शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

ये चांद ऊंघने लगे हैं..

आओ फूट कर रो लें,
ये धुंधला वक्त धो लें,
बहुत ही खुशनुमा-सी सुबह है,
ज़रा-सा ग़मज़दा हो ले

चिकोटी काट लें, छेड़ें किसी को,
बना लें दोस्त फिर से ज़िंदगी को,
किसी अनजान रस्ते पर चलें,
भटकें, गुमशुदा हो लें

बहुत हैं प्यार के शोशे,
वहीं बोरिंग छुअन-बोसे,
जुगलबंदी दो जिस्मों की,
सांसों की गिरह खोलें...

समंदर पी गए कब के,
बुझे शोले कहां लब के,
उलट दें सब नदी-दरिया,
फिर से बुलबुला हो लें...

ये दस्तक, फिर खुशी है !
इधर बस बेबसी है....
बुला लो, दो घड़ी भर
हंसे, बतियाएं, बोलें....

बहुत से रतजगे-हैं,
ये चांद ऊंघने लगे हैं....
ज़रा-सी मौत दे दो,
हम भी नींद सो लें...

निखिल आनंद गिरि

11 टिप्‍पणियां:

Deepali Sangwan ने कहा…

outstanding.. Brilliant, mind bolwing.. Jyada nhi keh paungi..haha

शारदा अरोरा ने कहा…

kavita ki panktiyan bahut khoobsoortee se shuru hueen magar beech me mijaj kuchh badal sa gaya . akhiri pankti sona marna nahi hona chahiye ...likhne vale ka faisla hi antim hota hai ...

hardik mehta ने कहा…

badhiya! infact mujhe last line bahut pasand aayi!

M VERMA ने कहा…

समंदर पी गए कब के,
बुझे शोले कहां लब के,

प्यार के दो बोलों से बुझेंगे
ये शोले तो शोलों से बुझेंगे

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

बहुत दिनों बाद निजी ब्लॉग पर सक्रिय हुआ हूं....चार प्रतिक्रियाएं आ गईं, बड़ी खुशी हुई...आते रहिए, हमारी दुकान चलती रहेगी.....

संजय भास्कर ने कहा…

Brilliant, mind bolwing.

सजीव सारथी ने कहा…

बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा पढ़ा है...और फोटो भी शानदार है....हमें कब ले चल रहे हो वहाँ :)

Namrata ने कहा…

Really really nice poem...captures the situation (mood) in very precise words :)

तपन शर्मा ने कहा…

पहली बार बुरा-भला पर आया हूँ निखिल...
मेरी पसंदीदा पंक्तियाँ:

आओ फूट कर रो लें,
ये धुंधला वक्त धो लें,

बहुत से रतजगे-हैं,
ये चांद ऊंघने लगे हैं....
ज़रा-सी मौत दे दो,
हम भी नींद सो लें..

लिखते रहिये...

nazish ने कहा…

chand oonghne lge hain,ye dhundhla waqt dho le, chikoti kaat le chhede kisi ko.. chikoti word comon ni hai. boring chhuan - bose,jugalbndi do jismo ki.. bahot badhiya! kafi unusual cheezein use ki gyi hain.. li'l near to gulzar.

pawas ने कहा…

waah..