शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

जो बच पाता है..

जब सो रहा होता है आसमान,
धरती ओढ़ लेती है आसमान की चादर..
जाग रहे होते हैं तारे,
बतिया रहे होते हैं चुपचाप
मौन के सहारे |

चिड़िया ओढ़ लेती है पंख
और बतियाती है सूनेपन के साथ..
समंदर ओढ़ लेता है गहराई,
और बतियाता है शून्य से..
दीवारें ओढ लेती हैं अकेलापन,
और बतियाती हैं खालीपन से..

एक  उम्र ओढ लेती है चिड़चिड़ापन..
और बतियाती है पुरानी आवाज़ों से
अथाह वीरानों में |

रिश्ते ओढ लेते हैं चेहरे,
और बतियाते हैं तारों की भाषा में..
कभी अचानक भीड़ बन जाते हैं चेहरे,
और फूलने लगती है मौन की सांसें..
रिश्ते उतारकर भागने लगते हैं लोग..

क्या बचता है उन रिश्तों के बीच
जहां होता है सिर्फ निर्वात..
जहां ज़िंदा आवाज़ें गुज़र नहीं पातीं,
और सड़ांध की तरह फैलता जाता है मौन..

निखिल आनंद गिरि

5 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
अभिव्यक्ति......

बेनामी ने कहा…

PADHKAR ESA LAGA JASE 'JINDAGI' KO PURI KOSHISH KARKE BLACK & WHITE CHSME SE DEKHTE HAIN AAP.
eK bhi kavita me foolon ki mahak nhi, savere ki tazgi nhi, dophar ki raunak ya sanjh ki shalinta nhi, bas june ki beswad dopahriyan hi hain.
blackboard hai, manti hoon; par kahin kahin hai rangeen chitrkari Uski.

nikhil anand Giri ने कहा…

Anonymous hokar acchi salaah nahi deni chahiye.. Shukriya

ravi_journalist@yahoo.com ने कहा…

good one

bimlendu kumar ने कहा…

निखिल जी हम तो आपके मुरीद हैं। आपको याद होगा आप तिवारी जी के साथहमारे घर आये थे और आपने कहा था थी मै भी कुछ लिखूं। मैंने भी अब समय निकलकर लिखना शुरू किया है। मेरा ब्लॉग है http://doboondkavita.blogspot.com