ी, हथेली रगड़ते, कुटिल मुस्कान के बीच बहुत जानकार लगते हैं 'बाबा' (चैनल के बीच पीठ पीछे इसी नाम से मशहूर)। बेशक हैं भी। कल दारा सिंह पर इतनी सारी जानकारियां लेकर आए थे कि लगा दारा सिंह पर कोई अच्छी किताब हमने पढ़ ली। इंदिरा से रिश्ते, जवाहरलाल नेहरू से रिश्ते, अमिताभ बच्चन से रिश्ते, सब पर जानकारी। सवाल ये नहीं कि (ये बाबा का तकियाकलाम भी है) इस प्रोग्राम में क्या था, सवाल ये था कि क्या सचमूच कल रात दस बजे यही बड़ी ख़बर थे। सिर्फ इसीलिए कि बाबा की दिमागी विकीपीडिया में दारा सिंह से लेकर दुनिया के हर विषय पर कई जानकारियां फीड हैं।

सवाल इसलिए कि 'बड़ी ख़बर' से ठीक पहले एनडीटीवी इंडिया पर 9 से दस बजे तक रवीश कुमार ने अपने गुस्से से हम सबको हिला दिया था। दो दिन पुराना एक वीडियो दिख रहा था। गुवाहाटी में कुछ भेड़िए (आदमी की शक्ल वाले) सड़क पर खुल्लखुल्ला ग्यारहवीं की एक लड़की के कपड़े फाड़कर तमाशा कर रहे थे। जो लोग लड़की की तरफ बढ़ रहे थे, वो बचाने के लिए नहीं, उसके कपड़े नोंचकर ले जाने के लिए आ रहे थे। कोई टोपी पहनकर आ रहा था, कोई हेलमेट पहने ही थोड़ी देर उसके साथ खेल लेना चाहता था। एनडीटीवी पर चार मेहमानों के साथ आग उगलते रवीश कुमार तब इकलौते 'दारा सिंह' लग रहे थे। उनका गुस्सा किसी स्क्रिप्ट में लिखा हुआ नहीं था। ये एक पत्रकार का गुस्सा था जो उस वक्त किसी दूसरे चैनल के स्टूडियो में नज़र नहीं आ रहा था। सुबह तक लगातार एनडीटीवी उस ख़बर को अपनी स्क्रिन के नीचे वाली जगह ('टिकर') पर लिख कर चला रहा था। 


अफसोस बस यही है । क्या ऐसे मौक़ों पर भी सभी न्यूज़ चैनलों को अपने-अपने गूगल की मदद से लिखे-लिखाए प्रोग्राम पेश करने का मन करता है। क्या गुस्सा हमारा सामूहिक हथियार नहीं बन सकता। ज़ाहिर है, रुस्तम-ए-हिंद दारा सिंह पर भी एक फीचर लाज़मी था, मगर क्या आधे घंटे में कुछ मिनट भी पुण्य प्रसून वाजपेयी इस घटना पर अपने ही अंदाज़ में मुंह नहीं फुला सकते थे। ये सवाल इसीलिए क्योंकि हिंदी मीडिया में जिन कुछ चेहरों पर दर्शक दांव लगा सकते हैं, उनमें से एक चेहरा बाबा का भी है। (ये किसी सर्वे के आधार पर नहीं, मेरी निजी राय है)। 


रवीश कुमार ने किसी मेहमान से सवाल किया कि क्या सरकार या वहां के नेता-पुलिस अचार डाल रहे थे। ये सवाल हम सबका है। वहां (गुवाहाटी) की महिला सांसद से रवीश ने एकदम डांटते हुए पूछा कि क्या आप वहां गई हैं, तो ऊल-जुलूल बोलती सांसद के पास कोई जवाब नहीं था। क्या जवाब होता, वो तो मीडिया रिपोर्ट देखकर ही जान पाई कि उसके इलाके की किसी लड़की के साथ सरेआम नंगई हुई है। 


ऐसे हैं हमारे सांसद। ऐसी है हमारी पुलिस। हम और आप इन्हें पहचानते है, मगर बोलते कुछ नहीं । मैं रोज़ मेट्रो में सफर करता हूं। हर दूसरे दिन सीट से लेकर भीड़ में ठीक से खड़े होने को लेकर लड़ाईयों की आवाज़ आती रहती है। तू सरदार है, तो मैं जाट हूं मादर...। तू दस साल से है, तो मैं बीस साल से हूं, क्या उखाड़ लेगा मेरा। इस तरह के डायलोग रोज़ सुनाई पड़ते हैं। हम चुपचाप सुनते रहते हैं और जोड़ते रहते हैं कि कितने साल से दिल्ली में हैं और कितने सालों तक रह पाएंगे ऐसे माहौल में। 


इसी संडे को मेरी एक कहानी 'गुड फ्राइडे'  जनसत्ता  में आई थी। पहली लाइन बेचारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की बेचारगी पर हल्के तंज से शुरु हुई थी। वो गुड फ्राइडे का दिन था। प्रधानमंत्री जिनका हाथ कंधे से ऊपर नहीं उठता और राष्ट्रपति ने, जिन्हें लगातार पांच मिनट बोलने के बाद दाईं ओर के आखिरी दांत दुखने की शिकायत है, पूरे देश को शुभकामनाएं दी थीं। माननीय अखबार ने वो लाइन उड़ा दी। पूरी कहानी छाप दी। कहानी में कुछ नया नहीं था। मुझे तो कहानी लिखनी आती ही नहीं। वो तो बस एक सच्ची घटना का थोड़ा-सा काल्पनिक विस्तार था, जिसमें एक स्टंटमैन मॉल की ऊंचाई से गिरकर मर गया था। और मैंने कुछ लोगों को मज़ाक में कहते सुना था कि साले ने दारू पी ली होगी। तो मैंने गुस्सा ज़ाहिर करने के लिए कुछ लिख दिया था। मगर ग़ुस्से का पहला वाक्य ही काट दिया गया। सवाल यही कि हम कब तक 'सेफ' खेलते रहेंगे। ख़ैर...


बात दारा सिंह से शुरु हुई थी। हमारे घर में हनुमान का कैलेंडर था जिस पर दूध का हिसाब लिखा जाता था। मुझे बचपन से पूरा यक़ीन था कि टीवी वाले दारा सिंह और कैलेंडर वाले हनुमान एक ही आदमी के चेहरे हैं। शीशे के सामने मुंह फुलाकर कई बार हम हनुमान या बलवान बनने की नकल करते रहे हैं। आइए एक बार फिर सचमुच का गुस्सा भरकर दारा सिंह की तरह मुंह फुलाएं। इसकी बहुत ज़रूरत है। रक्षा बंधन आने वाला है और हमारी बहनें सड़कों पर नंगी की जा रही हैं। 


निखिल आनंद गिरि 

रविवार, 8 जुलाई 2012

गुड फ्राइडे

वो गुड फ्राइडे का दिन था। प्रधानमंत्री जिनका हाथ कंधे से ऊपर नहीं उठता और राष्ट्रपति ने, जिन्हें लगातार पांच मिनट बोलने के बाद दाईं ओर के आखिरी दांत दुखने की शिकायत है, पूरे देश को शुभकामनाएं दी थीं।
उसके सारे दांत बाहर आ गए थे। वो मुंह के बल ज़मीन पर गिरा था। उसका मुंह खेत में पड़े किसी मिट्टी के ढेले की तरह भसक गया था। आसपास बहुत ख़ून बह रहा था। मगर उसके मरने की जगह इतनी साफ थी कि मक्खियां अब तक वहां पहुंच नहीं सकी थीं। ख़ून साफ करने के लिए एक रेस्क्यू टीम मिनटों में वहां घेरा बना चुकी थी। पांच से दस मिनट के भीतर सब कुछ सामान्य था। अगर कोई आदमी अब इस उद्घाटन समारोह में पहुंचता तो उसे बिल्कुल ही पता नहीं चलता कि अभी-अभी एक स्टंटमैन यहां ख़ून की उल्टियां कर मर गया है। स्पॉट डेड।
मेरे हाथ में एक बढ़िया सा डिजिटल कैमरा था। जिससे बहुत दूर की तस्वीरें भी साफ आती थी। मैंने एक फोटोग्राफी की किताब भी ख़रीदी थी, जो किसी और को देने के लिए थी। तब तक उसे पढ़-पढ़कर मैं जहां-तहां की फोटो खींचता फिर रहा था। इतने बड़े मॉल का उद्घाटन था। तो मुझे वहां जाना ज़रूरी लगा। एकदम नए तरह के एडवेंचर गेम्स वाला शहर का पहला मॉल बना था। ख़ूब भीड़ थी। स्टंटमैन रस्सी में झूलता हुआ लोगों को सलाम कर रहा था। लोग वॉउ वॉउकरते जा रहे थे। कुछ लड़कियां रिदम में तालियां बजा रही थी। उस स्टंटमैन का जोश बढ़ता जा रहा था। फिर उसने रैपलिंग (रस्सियों का एक तरह का करतब) के कुछ बेजोड़ नमूने दिखाए। हवा में कई सेकेंड्स तक लटका रहा। वो नीचे से जंप लेता तो रस्सियों में टंगा आसमान तक पहुंच जाता। हो सकता है, उतनी ऊंचाई से उसे शहर के बाहर अपना गांव भी दिखता हो। लोग सीटियां बजा रहे थे। मैं तस्वीरें लेता जा रहा था। कभी लोगों की तो कभी उस स्टंटमैन की। सबसे अच्छी तस्वीर वही थी जो उसकी मौत से ठीक पहले खींची गई थी। एकदम दोनों हाथ आज़ाद फैले हुए और चेहरा मुस्कुराता हुआ। फिर अचानक वो मॉल की सबसे ऊंचे तल्ले से नीचे आने लगा। शायद उसे अंदाज़ा नहीं था कि नीचे आते-आते रस्सियां ख़त्म हो गई थीं या फिर वो सीटियों और तालियों के जोश में एक मंज़िल ऊपर तक चला गया था। ठीक उसी वक्त की तस्वीर थी वह। एकदम ईसा मसीह वाली मुद्रा थी। फिर वो ज़मीन पर आ गिरा। मर गया।
टीवी पर तो ख़ैर इस तरह की छोटी ख़बरें आती नहीं, इसीलिए मैंने आज चार अख़बार ख़रीदे हैं। मैंने सारे अख़बार पलट लिए हैं, कहीं उसकी कोई जानकारी तक नहीं है। कोई नहीं जानता कि उसके कितने बच्चे थे। उसकी बीवी किसी के साथ भाग गई या अब तक घर में चूड़ियां तोड़ रही है। मेरा ख़याल है कि उसकी बीवी को तुरंत कहीं भाग जाना चाहिए। नैतिकता का ख़याल किए बिना। एक औरत की नैतिकता तो तब तक ही अच्छी लगती है, जब तक उसका पति उसे इसके नंबर देता रहे। तस्वीर में दिख रहे उस स्टंटमैन की उम्र के हिसाब से उसकी बीवी की उम्र का अंदाज़ा लगाकर यही कह सकता हूं कि वो एकदम जवान रही होगी। एकाध बच्चे हो गए होंगे तो भी ताज्जुब नहीं। वो रोज़ अपने बच्चों के दूध में से थोड़ा बचाकर अपने पति को पिला देती होगी क्योंकि उसका काम जोखिम भरा है। पता नहीं उसने कभी मॉल देखा होगा या नहीं। मॉल देखा भी हो तो पति को बहादुरी भरे जोखिम उठाते देखा होगा कि नहीं। कैसे वो अपनी जान पर खेल कर सब उदास लोगों को मुस्कुराहट से भर देता है। और लड़कियां रिदम में सीटियां बजाती हैं। उसकी बीवी को तो सीटियां बजाना भी नहीं आता होगा। लेकिन, अब जब स्टंटमैन मर चुका है तो लोग उसके घर के बाहर सीटियां बजाएंगे। चूंकि वो जवान होगी, तो उसके साथ कुछ लोग भाग जाने का मन भी बनाएंगे।

शहर के जिस किनारे पर यह मॉल बना है वहां पहले बहुत झुग्गियां हुआ करती थीं। ऐसा नहीं कि झुग्गियों वाले लोग ही अब अमीर हो गए मगर अब यहां बहुत अमीर लोग रहते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसे सभ्य लोगों के बीच कोई मॉल बने तो कोई केंद्रीय मंत्री ही उद्घाटन करेगा। कोई गांव का मंदिर या पुस्तकालय तो है नहीं कि किसी ग़रीब की चाची या स्कूल का हेडमास्टर आकर फीता काट दे। तो जिस वक्त ये हादसा हुआ केंद्रीय मंत्री जी वहां मुस्कुराते हुए खड़े थे। मंत्री जी को मुस्कुराने का बहुत शौक था, इसीलिए मुस्कुराते रहते थे। ये वही मंत्री थे, जिन्हें एक बार किसी टीवी के कैमरे ने तब फैशन शो में मुस्कुराते हुए पकड़ लिया था, जब मुंबई में बम धमाके हुए थे और तेरह लोग मारे गए थे। इस मॉल में वो फिल्मी सितारे भी आए थे, जिन्हें बुरी फिल्मों में भी मुश्किल से रोल मिलते थे। सयाली नाम की कोई कलाकार भी थी जिसके बारे में मेरी जानकारी उतनी ही है, जितनी अपनी बुआ की सबसे छोटी लड़की के बारे में जो बनारस में किसी लड़के के साथ भाग गई थी और उसके पांव भारी होने की अफवाह के बाद बुआ ने खु़दकुशी कर ली। लेकिन, सयाली के बारे में उस मॉल में मौजूद लोगों का सामान्य ज्ञान मुझसे कहीं बेहतर था। वो सयाली को इतना नज़दीक से देख लेना चाहते थे कि जैसे किसी ग़रीब गांव में पहली बार हैंडपंप लगा हो। सयाली उन्हें हंसकर देख रही थी तो वहां के लोग इतने संतुष्ट दिख रहे थे जैसे जैसे आरओ फिल्टर से छना हुआ पानी पीकर तृप्ति मिलती है।

मॉल का पहला दिन था इसीलिए हर ओर सेक्यूरिटी के लिहाज से वर्दी में पर्याप्त गार्ड मौजूद थे। मगर, मेरा अनुमान है कि ज़्यादातर इस वक्त कलाकारों की भीड़ की तरफ ही खड़े थे। स्टंटमैन की मौत ठीक इसी वक्त हुई थी, और उसके आसपास सुरक्षा की ज़िम्मेदारी जिस टीम की थी, वो या तो फिल्मी कलाकारों के आसपास घूम रहे होंगे या फिर केंद्रीय मंत्री जी की कार के आसपास खड़े होंगे।   

जब स्टंटमैन मरा तो मंत्री जी मॉल के मैनेजर की पत्नी के हाथ से मीठा पान खा रहे थे। उन्हें यूं मीठा पान खाना बहुत पसंद है। वो बहुत ज़ोर से खिलखिलाकर हंसे थे और उनके मुंह से पान की पीक उनके सफेद कुर्ते पर आ गिरी थी। मॉल मैनेजर की पत्नी ने झट से अपनी साड़ी हाथ में लेकर उनके कुर्ते पर पड़ी पीक साफ की थी। मंत्री जी ने सो नाइस ऑफ यू कहा था और मैनेजर ने अचानक खड़े लोगों को झुंझलाते हुए थोड़ा-पीछे हटने को कहा था। ठीक इसी वक्त स्टंटमैन पूरे जोश में और ऊपर की तरफ उछला था और नीचे उसकी लाश ही लौटी थी। मंत्री जी ने पूरा का पूरा पान निगल लिया था और जल्दी से अपनी गाड़ी में वापस लौटने को चल दिए थे। मॉल मैनेजर स्टंटमैन की लाश की तरफ जाने के बजाय मंत्रीजी की तरफ भागा था मगर उसे एक गंदी गाली मिली थी।
टीवी कैमरे आधा-आधा झुंडों में बंट कर लाश और मंत्रीजी की गाड़ी की तरफ लपके थे।

इधर सब कुछ सामान्य हो गया था। लाश के आसपास से सब कुछ धो-पोंछ कर साफ किया जा चुका था। स्टंटमैन की डेड बॉडी एंबुलेंस में लादकर मॉल से बाहर कर दी गई थी। रिदम वाली तालियां थोड़ी देर चुप रही थीं, मगर फिर एक नए स्टंटमैन ने माहौल संभाल लिया था। माहौल ऐसे बदल गया था जैसे कोई चिड़िया पंखे से टकराकर घर में मर जाती है और उसके बाहर फेंके जाने तक मायूस दिख रहे घर के लोग अचानक अपने रूटीन पर लौट आते हैं। मॉल में मौजूद पत्रकारों और पुलिस अधिकारियों को मैनेजर की पत्नी तुरंत फूड स्टॉल की तरफ लेकर गई थी। वहां खाने (और पीने) का इतना बढ़िया इंतज़ाम था कि इसके बाद किसी गदहे को ही मॉल के भीतर सुरक्षा इंतज़ाम में कोई चूक नज़र आती। लोग थालियां हाथ में लिए मॉल की तारीफ में लंबे-लंबे वाक्य कह रहे थे। साथ ही ये भी कह रहे थे कि स्टंटमैन ने आज थोड़ी ज़्यादा ही दारू पी रखी थी, इसीलिए कंट्रोल छूट गया। एक अख़बार वाले ने ये भी कहा था कि उसकी बीवी देखने में बहुत ख़ूबसूरत है, मगर पति के आने से पहले घर का दरवाज़ा तक नहीं खोलती।

अंदर सयाली नाम की वो कलाकार भी किसी स्टंट को करने के चक्कर में बैलेंस खोकर घायल हो गई थी। एक गोल-गोल घूमनेवाली गाड़ी थी, जो हाथ छोड़कर चलाने में इधर-उधर लहराने लगती थी। इसी स्टंट के चक्कर में सयाली ने जैसे ही हाथ छोड़ा, वो गाड़ी से बाहर गिर पड़ी और गाड़ी के नीचे आ गई। मगर, जैसा मैने पहले ही बताया वहां तमाम तरह के सेक्यूरिटी गार्ड्स से लेकर जवानों की टीम मौजूद थी। तो उसे तुरंत संभाल लिया गया। खाना छोड़कर कुछ पत्रकार उधर भागे थे, मगर तब तक सयाली भी मॉल से बाहर जा चुकी थी। फिर वो अपनी जूठी थालियों की तरफ लौट आए थे।

तो कुल मिलाकर घटना ये हुई थी कि दिल्ली से सटे नोएडा शहर में एक नया मॉल उस जगह खुला था जहां पहले झुग्गियां और फिर एक श्मशान हुआ करता था। उसी मॉल के उद्घाटन समारोह में एक स्टंटमैन करतब दिखाने के लिए सुबह से ही तैयार बैठा था। स्टंट शुरू होते-होते भीड़ बहुत ज़्यादा बढ़ गई थी। एक केंद्रीय मंत्री जो अक्सर इस तरह के चकाचक कार्यक्रमों में जाने के आदी थे, पहुंच गए थे। एक फिल्म कलाकार जिसे पिछले कुछ सालों से किसी ने पर्दे पर देखा नहीं था, वो भी यहां आई थी। इन सबके बीच पंद्रह हज़ार सात सौ रुपये मासिक सैलरी कमाने वाले उस स्टंटमैन की एक तस्वीर मैंने खींची थी जो उसकी मौत से ठीक पहले की थी। उस तस्वीर में वो एकदम ईसा मसीह की तरह सलीब पर लटका नज़र आ रहा था। भीड़ वाले शहर पर बेफिक्र  मुस्कुराता हुआ। अरबों रुपये फूंक कर तैयार हुए इस शानदार मॉल में मौत से ठीक पहले  मुस्कुराते हुए उस आदमी के नीचे की ज़मीन पर अगर गद्दे बिछे होते तो वो बच भी सकता था। शहर की सबसे महंगी दुकान से भी गद्दे ख़रीदे जाते तो पंद्रह हज़ार सात सौ रुपये तक में आ ही जाते। लेकिन, इन पैसों का इससे ज़्यादा ज़रूरी इस्तेमाल मॉल के बुद्धिजीवी प्रबंधन ने किया था। उन्होंने यहां आने वाले सभी प्रेमी जोड़ों के लिए ख़ूब सारे नकली फूलों वाले गुलदस्ते और बच्चों के लिए टॉफियां मंगवा ली थीं।

इसके ठीक बाद उस फिल्म कलाकार के नाज़ुक शरीर पर थोड़ी सी चोट आई थी, जिसकी तस्वीर भी मेरे कैमरे में आ गई थी। मैं इस हादसे के वक्त वहां मौजूद दो-तीन  अख़बारों के स्टाफ को भी पहचानता था। स्टंटमैन की मौत के वक्त वो किसी दूसरे काम में बिज़ी रहे होंगे, इसीलिए मैंने अपने कैमरे की तस्वीर उन्हें इस उम्मीद पर दी थी कि कम से कम तीन कॉलम की एक ख़बर उस स्टंटमैन की फोटो के साथ ज़रूर आएगी।

शनिवार को मैंने शहर के सारे अख़बार ख़रीद लिए थे। अधिकतर अख़बारों में इस तरह की कोई ख़बर नहीं थी जिसमें किसी मॉल के भीतर किसी के मरने का ज़िक्र हो। एक अख़बार में सयाली की तस्वीर के साथ दो कॉलम की छोटी-सी ख़बर बनी थी। आप इसे स्टंटमैन की दुखद मौत की कवरेज समझ सकते हैं। ख़बर में लिखा था, गुडफ्राइडे की शाम नोएडा के रिहायशी इलाके में बने सबसे ख़ूबसूरत मॉल में बॉलीवुड की उभरती हुई मशहूर और ख़ूबसूरत अदाकारा सयाली गंभीर रूप से घायल हो गईं। उनकी दाहिनी हथेली में खरोंच आई है और कोहनी भी छिल गई है। बचपन से ही हिम्मती और दिलेर सयाली यहां मॉल के उद्घाटन समारोह के दौरान एक स्टंट करने के दौरान घायल हुई और उन्हें चाकचौबंद मॉल प्रबंधन ने तुरंत अस्पताल शिफ्ट कर दिया। बताया जा रहा है कि इस मॉल में स्टंट का ज़िम्मा देख रही टीम ने लापरवाही से इंतज़ाम किए थे। ख़बर है कि प्रैक्टिस के दौरान एक स्टंटमैन की मौत भी हो गई। पुलिस ने मामला दर्ज किया है और अंदेशा जता रही है कि स्टंटमैन नशे में धुत था और मॉल प्रबंधन के लाख रोकने के बावजूद स्टंट करने पर उतारू हो गया क्योंकि उसे उम्मीद थी कि केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी में अगर मॉल प्रबंधन को उसने खुश कर दिया तो उसे बड़ी प्रोमोशन मिल सकती है।
गुड फ्राइडे बीत चुका है। आज इतवार है, ईस्टर है। यीशु के धरती पर दोबारा जन्म का पर्व। मैं फिर से उस स्टंटमैन की आख़िरी तस्वीर को ग़ौर से देखता हूं। पता नहीं क्यों मुझे अचानक लगता है कि जैसे वो डर के मारे थोड़ी बस थोड़ी देर के लिए लेटकर मरने की एक्टिंग कर रहा है और फिर तुरंत खड़ा होकर स्टंट करने लग जाएगा। उसकी बीवी ने उसके लौटने के इंतज़ार में अब तक दरवाज़ा नहीं खोला होगा। और बंद दरवाज़े के भीतर अगर अख़बार आया भी होगा तो उसमें किसी स्टंटमैन के मरने की ख़बर होगी ही नहीं। मलमल के पन्नों पर छपे बड़े अख़बारों में इतनी छोटी ख़बरें नहीं छपा करतीं।

निखिल आनंद गिरि