बुधवार, 2 मई 2012

शर्म से कहिए कि वो 'मुसलमान' है...


दिल्ली में कई बार ऐसा हुआ कि मैं और मेरे मुसलमान साथी किराए के लिए कमरा ढूंढने निकले हों और मकान मालिक ने सब कुछ तय हो जाने के बाद हमें कमरा देने से इनकार कर दिया हो। कई बार मुसलमान साथी के सामने ही तो कई बार मुझे अकेले में बताते हुए। इस उम्मीद से कि मैं हिंदू हूं तो उसकी बात समझ ही लूंगा। कई बार दिल्ली की तीखी ज़ुबान से बिहारी सुनने का भी कड़वा अनुभव रहा है। मगर, ऐसे लोगों की बौद्धिक हैसियत पर मन ही मन हंसकर चुपचाप सह लेना ही बुद्धिमानी लगता रहा है।

लेकिन, 20 साल के आरज़ू सिद्दीकी के साथ सिर्फ इतना कहकर ही बात ख़त्म नहीं की गई। सिर्फ कहकर छोड़ दिया जाता तो वो भी सुनकर लौट आता, सह लेता। उसे मारा-पीटा गया। उस कॉलेज के भीतर जहां वो मीडिया की पढ़ाई करता है। उस आदमी ने पीटा, जिसकी बीवी को वो दो दिन पहले ख़ून देकर आय़ा था। सिर्फ एक बार ही नहीं पीटा गया उसे, कॉलेज के प्रिंसिपल जी के अरोड़ा ने भी बजाय उसे दिलासा देने के, पहले ‘मुसलमान’ और ‘बिहारी’ कहा और फिर बाद में सस्पेंड कर दिया। एक सड़कछाप गुंडे से भी बदतर अंदाज़ में उसका करियर तबाह करने की धमकी दी। महीने भर बाद जब आरज़ू अपने करियर की दुहाई लेकर प्रिंसिपल के पास दोबारा गया और परीक्षा में बैठने देने की अनुमति मांगी तो उसे फिर धमकाया गया। आरज़ू ने बताया कि वो बेहद ग़रीब परिवार से है और उसका एक साल बरबाद होने की ख़बर सुनकर घरवाले मर जाएंगे। वो भी जी नहीं सकेगा। कुर्सी की धौंस में प्रिंसिपल ने ‘मुसलमान’ और ‘बिहारी’ आरज़ू को मर जाने की बेहतर सलाह दी। आरज़ू ने तनाव में आकर आत्मदाह तक का मन बना लिया। मगर, इस युवा साथी की मानसिक स्थिति समझने और उसे सहारा देने के बजाय कॉलेज वालों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया।  



'जनसत्ता' में 8 जून 2012 को प्रकाशित
 
आरज़ू सिद्दीकी, जिसका जुर्म ये है कि वो मुसलमान है,
बिहारी है और ग़रीब भी है...
आरज़ू परीक्षा के पेपर देने के बजाय कोर्ट की पेशी झेलने को मजबूर हो गया। उसे मानसिक सुधार गृह में रख दिया गया। ये साबित करने की कोशिश की गई कि वो पागल है, उसका दिमागी संतुलन बिगड़ गया है। मगर डॉक्टर्स ने आरज़ू के कुछ साथियों के दबाव को देखते हुए ऐसा लिखने की मेहरबानी नहीं की। नतीजा ये हुआ कि कोर्ट को उसे रिहा करना पड़ा। फिलहाल आरज़ू दिल्ली की सड़कों पर घूम रहा है। उस पर हर तरफ से दबाव है कि वो आगे कोई ग़लतक़दम न उठाए। दिल्ली यूनिवर्सिटी की डिसिप्लीनरी कमेटी अब इस मामले की नज़ाकत को समझ रही है और आरज़ू को वहां भी पेशी के लिए बुलाया गया है।

मगर, सवाल ये है कि क्या सारा दोष सिर्फ आरज़ू का ही है। एक 20 साल के लड़के को तमाम गालियों के साथ मुसलमान और बिहारी कहकर मर जाने को उकसाने वाले उस प्रिंसिपल और उसके गैंग को समाज के सामने शर्मिंदा नहीं किया जाना चाहिए। क्या उनको ये अहसास नहीं होना चाहिए कि कुर्सी पर बैठ जाने से उनके सामने का हर आम आदमी कीड़ा-मकोड़ा नहीं हो जाता। वो भी तब जब अंबेडकर के नाम पर कॉलेज हो और उसका प्रिंसिपल ऐसा ग़ैर-संवेदनशील, रेसिस्ट और असामाजिक हो।  

ये भी बताते चलें कि आरज़ू के पिता के पिता पटना में चूड़ियां बेचकर किसी तरह परिवार का गुज़ारा करते हैं। आरज़ू की हिम्मत नहीं हुई कि वो अपने साथ हुई इस ज़्यादती की ख़बर घर पर दे सके। वो ज़िंदगी में चूड़ियां बेचने से कुछ अलग और बेहतर करना चाहता था इसीलिए दिल्ली चला आया। मगर, उसके मुसलमान या बिहारी या ग़रीब होने ने उसके बाक़ी तमाम सपनों को फिलहाल कुचल कर रख दिया है। उसकी हालत अभी क्या है, सिर्फ वही समझ सकता है। उसने प्रधानमंत्री से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री तक को तमाम चिट्ठियां लिख दी हैं मगर सब के सब उतने ही शांत और बेफिक्र हैं।

क्या आप और हम आरज़ू सिद्दीकी के लिए कुछ नहीं कर सकते

26 टिप्‍पणियां:

आशीष अनचिन्हार ने कहा…

आरजू पे हमें नाज है। दिल्ली की समस्या ऐसी है कि बदमाशी यहाँ के मूलनिवासी करते है और आरोप बिहारियों पर लगातें है।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

हे मीडिया के स्पाईडर मैनों! आओ, पढ़ो, कुछ करो। सिर्फ गुजरात में मत भटको। देखो! देश की राजधानी में भी कितना जघन्य अपराध होता है!!

मनोज कुमार ने कहा…

देवेन्द्र जी की गुहार में हम भी अपनी गुहार लगाते है।

आप तो किसी मीडिया से जुड़े हैं, वह भी इलेक्ट्रॉनिक ... इसे प्रमुखता दीजिए।

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

मनोज जी...अफसोस....हम अपने यहां ख़बरें तय नहीं करते....

विकल्प-मंच परिवार ने कहा…

यह देश की राजधानी के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के एक छात्र के साथ हुआ? हमारे सामाजिक पतन कि पराकाष्ठा है यह.
"आखिर हमने कैसा समाज रच डाला है?"

ankit ने कहा…

Very sad, we need to do something.. main delhi se hu but mujhe yeh kehte huye dukh horaha hai ki yahaan par aise "danavon" ka raaj hai. aise logoko sabak sikhana chahiye.
Ye principle insaniyat ke naam par "DHABBA" hai. humein kosish karna hoga ki kisi doosre ke saath ye sab na ho.

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

मकान किराए पर देने में खानपान और दूसरी बातें आड़े आ सकती हैं लेकिन सिर्फ मुसलमान और\या बिहारी होने से किसी को पीटा गया, ये बात अपने गले नहीं उतरती| ऐसी एकपक्षीय ख़बरें ध्यानाकर्षित करती हैं लेकिन ये सम्पूर्ण रिपोर्टिंग तो नहीं है|

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Er. Shilpa Mehta ने कहा…

this is too much !!

if he is not too mentally upset, and you are a close enough friend - may be you can suggest him to move court ? this is completely against the constitution - a flagrant abuse of citizens rights. (that is , if this is the whole story, and there are no other reasons behind the principals action )(even if there are - then too the principal has no right to push him to kill himself!!! in case of any valid reason at most he may suspend/ rusticate him )

Mahfooz Alam ने कहा…

Aise Principal ko to beech sadak par nanga karna chahiye, jo mazhab, caste aur state ke naam par apni rotiyan sekne ki koshish karte hain...

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

Yeah Shilpaji, the 'valid reasons' for his attempt to suicide r this much only...we r tryng our best 2 make sure that anybody's dignity is not so vulnerable..thnx

संजय ने कहा…

मकान किराए पर देने में खानपान और दूसरी बातें आड़े आ सकती हैं लेकिन सिर्फ मुसलमान और\या बिहारी होने से किसी को पीटा गया, ये बात अपने गले नहीं उतरती| ऐसी एकपक्षीय ख़बरें ध्यानाकर्षित करती हैं लेकिन ये सम्पूर्ण रिपोर्टिंग तो नहीं है|

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

संजय जी...आपको ख़बर एकपक्षीय लग सकती है....मगर मामला लगभग इतना ही है....दूसरे पक्ष में यही हो सकता है कि 20 साल के लड़के ने आवेश में आकर कॉलेज का 'अनुशासन' लांघ दिया होगा...जिसके लिए सस्पेंड कर देना काफी था...अगर आप संपूर्ण रिपोर्टिंग में प्रिंसिपल का कोई भावुक पक्ष जानना चाह रहे हैं तो मुझे लगता है आपको अफसोस ही होगा...

रविंद्र गोयल ने कहा…

Please advice how i can be of help. i teach in Satyawati College Eve, and my phone number is- 9811343388
Ravinder Goel

रविंद्र गोयल ने कहा…

Please advice how i can be of help. i teach in Satyawati College Eve, and my phone number is- 9811343388
Ravinder Goel

DILnawaz Pasha ने कहा…

प्रिंसिपल और कॉलेज प्रशासन का पक्ष जानने के लिए कम से कम पचास बार फोन मैंने किया, आरटीआई कार्यकर्ता अफरोज आलम साहिल कॉलेज भी गए लेकिन उन्हें कॉलेज के अंदर प्रवेश तक नहीं दिया गया।

अंबेडकर कॉलेज की स्टूडेंट वेलफेयर फोरम के कनवेनर आर ठाकुर को भी कई बार फोन किया गया लेकिन उन्होंने भी बात नहीं की।

Neeraj Basliyal ने कहा…

No comments on 'Hindu' or 'Musalman'

I have seen worse teachers. I, myself went through all this discrimination when it comes to education. I have seen many of my friends leaving study just because of teachers. I think it is also a crime to demoralize people, especially still developing minds.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शर्म की बात है ...

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

निखिल,
मेरा मतलब सिर्फ ये जानने का था कि आरजू के साथ होने वाला व्यवहार सिर्फ मुसलमान\बिहारी होने के कारण है? मेरे खुद के कई मुस्लिम\बिहारी संपर्क हैं और मुझे उनपर और उन्हें मुझपर पूरा भरोसा है| इस सवाल को साम्प्रदायिक नजरिये से पूछा हुआ न समझकर रेशनल क्वेश्चन समझें| कमेंट्स से दूसरे पक्ष के इस मुद्दे को इग्नोर करने की बात सामने आई है, मेरे ख्याल से पोस्ट इससे और तार्किक हो रही है| कई बार ऐसा होते देखा है कि एक पक्ष जाति, धर्म या लिंग के आधार पर अपनी बात को जायज करने की कोशिश करते हैं और बहुत बार सफल भी रहते हैं जबकि असलियत में जाने पर कुछ और भी बातें निकलती हैं जिनसे मुद्दा एकदम से दूसरे कोण से दिखने लगता है| मैं हमेशा से कहता आया हूँ कि अगर सजा देनी है तो कुसूर की सजा मिलनी चाहिए न कि कुसूरवार के सिर्फ जाति, मज़हब, लिंग या आर्थिक आधार को देखकर| हाँ, जुर्म करने वाला जितनी बड़ी पोजीशन में है, उसकी जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी फिक्स होनी चाहिए| किसी के साथ भी अन्याय करने वाले का समर्थन करने की मेरी कोई इच्छा नहीं है, मुझे उन प्रिंसीपल का भावुक पक्ष जानकार अफ़सोस करने की क्या जरूरत होगी भला?
फिर भी शुक्रिया, कि मेरे कमेन्ट के बाद भी पोस्ट और कमेंट्स असली मुद्दे पर केन्द्रित है|
और हाँ, जब मैं अपने प्रोफाईल से कमेन्ट कर रहा हूँ तो ये दूसरे संजय की क्या जरूरत है भाई? जिसने अपनी बात कहनी है अपने नाम से कहे तो अच्छा है|

बेनामी ने कहा…

दरअसल हम पत्रकारिता के छात्र है और लाजमी है की उसका असर हम में होगा भी जिन सुविधाओ के बारे में हमें कालिज में प्रवेश के समय सूचित किया गया था उनके नाम पर हमें मिले तो सिर्फ 3 कमरे और एक मीडिया लैब जिसमे एक टेलीविजन के अलावा कुछ नहीं है और वो भी पूरे साल एक नयी नवेली दुल्हन की तरह ताले में बंद रहता है जिसका हमने काफी बार विरोध भी किया लेकिन निराशा के सिवा कुछ न मिला हद तब हुई जब हमारे एक साथी ने कालिज चुनाव में खड़े होने की कोशिश की लेकिन कालिज प्रशासन ने आपनी तानाशाही दिखाते हुए उसे जबरदस्ती बिठाने की कोशिश की जब इसका विरोध किया गया तो गलत आरोप लगाकर चुनाव नामांकन रद्द किया गया जिसके खिलाफ हम उच्च न्यायलय गए और कालिज को फटकार लगवाई जिसका बदला कालिज प्रसासन ने हमारे 3 साथियों को सस्पेंड करके लिया चुकी हमने मीडिया लेब और अन्य सुविधाओ के बारे में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तेहत जानना चाहा तो बदले में हमें धमकिया और बेवजह की बाते सुनने को मिली साथ ही अन्य विभागों को ये बताया गया के पत्रकारिता के छात्र अपने साथ तुम सबका जीवन खराब करना चाहते है जिस कारण हम उन सभी के बुरे बने खेर ........... हमारी सभी बातो को नज़रंदाज़ किया जने लगा चुकी हम सब एक समूह में चलते इसीलिए नजरो में भी आते है और इसी कारण आरजू उनका अगला शिकार बना !

लेकिन जो कुछ भी हुआ वो कालिज प्रशासन के कहने पर हुआ और उस दिन शायद आरजू उनका शिकार बनना था .............. ज्यादा जानकारी के लिए http://beyondheadlines.in/ पर संपर्क करे

rashmi savita ने कहा…

Where we r going in the race of being so called more and more civilized? Shame on those profs..disgusting..they r polluting their profession.

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

संजय जी,
आपका कमेंट शुरु में स्पैम में चला गया था मगर मुझे ब्लॉग पर उसे प्रकाशित करना था इसीलिए मैंने वो कंटेंट उठाकर बस नाम के साथ डाल दिया...इस बार आपका नाम आपकी प्रोफाइल के साथ है....
रही बात प्रिंसिपल साहब के रवैये की...तो वो न तो लैंडलाइन से फोन उठाते हैं, न मोबाइल का नंबर....हालांकि, सुनने में आया है कि दिल्ली प्रशासन की तरफ से दबाव बढ़ा है उन पर...लेकिन, पब्लिक मंच से न तो वो माफी मांगते दिख रहे हैं और न ही आरज़ू से ही कोई बात की है...

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

@ anonymous:
बन्धु, आप लोग पत्रकारिता के छात्र हैं इस नाते आपकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि खबर संतुलित हो भी और दिखे भी| अभी आप लोग छात्र हैं लेकिन आने वाले कल में आप में से कई देश को और समाज को व्यापक रूप में प्रभावित करने वाली स्थिति में होंगे और इसी उद्देश्य से मैंने comment किया था| अधिकार के लिए आवाज उठाने वाला आँख में खटकता ही है| इसके लिए तैयार रहना ही पड़ता है, कालेज में तो नहीं लेकिन स्कूल टाईम में मैं खुद सस्पेंशन झेल चुका हूँ और डिमांड जायज थी तो वो हासिल भी हुई| अब आईये इस पोस्ट पर, टाईटिल से लेकर पोस्ट में जोर असल मुद्दे पर न देकर आरजू के एक प्रांत विशेष और उसके मजहब विशेष से सम्बन्ध रखने पर दिया गया है, जो आजकल के ट्रेंड के हिसाब से है, catchy but not with selective approach. हो सकता है अब पत्रकारिता के यही नियम हों क्योंकि मैं कभी पत्रकारिता का छात्र नहीं रहा, सिर्फ पढता था और मसालेदार की बजाय खबर की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान जाता था| जरूरत पडी तो इस विषय पर अपने कुछ अनुभव आप लोगों के साथ शेयर करना पसंद करूंगा, पहले आरज़ू सिद्दीकी के मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्यलाभ के लिए सच्चे दिल से कामना करता हूं, अभी ये ज्यादा जरूरी है|

@ निखिल,
thanx again for clearing profile dilemma.
गलत रवैया जरूर सुधरेगा, मुझे भी यकीन है| इस विषय पर आगे कभी विस्तृत बात जरूर करेंगे, स्वस्थ संवाद से कई भ्रम दूर होते हैं और हो सकता है मेरी ही विचारधारा कुछ बदल जाए| looking forward for good times to Siddiqui & you people. hope to receive positive updates soon. good luck friends.

बेनामी ने कहा…

Iwill suggest that all who feel concerned should talk to the principal Mr. GKArora on the issue or send an sms to say that - stop victimising Arzoo and let him study in peace. The contact details of the principal are G K Arora Mob. 9868957605
Ravinder Goel

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

संजय जी,
मेरी पोस्ट को आप पत्रकारिता के मानकों (अगर कहीं कुछ है तो...) से इंची-टेप लेकर मिलान करेंगे तो अफसोस हो सकता है...ये मेरा निजी आक्रोश है,कोई संस्थागत रिपोर्ट नहीं...ब्लॉगिंग का शायद यही फायदा है कि आप अपने हिसाब से मुद्दों का रुख तय कर सकते हैं...आप इसे 'कैची' या मसालेदार कह सकते हैं, मगर इसका कोई निजी मकसद नहीं, बस 'बहरों' को सुनाने का सबसे सटीक और असरदार तरीका निकालना था....
हां...आप अपने अनुभव बांटते रहे...हमें हौसला ही मिलेगा...
आरज़ू के अपडेट्स की बात रही तो आपको जानकर खुशी होगी कि वो अब एग्जाम भी दे पाएगा और उसका वाइवा भी आनन-फानन में कॉलेज ने करवा दिया है...अब अगर पत्रकारिता के 'नियमों' से थोड़ा आगे बढ़कर ब्लॉग लिखने का ऐसा असर होता हो तो लक्ष्मणरेखाएं हर बार तोड़ी जानी चाहिए....

बेनामी ने कहा…

I talked to the Arzoo Alam yesterday.. The situation as it stands today, his viva is over, he has been allowed to give exams. But he still remains suspended. As stated above,he is being charged of breaking a costly chair. But Arzoo Alam rightly argues that CCTV footage should be produced to prove my guilt. The real reason for his victimization isappears to be his insistence for necessary facilities like media lab for students of Hindi journalism and use of RTI for raising other issues in the college.
But as a rational person one cannot object to the plea of authorities that the matter is under investigation. So till the enquiry is on we can demand revocation of suspension of Arzoo Alam at the earliest so that he can study in peace. For this the ongoing enquiry should be completed expeditiously with fair opportunity to Arzoo to defend himself against the charges.
I have written the following letter. You can also write a similar letter if you approve. It should help the boy

"From: Ravinder Goel
Subject: Request for revocation of suspension of student of your college- Aarju Alam
To: principal@brambedkarcollege.org
Cc: vc@du.ac.in, dean_colleges@du.ac.in, dsw@du.ac.in
Date: Sunday, May 6, 2012, 12:53 PM

Dr. G.K Arora
Principal
Bhimrao Ambedkar College
Delhi.
Subject- Request for revocation of suspension of student of your college- Aarju Alam, BA (Hons.) Hindi Journalism and Mass Communication !st Year Roll no. 4018.

Respected Sir,
It has come to my knowledge that the college has suspended the above named student ‘ for the act of indiscipline during Motivational Talk held on 15 march 2012 in the college auditorium and misbehaving with non teaching staff on duty.’ But information available on net says that the student is denying the allegation, and maintains ‘an independent inquiry should be set up. CCTV footages should be seen by those inquiring. If they find I am fault, I will drop out myself”
I feel that continuing the suspension of a student at exam time is playing with his career and therefore request you to revoke the suspension of Aarju Alam at the earliest so that he can study jn peace I hope you will appreciate that students and their families take great trouble these days to be able to get admission in Delhi University.
With best Regards
Ravinder Goel
Associate Professor
Satyawari College Eve.
Copy to:
1. Prof. Dinesh Singh, VC, Delhi University
2. Prof. Sudhish Pachauri. Dean Colleges, Delhi University
3. Prof. JM Khurana , Dean Students Welfare, Delhi University
With request to intervene and ensure justice to the student

Ravinder Goel
106 Vaishali
Pitampura
Delhi-110088
Tel: (R) 42455072, 981134338