रविवार, 15 दिसंबर 2013

मेरा गला घोंट दो मां

किसी धर्मग्रंथ या शोध में लिखा तो नहीं,

मगर सच है...

प्यार जितनी बार किया जाए,

चांद, तितली और प्रेमिकाओं का मुंह टेढ़ा कर देता है..

एक दर्शन हर बार बेवकूफी पर जाकर खत्म होता है...


आप पाव भर हरी सब्ज़ी खरीदते हैं

और सोचते हैं,  सारी दुनिया हरी है....

चार किताबें खरीदकर कूड़ा भरते हैं दिमाग में,

और बुद्धिजीवियों में गिनती चाहते हैं...

आपको आसपास तक देखने का शऊर नहीं,

और देखिए, ये कोहरे की गलती नहीं...


ये गहरी साज़िशों का युग है जनाब...

आप जिन मैकडोनाल्डों में खा रहे होते हैं....

प्रेमिकाओं के साथ चपड़-चपड़....

उसी का स्टाफ कल भागकर आया है गांव से,

उसके पिता को पुलिस ने गोली मार दी,

और मां को उठाकर ले गए..

आप हालचाल नहीं, कॉफी के दाम पूछते हैं उससे...


आप वास्तु या वर्ग के हिसाब से,

बंगले और कार बुक करते हैं...

और समझते हैं ज़िंदगी हनीमून है..

दरअसल, हम यातना शिविरों में जी रहे हैं,

जहां नियति में सिर्फ मौत लिखी है...

या थूक चाटने वाली ज़िंदगी.....


आप विचारधारा की बात करते हैं....

हमें संस्कारों और सरकारों ने ऐसे टी-प्वाइंट पर छोड़ दिया है,

कि हम शर्तिया या तो बायें खेमे की तरफ मुड़ेंगे,

या तो मजबूरी में दाएं की तरफ..

पीछे मुड़ना या सीधे चलना सबसे बड़ा अपराध है...


जब युद्ध होगा, तब सबसे सुरक्षित होंगे पागल यानी कवि...

मां, तुम मेरा गला घोंट देना

अगर प्यास से मरने लगूं

और पानी कहीं न हो...


निखिल आनंद गिरि
(पाखी के दिसंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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15 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

हालात का जीता जागता चित्रण कर दिया।

sada ने कहा…

बहुत सही ...।

Poorviya ने कहा…

मां, तुम मेरा गला घोंट देना

neelam ने कहा…

हमें संस्कारों और सरकारों ने ऐसे टी-प्वाइंट पर छोड़ दिया है,

कि हम शर्तिया या तो बायें खेमे की तरफ मुड़ेंगे,

या तो मजबूरी में दाएं की तरफ..

पीछे मुड़ना या सीधे चलना सबसे बड़ा अपराध है...



"माँ ही याद आती है जब आप सबसे बड़ी किसी मुसीबत में हो ..पर हमारा अनुभव कुछ अलग ही है...पता नहीं क्यूँ माँ की जगह भी पिता ही खड़े मिला हमेशा ...... सबसे बड़ी त्रासदी आज की" पीपली लाइव "की तरह हर इंसान को उदेलित कर रही है "
.तुम्हारी कविता गहरा मंथन करने को मजबूर करती है .............

मनोज कुमार ने कहा…

हमें संस्कारों और सरकारों ने ऐसे टी-प्वाइंट पर छोड़ दिया है,

कि हम शर्तिया या तो बायें खेमे की तरफ मुड़ेंगे,

या तो मजबूरी में दाएं की तरफ..

पीछे मुड़ना या सीधे चलना सबसे बड़ा अपराध है...

भाई आप कमाल का लिखते हो!!

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

हमें संस्कारों और सरकारों ने ऐसे टी-प्वाइंट पर छोड़ दिया है,

कि हम शर्तिया या तो बायें खेमे की तरफ मुड़ेंगे,

या तो मजबूरी में दाएं की तरफ..

पीछे मुड़ना या सीधे चलना सबसे बड़ा अपराध है...


jabardast soch .....bahut dhaansu likhte ho.

haapy new year.

विश्व दीपक ने कहा…

निखिल जी, आपने भविष्य में "क़ोट" करने के लिए कुछ पंक्तियाँ दे दीं हैं हमें.. इसे "ऐतिहासिक" रचना कहना अतिशयोक्ति न होगी..

कथित बुद्धिजीवियों और "जांबाज" कवियों की पोल आपने बड़ी हीं चालाकी से अंतिम पंक्तियों में खोल दी है। और क्या कहूँ... लगे रहिये... बस "गला घोंटने" की अपील न कीजियेगा.. आपको ज़िंदा रहना है..

-विश्व दीपक

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

शुक्रिया वीडी भाई....

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

शुक्रिया वीडी भाई....

डॉ .अनुराग ने कहा…

गौरव के बाद तुम्हे पढना ....लगभग दो जुदा ख्यालो से गुजरना है ...जिनकी पञ्च लाइन एक सी है ...आत्मा भी ....

दिन की दूसरी सबसे behtreen कविता padhi है .......

ravi_journalist@yahoo.com ने कहा…

nirasha me kya romance ho saktata ye janna hai to ye kavita padhe, halke se zor ke tamache ko mehsus karna hai to ye kavita padhe.......kheeja hua kavi...kya kya likh sakta hai....ye janna hai to ye kavita padho....good one

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

निखिल... साल की सुन्दर कविता... लगता है मेरी बात कही गई है...

रंजना ने कहा…

निःशब्द ,निरुत्तर करती, आइना दिखाती कविता...

कुछ कहने लायक मनस्थिति नहीं छोडी इसने...क्या कहूँ...

बेजोड़ लाजवाब रचना !!!!

राकेश पाठक ने कहा…

बहुत खूबसूरत...जितने बदसूरत हालात हैं...

Meynur ने कहा…

Very touchy indeed!