मंगलवार, 24 मई 2011

एक असफल प्रेम कहानी और रद्दी की क़ीमत..

ईमानदार प्रेमियों की पहचान यही है कि वे सिर्फ प्रेमिका(ओं) के दिल में नहीं, उनके मां-बाप की गालियों में भी रहते हैं। ईमानदार प्रेमिकाओं की पहचान ये है कि वो इमरजेंसी के मौक़े पर अपने प्रेमियों को पहचानने से साफ इंकार कर दे। इससे प्रेम की उम्र तो बढ़ती ही है, ग़लतियों की गुंजाइश भी बनी रहती है। और फिर कोई रिश्ता बिना ग़लतियां किए लंबा खिंचे, मुमकिन ही नहीं।

ख़ैर, उसकी प्रेमिका न तो मां-बाप के साथ रहने की गलती कर रही थी और न ही उसके मां-बाप को ये पता था कि बेटी प्रेम जैसा वाहियात काम भी पढ़ने के अलावा सोच सकती है। मगर, ऐसा हुआ और दिन में कॉलेज की क्लासेज़ के बजाय वो दिल्ली की रातें ज़्यादा समझने लगे। कभी वो सॉफ्टी की डिमांड करती तो कभी चांद की। हर बार उसे कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देना पड़ता क्योंकि दिल्ली की रातों में सॉफ्टी कम ही हुआ करती थी और चांद पर एक रात में पहुंचना ज़रा मुश्किल था।

इस देश में प्रेम अब तक असामाजिक इसीलिए माना जाता रहा है क्योंकि केंद्रीय राजनीति में इसने अपनी अहमियत साबित नहीं की है। इसकी ठोस वजह ये है कि अब तक देश की राजनीति परिवारों के डाइनिंग टेबल से बाहर निकल ही नहीं पाई है। जिस दिन राजनीति से परिवार कम हुए तो निश्चित तौर पर प्रेम कहानियों के लिए रास्ते बनेंगे और फिर बिना गालियों-जूतों के संसद सुकून से चला करेगी। अगर देश के सभी युवा अपनी असफल प्रेम कहानियों को रद्दी के भाव भी बेचें तो कम से कम इतनी कमाई तो ही सकती है कि दो-चार गांवों का राशन इकट्ठा हो सके।

उसकी एक प्रेमिका सिर्फ इस बात से नाराज़ हो गई क्योंकि वो रोटियों में घी लगाकर नहीं खाता था। दरअसल, उसे रोटियों की गोल शक्ल देखकर सिर्फ प्रेमिका(एं) ही याद आतीं और वो घी लगाना भूल जाता। हालांकि, उसकी याद्दाश्त इतनी अच्छी थी कि उसे दूधवाले और पेपरवाले का महीनों पुराना हिसाब मुंह ज़बानी याद रहता।

एक दिन अखबार में ख़बर छपी कि दुनिया तबाह होने जा रही है। उन्हें भी लगा कि दुनिया तबाह हो जाएगी, इसीलिए तबाही के पहले दुनिया की सभी खुशियां आपस में बांट ली जाएं। उन्होंने एक-दूसरे से ख़ूब सारी बातें की, ख़ूब सारी फिल्में देखीं, ख़ूब सारा प्यार किया और ख़ूब सारे वादे किए। जब इन सबसे बोर होने के बाद भी प्रेमिका को लगा कि दुनिया अब भी ख़त्म नहीं हुई तो उसने प्रेमी को जी भरकर गालियां दीं। उसने कहा कि अखबार की ख़बर उसी की साज़िश थी और दुनिया कभी ख़त्म नहीं होने वाली। बहरहाल, ये रिश्ता यहीं पर ख़त्म हो गया। प्रेमिका ने अपने लिए दूसरी दुनिया ढूंढ ली। प्रेमी ने जो किया, वो जानना किसी अखबार पढ़ने से भी कम ज़रूरी है।

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 18 मई 2011

एक दिल का दर्द, दूजे की दवा होता रहा...

रात कमरे में न जाने क्या से क्या होता रहा,
अजनबी इक दोस्त हौले से ख़ुदा होता रहा...
सारे मरहम, सब दवाएं हो गईं जब बेअसर
एक दिल का दर्द, दूजे की दवा होता रहा...
चांद के हाथों ज़हर पीना लगा थोड़ा अलग,
यूं तो अपनी ज़िंदगी में हादसा होता रहा...
एक ज़िंदा लाश को उसने छुआ तो जी उठी..
रात भर पूरे शहर में मशवरा होता रहा...
पांव रखने पर ज़मीनों के बजाय सीढ़ियां...
शहर के ऊपर शहर, ऐसे खड़ा होता रहा
तुमको महफिल से गए, कितने ज़माने हो गए
फिर भी अक्सर आइने में, सामना होता रहा
घर के हर कोने में, भरती ही रही रौनक 'निखिल'
मां अकेली ही रही, बेटा बड़ा होता रहा.....

निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 9 मई 2011

एक साल की क़ीमत तुम क्या जानो वीसी जी...

जामिया का मास कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट शिफ्ट में काम करना नहीं सिखाता। जामिया ये भी नहीं कहता कि आप अपने सीनियर्स को सर कहें। फिर भी वहां से लोग निकलकर उन जगहों पर नौकरी करते हैं जहां सर बोलना और शिफ्ट में नौकरी करना बहुत ज़रूरी है। ये तब की बात है जब जामिया में एक एकैडमिक अदब हुआ करता था। मुशीरुल साहब जैसे वीसी हुआ करते थे। अब का जामिया अलग दिख रहा है। इन तस्वीरों के ज़रिए। हाजिरी पूरी करवाने जैसी टुच्ची बात के लिए छात्रों को भूख हड़ताल करना पड़े और इस झुलसाने वाली गर्मी में तीन दिन भी गुज़र जाएं तो तालिबानियों का दिल भी पसीज जाए....जामिया प्रशासन का मानना है कि इन स्टूडेंट्स  को अगर पूरी हाजिरी देकर पेपर देने दिए गए तो गलत ट्रेंड शुरू हो जाएगा....मगर, ये कौन सा ट्रेंड शुरू हुआ है कि स्टूडेंट्स के हितों को देखने की ज़िम्मेदारी जिसे सौंपी गई वो उसी के दरवाज़े के बाहर मरने को बेताब हैं और कोई पूछने तक नहीं आया, सिवाय रौब दिखाने वाली पुलिस के...

वो मरेंगे तब पसीजेगा आपका दिल वीसी जी?
बैठे-बैठे ही मिलेगा सेहरा-ए-क़ातिल वीसी जी?

उनके चेहरों में ज़रा बच्चों का चेहरा देखिए....
छीनकर बच्चों का हक़ क्या होगा हासिल वीसी जी?

नब्ज़ अब भी कह रही है, हम थे असली में बीमार,
हाजिरी में क्यूं नहीं करते हैं शामिल वीसी जी ?

कंपनी तो है नहीं कि बंद हो तो ग़म नहीं...
सोचिए तो मुल्क का भी, मुस्तकबिल वीसी जी?

आप तो अकबर भी हैं, ग़ालिब भी हैं आलमपनाह...
हरकतों से लग रहे हैं कैसे जाहिल वीसी जी ?

(वीसी साहब को गुस्सा क्यों आता है, ये भी बता दें….24 घंटे लगातार भूखे-प्यासे रहने के बाद प्रदर्शन कर रहे छात्रों को धूप बर्दाश्त नहीं हुई तो उन्होंने तिरपाल लगाने की कोशिश की ताकि थोड़ी छांव मिल सके….बस, वफादार गार्ड्स अपनी नौकरी बचाने के लिए जो कर रहे हैं, वो दिख ही रहा है…कुछ दिन पहले एक ख़बर में पढ़ा था कि वीसी साहब किसी प्ले में अकबर की भूमिका कर रहे हैं….शायद वो अब तक उस मुगलिया दरबार से निकल नहीं पाए हैं…उनके इशारे पर ही जामियानगर के एसएचओ सतबीर सिंह डागर गार्ड्स के बीच हीरो बनकर आए और छात्रों को वर्दी के रौब से धमकाने लगे…..रोहित वत्स, अराहाना और तीन साथियों को कॉलर से पकड़कर पुलिस अपने साथ ले गई, लेकिन ताज्जुब ये है कि उन्हें शाही ट्रीटमेंट दिया गया…ये सबूत है कि चतुर वीसी सतर्क हैं और हर क़दम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं…..ख़ैर, ‘आंदोलन’ जारी है और आज भी उनकी रात फुटपाथ पर ही गुज़रेगी….)

तस्वीरें यहां उपलब्ध हैं....

http://www.facebook.com/home.php#!/media/set/?set=a.10150240080502238.369562.769837237

मंगलवार, 3 मई 2011

एक उदास मौत और ख़ूबसूरत सपना...

सफेद पन्नों पर उसने ख़ून से कुछ लिखा और मर गया। पुलिस के पास जब ये ख़बर पहुंची तो उन्होंने मौत से दुखी हुए बिना अपनी ड्यूटी निभाई और लड़के के मां-बाप से मोटी रकम वसूल की ताकि बाहर बदनामी न हो। उसकी प्रेमिका(ओं) के पास जब ये ख़बर पहुंची तो उन्हें इस बेवकूफी पर कुछ समझ नहीं आया कि कैसे रिएक्ट करें। लिहाज़ा, उन्होंने शादी कर ली। कुल मिलाकर एक उदास मौत ने कई घरों को उजड़ने से बचा लिया। अवसाद एक ऐसा शब्द है जिसे इन मौकों पर ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। अवसाद कहीं भी किसी को हो सकता है। अगर कोई 50 साल की राजनीति के बाद भी प्रधानमंत्री न बन सके तो गहरा अवसाद लाज़िमी है। अगर किसी को सत्ता का स्वाद पहली बार चखने का मौका मिले और वो हर सड़क पर अपनी मूर्तियां ही लगवा बैठे तो इसे भी अवसाद की श्रेणी में रखा जा सकता है। किताबें पढ़पढ़कर क्रांति के नारे बुलंद करने वाले अचानक क्रांति के नाम पर किताबें बेचने लगें तो अवसाद घातक भी हो सकता है। दुनिया में जितनी क्रांतियां रोटी के लिए हुई, हो सकता है उससे कहीं ज़्यादा कांडम के लिए हों।
डिक्शनरी में तीन-चार शब्दों के एक ही मतलब होते हैं। ज़िंदगी में भी यही होता है। वक्त का मतलब सिर्फ गुज़र जाना ही नहीं होता है। वक्त का मतलब एक मजबूरी भी हो सकती है। रात के बारह बजे का वक्त हो तो ज़रूरी नहीं कि पूरा शहर एक दूसरे से प्यार ही कर रहा हो। किसी के पेट में दर्द हो सकता है और किसी को नींद नहीं आने की बीमारी में रोने का मन भी हो सकता है।
उस ख़ास वक्त  में वो भी सोया नहीं था। एक फोन आया तो उसने साफ-साफ एक नंबर देखा कि फोन आया है। बाद में एक मेसैज भी आया कि वेबकैम पर आओ। सच कहूं, तो उसे आने का बहुत मन था मगर ठीक उसी वक्त रोने का वक्त हुआ था। वो रोती आंखों के साथ ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत सपना नहीं देख सकता था।

निखिल आनंद गिरि