सोमवार, 18 अप्रैल 2011

एक शहर जहां प्रेम करना सबसे आसान था...

ऐतिहासिक और महान होने के गुमान में डूबे शहर की हैसियत बस इतनी थी कि बित्ते भर के ग्लोब में भी तिल भर ही जगह मिल सकी थी। इस शहर में जब कभी किसी को वक्त पर नींद आ जाती, पूरा शहर ताज्जुब में डूब जाता। हवाई जहाज से अगर शहर को कोई ग़रीब चित्रकार देखता तो उसे नदियां नालियां लगतीं और मकान शौचालय से भी छोटे। वो बजाय शहर को देखने के हवाई जहाज की खिड़की से नीले और उजले आसमान के बीच की इमेज बनाना बेहतर समझता क्योंकि वहां रंग भरने को काफी जगह थी।

इस शहर में कई मां-बाप चाहते थे कि उनके बच्चे इंजीनियर बनें, डॉक्टर बनें, वैज्ञानिक बन जाएं, मगर इतने अच्छे न बन जाएं कि प्रयोगशालाओं में उन्हीं पर रिसर्च शुरू हो जाए। हालांकि, मां-बाप अच्छे होने के लिए ही होते हैं मगर कुछ बेटे अपने मां-बाप को बेवकूफ भी समझते थे। इस शहर में पहले सर्कस लगता था मगर न तो अब शेर बचे थे और न ही वक्त कि सर्कस का मज़ा लोग ले पाते। हालांकि, शहर में तरह-तरह के आंदोलन होने लगे थे जो मन बहलाने के नए अड्डे थे। लोग नौकरी की शिफ्ट खत्म करने के बाद क्रांति करने निकल पड़ते थे। क्रांति एक ऐसी चमकीली और आसान चीज़ उन्हें लगती जैसे पार्कों में प्रसाद की तरह बंटने वाले चुंबन।

मेट्रो जब पूरे रफ्तार में होती तो शहर किसी फिल्म की तरह आगे बढ़ता जाता। शहर के कई हिस्से उसने यूं ही देखे थे। जहां ट्रेन रुकती, वहां खूब सारे लोग सवार हो जाते। वो उनकी टी-शर्ट पर लिखे नारे पढ़ता और शहर के बारे में राय बनाने लगता। उसे कभी-कभार ये भी लगता था कि टीशर्ट पहने हुए पूरा शहर किसी मोबाइल कंपनी की हुकूमत में जी रहा है। मेट्रो का सफ़र खत्म हो जाता, शहर के छोर खत्म हो जाते, मगर मोबाइल पर बातें ख़त्म नहीं होती थीं। इस शहर में सब लड़के एक जैसे स्मार्ट थे और सारी लड़कियां एक जैसी ख़ूबसूरत। ये प्रेमियों और प्रेमिकाओं के लिए बेहद आसान शहर था, जहां प्यार की कुछ ख़ास तारीखों को जवान लाशें मिलनी तय थीं।

इस शहर में उसकी प्रेमिका भी अजीब थीं। वो अपने कुर्ते के साथ दुपट्टा कभी नहीं लेती थी। उसे कभी लगा ही नहीं कि दुपट्टा उसकी प्रेम कहानी का विलेन भी बन सकता है। शहर ये समझता कि खुले विचारों वाली लड़की है, इसीलिए दुपट्टे के बगैर चलती है, मगर असल में वो इतनी डरपोक थी कि उसे लगता एक दिन इसी दुपट्टे का फंदा बनाकर मर जाना होगा। उसके लिए प्रेमिकाएं कनफेशन बॉक्स की तरह थी, जिनके सामने बस अपराध कबूले जा सके थे। बदले में ढेर सारी सांत्वना मिलती जिसे अंधेरे में प्रेम समझ लेना स्वाभाविक था।

निखिल आनंद गिरि

9 टिप्‍पणियां:

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

uff yaar nikhil bhai...bakhiya udhed di.....

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

विचलित हो गया हूँ.. कई प्रेमिकाएं सामने आँखों के नाच रही हैं... टिप्पणी बाद में करूँगा..

Sonal Rastogi ने कहा…

aapke saath is shahar ko jeena achha laga

pooja ने कहा…

क्रांति एक ऐसी चमकीली और आसान चीज़ उन्हें लगती जैसे पार्कों में प्रसाद की तरह बंटने वाले चुंबन।
मेट्रो का सफ़र खत्म हो जाता, शहर के छोर खत्म हो जाते, मगर मोबाइल पर बातें ख़त्म नहीं होती थीं.
असल में वो इतनी डरपोक थी कि उसे लगता एक दिन इसी दुपट्टे का फंदा बनाकर मर जाना होगा.

अच्छा लिखा है निखिल, कटाक्ष के साथ. बधाई.

डॉ .अनुराग ने कहा…

तुम गध ही लिखा करो....कमाल का लिखते हो.....कविताओं से ज्यादा सटीक

Abhishek Ojha ने कहा…

उफ़ ! बहुत सही.

Prem Chand Sahajwala ने कहा…

Wonderful description. A new way of picturising Delhi.

रूप ने कहा…

pahli baar aapko tippani kar raha hun , wo bhi roman me , shayad aap barsasht kar len , wakyi , blogging faltu ka time paas nahi hai , aapki chhoti si dukan bhi bhavyata ka bhan karati hai , kabhi bande ke ghar bhi tashref layen , shayad aapse kuchh milta julta hai, lekin padya me !waise mul baat par aata hun BAHUT ACHCHHA LIKHTE HAIN ! BADHAI !

दीपक बाबा ने कहा…

@ये प्रेमियों और प्रेमिकाओं के लिए बेहद आसान शहर था, जहां प्यार की कुछ ख़ास तारीखों को जवान लाशें मिलनी तय थीं।

इस पोस्ट पर एक शब्द 'उफ्फ्फ'

और हाँ डॉ अनुराग की बात सत्य है, गद्य ही लिखें तो बेहतर होगा..
वैसे मेरा सलाह देना बच्चे कि जिद्द मानी जाये :)