गुरुवार, 25 नवंबर 2010

रात, चांद और आलपिन....

अभी बाक़ी हैं रात के कई पहर,


अभी नहीं आया है सही वक्त

थकान के साथ नींद में बतियाने का....

उसने बर्तन रख दिए हैं किचन में,

धो-पोंछ कर...

(आ रही है आवाज़....)

अब वो मां के घुटनों पर करेगी मालिश,

जब तक मां को नींद न आ जाए..

अच्छी बहू को मारनी पड़ती हैं इच्छाएं...

चांदनी रातों में भी...

कमरे में दो बार पढ़ा जा चुका है अखबार....

उफ्फ! ये चांदनी, तन्हाई और ऊब...


पत्नी आती है दबे पांव,

कि कहीं सो न गए हों परमेश्वर...

पति सोया नहीं है,

तिरछी आंखों से कर रहा है इंतज़ार,

कि चांदनी भर जाएगी बांहों में....

थोड़ी देर में..

वो मुंह से पसीना पोंछती है,

खोलती है जूड़े के पेंच,

एक आलपिन फंस गई है कहीं,

वो जैसे-तैसे छुड़ाती है सब गांठें

और देखती है पति सो चुका है..

अब चुभी है आलपिन चांदनी में...

ये रात दर्द से बिलबिला उठी है....


सुबह जब अलार्म से उठेगा पति,

और पत्नी बनाकर लाएगी चाय,

रखेगी बैग में टिफिन (और उम्मीद)

एक मुस्कुराहट का भी वक्त नहीं होगा...


फिर भी, उसे रुकना है एक पल को,

इसलिए नहीं कि निहार रही है पत्नी,

खुल गए हैं फीते, चौखट पर..

वो झुंझला कर बांधेगा जूते...

और पत्नी को देखे बगैर,

भाग जाएगा धुआं फांकने..


आप कहते हैं शादी स्वर्ग है...

मैं कहता हूं जूता ज़रूरी है...

और रात में आलपिन...


निखिल आनंद गिरि

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19 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

मै कहूँगा इसे निखट सच .....

आज की अब तक पढ़ी गयी सबसे बेहतरीन ....

विश्व दीपक ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
विश्व दीपक ने कहा…

इसमें कहीं कोई लाग-लपेट नहीं है.. आपने बड़े हीं सीधे शब्दों में अच्छी बहुओं और अच्छे पतियों (बेटों) के दर्द को अपनी आवाज़ दी है।

"आलपिन" का बिंब अच्छा लगा।

बधाई स्वीकारें!
-विश्व दीपक

वन्दना ने कहा…

बेहद कटु सत्य को बहुत ही सहजता से उतार दिया है…………निशब्द कर दिया।

दिपाली "आब" ने कहा…

bechari patniyaan kitna kuch kar lein, patiyon ki ek nazar ko hi tarsengi aur jhelengi jhunjhlahat
Joota zaruri hai, palat kr dekhne mein der ho jaati hai, jhunjhlane mein waqt nhi lagta..haha

निर्मला कपिला ने कहा…

अच्छी बहू को मारनी पड़ती हैं इच्छाएं...

चांदनी रातों में भी...
ाउर पति का दर्द तो केवल उसका ही दर्द है पत्नि को इसे भी पीना पडता है। यही ज़िन्दगी है। बहुत अच्छी भावमय रचना। बधाई।

सागर ने कहा…

आपका प्रोफाइल ही शानदार है... मज़ा आ गया... बातें भी सुलझी उलझी है... अफ़सोस है पहले क्यों नहीं जुड़ा... लिखिए अब पढूंगा... लगातार

aniruddha ने कहा…

बहुत ही बढ़िया निखिलजी. खालिस सच है...घर में सबके साथ रहते कई बार तो पता ही नहीं चलता की हम शादीशुदा हैं...और तो छोडिये, बातें भी मुश्किल से ही हो पाती हैं.

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

सागर भाई,
शुक्रिया....आते रहिए....अच्छा लगेगा...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

Bahut sunder....sach ko saamne rakhte manobhavon ko shabdon me dhala.... khoob...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

Bahut sunder....sach ko saamne rakhte manobhavon ko shabdon me dhala.... khoob...

saanjh ने कहा…

अभी बाक़ी हैं रात के कई पहर,


अभी नहीं आया है सही वक्त

थकान के साथ नींद में बतियाने का....


tooooooo good


अच्छी बहू को मारनी पड़ती हैं इच्छाएं...

चांदनी रातों में भी...


hmm hmmm.......
;)

अब चुभी है आलपिन चांदनी में...

ये रात दर्द से बिलबिला उठी है....


killer....!!! kahan se chun kar laate ho aisi lines....kya baat...kya baat...kta baat !
;)



आप कहते हैं शादी स्वर्ग है...

मैं कहता हूं जूता ज़रूरी है...

और रात में आलपिन...


shaadi....swarg...!!! not really.....museebat hai museebat...is se zada kuch nahin kahungi is baare mein, kyunki shuru ho gayi to blog overload ho jaayega :P

Shah Nawaz ने कहा…

आप कहते हैं शादी स्वर्ग है...
मैं कहता हूं जूता ज़रूरी है...
और रात में आलपिन...


यथार्थ के धरातल पर लिखी हुई एक बहुत ही बेहतरीन रचना है... निखिल जी, जितनी भी तारीफ करूँ कम हैं.

आप कहते हैं शादी स्वर्ग है...
मैं कहता हूं जूता ज़रूरी है...
और रात में आलपिन...


यथार्थ के धरातल पर लिखी हुई एक बहुत ही बेहतरीन रचना है... निखिल जी, जितनी भी तारीफ करूँ कम हैं.



प्रेमरस.कॉम

himani ने कहा…

शादी को झुक्लाने का और
इस पर झुंझलाने का कोई मौका नही छोड़ते आप
तर्क दुरुस्त हैं लेकिन चांदनी रातों में
सिर्फ आलपिन का ही अन्हुभाव न याद रखे गुलाबों की महक को भी सराहा जा सकता है

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA ने कहा…

उफ्फ! ये चांदनी, तन्हाई और ऊब..


सच - कितना दुष्कर है.....

सतीश पंचम ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है।

बहुत पसंद आई।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

ओह ! तो आपका भई ब्लॉग है !
...कविता पसंद आई।

अल्पना वर्मा ने कहा…

बड़ी सादगी से प्रस्तुत की गयी स्त्री मन की जटिल स्थिति .
बहुत अच्छी कविता

Mired Mirage ने कहा…

गजब की कविता है.किन्तु क्या कहीं अच्छी सास या माँ नहीं पाई जाती? या बहू आते से ही घुटने के दर्द व असंवेदनशीलता का भी आगमन हो जाता है?
घुघूती बासूती