गुरुवार, 29 मार्च 2012

'माय नेम इज़ खान...और मैं हीरो जैसा नहीं दिखता...'

जेएनयू में इरफान खान
इरफान खान का जेएनयू आना ऐसा नहीं था जैसे सलमान खान किसी मॉल में आएं और भगदड़ मच जाती हो। भीड़ थी, मगर अनुशासन भी था। वो ख़ुद चिल्लाने के लिए कम और एक संजीदा एक्टर को सुनने का मूड बनाकर ज़्यादा आई थी। करीब दो घंटे तक इरफान बोलते रहे और एक बार भी धक्कामुक्की या हूटिंग जैसी हरकतें नहीं हुईं। इस भीड़ में मैं इरफान से दस क़दम की दूरी पर अपनी जगह बना पाया था। मैं उस पान सिंह तोमर को नज़दीक से देखने गया था जिसने चौथी पास एक फौजी के रोल में बड़ी आसानी से कह दिया कि ‘सरकार तो चोर है, इसीलिए हम सरकारी नौकरी के बजाय फौज में आए।’ और ये भी कि, ‘बीहड़ में बाग़ी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में’। गर्मी के मौसम में भी गले में मफलर लटकाए इरफान सचमुच बॉलीवुड की भेड़चाल से अलग दिखते हैं। जेएनयू की उस भीड़ में ही मौजूद कुछ लड़कियों की ज़ुबान में कहें तो ‘अरे, ये तो कहीं से भी हीरो जैसा नहीं लगता।’

सचमुच, इरफान हीरो जैसा कम और एक हाज़िरजवाब युवा ज़्यादा लगने की कोशिश कर रहे थे। जेएनयू में पान मिलता नहीं, मगर बाहर से मंगवाकर पान चबाते हुए बात करना शायद माहौल बनाने के लिए बहुत ज़रूरी था। एकदम बेलौस अंदाज़ में इरफान ने लगातार कई सवालों का जवाब दिया। जैसे अपने रोमांटिक दिनों के बारे में, कि कैसे वो दस-पंद्रह दिनों तक गर्ल्स हॉस्टल में रहने के बाद पकड़े गए और उनके खिलाफ हड़ताल हुई। या कि ‘हासिल’ के खांटी इलाहाबादी कैरेक्टर में ढलने के लिए उन्हें कैसे तजुर्बों से गुज़रना पड़ा। हालांकि, राजनीति या सिनेमा पर पूछे गए कई सीरियस सवालों पर अटके भी और हल्के-फुल्के अंदाज़ में टाल भी गए।

हाल ही में रिलीज़ हुई पान सिंह तोमर में इरफान की एक्टिंग ने उन्हें बॉलीवुड के मौजूदा दौर के सबसे बड़े अभिनेताओं में शामिल कर दिया है। वो एक सेलेब्रिटी तो नहीं, मगर आम और खास दोनों तरह के दर्शकों में बेहद पसंद किए जाने लगे हैं। उनकी आवाज़ की गहराई, बोलने का अंदाज़ और हाज़िरजवाबी जैसे जेएनयू की उस शाम दिखी, वो फिल्मी पर्दे से बिल्कुल अलग नहीं लगी। वो हर जगह एक जैसे ही नज़र आते हैं। हद तक नैचुरल दिखने वाले एक एक्टर। माइक बार-बार ख़राब होने, जेएनयू के सिर के ऊपर से दर्जनों बार हवाई जहाज़ के गुज़रने और जैसे-तैसे सवालों से दो घंटे तक टकराते हुए भी चेहरे पर कोई फिज़ूल का उतार-चढ़ाव नहीं था।

इरफान को सिनेमा में पहचान दिलाने वाले आज के दौर के सबसे काबिल निर्देशक तिग्मांशु धूलिया भी यहां पहुंचने वाले थे, मगर किसी वजह से नहीं आ सके। वो आते तो सिनेमा पर कुछ और सवाल सुनने को मिल सकते थे, और सटीक जवाब भी। दरअसल, मेरे वहां पहुंचने की ख़ास वजह तिग्मांशु को ही एक नज़र नज़दीक से देखना था। एक एक्टर से ज़्यादा ज़रूरी मुझे हमेशा से एक निर्देशक लगता है।

बहरहाल, सिर्फ इरफान के साथ भी भीड़ जमी रही, जिन्होंने बड़ी इमानदारी से कई सवालों पर अपनी राय रखी। इरफान ने कहा कि उन्हें अपने साथ लगा ‘ख़ान’ का टैग किसी बोझ जैसा लगता है। उनका बस चले तो वो अपने नाम से इरफान भी हटाना चाहेंगे और उस घास की तरह सूरज की रोशनी महसूस करना चाहेंगे जिसकी पहचान सिर्फ ज़मीन से जुड़ी होती है। आखिर-आखिर तक प्रोग्राम खिंचने लगा था। हालांकि कार्यक्रम के मॉडरेटर और अविनाश दास और प्रकाश सवालों को बढ़िया मिक्स कर रहे थे ताकि भीड़ वहां बनी रहे। हां, एकाध शुद्ध हिंदी में पूछे गए सवालों को मॉडरेटर साहब जिस तरह मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में मज़े ले-लेकर पढ़ रहे थे, वो भीड़ को भले गुदगुदा रहा था, मगर उस सवाल पूछने वाले को बड़ा हिंसक लग रहा होगा, जिसने दिल लगाकर अंग्रेज़ी होते जा रहे सेलिब्रिटी युग में अपनी भाषाई काबिलियत के हिसाब से एक बेहतर सवाल हिंदी में रखने की जुर्रत की थी।  थोड़ा सा अफसोस मुझे भी हुआ था, लेकिन भीड़ में हर एक का ध्यान तो नहीं रखा जा सकता। वो भी तब जब इरफान के पसंदीदा लेखक कोई और नहीं हिंदी साहित्य के सबसे लोकप्रिय नामों से एक उदय प्रकाश रहे हैं।

(प्रोग्राम के ठीक बाद गंगा ढाबा पर तेलुगू दोस्त प्रदीप मिले तो मैंने बड़ी उत्सुकता से बताया कि आज इरफान ख़ान से मिलने-सुनने का मौका मिला। प्रदीप ने कहा, ‘ओके’...फिर कहा, ’लेकिन, ये इरफान ख़ान है कौन??’ मेरी खुशफहमी दूर हो गई कि बॉलीवुड पूरे भारत का सिनेमा है।)
 
निखिल आनंद गिरि

(ये लेख मोहल्लालाइव पर भी प्रकाशित हुआ है...)

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