गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

रिश्तों की तरह होती हैं कुछ कविताएं...

हमारी चुप्पियों के बीच पुल की तरह था मुस्कुराना....
जिस पर आराम से तैरता रहा एक रिश्ता...
तुम किसी सूरज की तरह,
उग आती आधी रात में भी...
और मेरी सुबह थोड़ी लंबी हो जाती...
जैसे कुछ कविताएं अधूरी हैं तो सिर्फ इसीलिए,
कि भूल जाता हूं कई बार तुम्हारे नाम का मतलब
वैसे ही कई रातें इसीलिए अधूरी...
कि उगा ही नहीं मेरा सूरज...

वो धुन याद ही होगी,
जो आधी रात में ट्रेन हमें सुनाकर गुज़र जाती..
और तुम खिड़कियां बंद कर लेतीं...
हम जागते देर तक नींद में...

समंदर की लहरों ने नहीं देखी समंदर की गहराई,
मगर एक रिश्ता तो है...
सूरज की किरणों ने सूरज के सीने में झांककर भी नहीं देखा...
मगर तपिश है
गुनगुनी धूप है धरती पर...

कभी ट्रेन की खिड़की से दिख जाती हैं किताबें,
जिन्हें पढ़ नहीं पाते...
मगर याद रहती हैं तस्वीरें...
और हम सोचते रहते हैं यात्रा भर,
किताबों की लिखावट, मुलायम पन्ने वगैरह वगैरह....

रिश्तों की तरह होती हैं कुछ कविताएं...
मजबूरन ख़त्म करनी पड़ती है...
कविताओं की तरह होते हैं कुछ रिश्ते
बार-बार पढकर रुलाई आती है...

निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

मौत को क़रीब से देखना हो तो ''टाइटैनिक'' देखिए...

मौत को क़रीब से देखना हो तो 'टाइटैनिक' देखिए। थ्रीडी चश्मे से और करीब दिखती है मौत। एकदम माथे को चूमती हुई। सौ साल पुराना एक हादसा। हादसा क्या पूरा का पूरा प्रलय ही।
पिछली बार जब टाइटैनिक देखी थी तो स्कूल में था। कम से कम 14 साल पहले। किताब में टाइटैनिक का नाम सुना था और एक नंबर पाने के लिए इसके डूबने की तारीख भी याद थी। तब न थ्री डी के बारे में कुछ मालूम था और न मॉल या मल्टीप्लेक्स के बारे में। जुगाड़ से कुछ दोस्तों ने फिल्म देखी थी और बताया था कि टाइटैनिक इसीलिए देखनी चाहिए कि फिल्म का हीरो केट विंसलेट को न्यूड पेंट करता है और बहुत बड़े जहाज़ के किनारे समंदर की ऊंचाई पर खड़े होकर कुछ अच्छे रोमांटिक सीन भी हैं। वही सीन जो बाद में शाहरुख  बार-बार बांहें लहराकर बॉलीवुड की फिल्मों में दोहराते हैं और किंग खान बन जाते हैं। इस बार इसके आगे की टाइटैनिक देखने के लिए गया था।

फिल्म देखते हुए कई बार लगा जैसे हम भी सौ साल पहले उस जहाज़ में सवार हों। यही सिनेमा की सफलता है कि आपको किसी दूसरे टाइम और स्पेस से उठाकर अपने मनचाहे स्पेस में थोड़ी देर के लिए फिट कर दे। भोपाल गैस हत्याकांड से लेकर सुनामी, भुज और गोधरा, सब हिंदुस्तान में हुए, मगर मौत का इतना विराट, इतना महीन विश्लेषण अब तक किसी हिंदी (भारतीय) सिनेमा में कम देखा है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो मौत की कसौटी पर भी दम नहीं तोड़ती। जेम्स कैमरून की सबसे उदास कविता है टाइटैनिक। दो प्रेमियों को जब सागर आगोश में लेने ही वाला होता है, तब भी वो एक-दूसरे पर भरोसे का वादा दोहराते हैं। ये एक ऐसी अद्भुत कल्पना है जिसे वही महसूस कर सकता है, जिसने शिद्दत से किसी की कमी महसूस की हो। और फिर काले चश्मे के भीतर से इस अहसास को जीने का सबसे बड़ा फायदा ये भी है कि कोई रोते हुए भी नहीं पकड़ सकता।

पूरी फिल्म ही अद्भुत पेंटिंग की तरह है। समंदर की भूख टाइटैनिक को निवाला बनाने ही वाली होती है तो कैमरुन एक बुज़ुर्ग जोड़े को एक साथ लिपटकर रोते दिखलाते हैं। और फिर बच्चों को कहानियां सुनाकर अनंत काल के लिए सुलाती मां। और डूबतेृ-डूबते मौत की आखिरी धुन बजाते वो अमर कलाकार। टाइटैनिक के डूबने से सिर्फ एक जहाज ही नहीं डूबा, 'एलिट' महत्वाकांक्षाओं का वो किला भी डूब गया, जिसपर आज भी पूरी दुनिया ताज्जुब करती है मगर बाज़ नहीं आती।
आपको मौक़ा मिले तो एक बार टाइटैनिक ज़रूर देखिए। अगर पहले देख रखी हो तब भी देखिए। देखिए कि जिन उजालों के भरम में हम जिस रफ्तार से सूरज की तरफ भागते चले जा रहे हैं, वो पलक झपकते अंधा बना सकती हैं।
अच्छा हुआ, थ्रीडी का चश्मा मॉल के भीतर ही वापस रख लिया। बाहर दुनिया की बारीकियां इतनी क़रीब से दिख जाएं तो आदमी सौ बार ख़ुदकुशी कर ले।


चलते-चलते गुलज़ार की ये नज़्म भी गुनगुनाते चलें


मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको


निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

लेखकों की रचनाओं की चोरी की एफआईआर तक दर्ज नहीं होती...

जयप्रकाश चौकसे
सलीम-जावेद की लिखी ‘जंजीर’ ने अमिताभ बच्चन को सितारा बनाया, प्रकाश मेहरा की कंपनी को ठोस आर्थिक आधार दिया और कालांतर में यह कल्ट फिल्म मानी गई। इसी फिल्म से आक्रोश की मुद्रा बॉक्स ऑफिस पर ऐसे सिक्के के रूप में चल पड़ी कि आज तक लोग उसे भुना रहे हैं। इतना ही नहीं, इसी आक्रोश ने अन्य फिल्मकारों को भी एक रास्ता बताया और इसी के विविध रूप हिंदुस्तानी सिनेमा में छा गए हैं। गोविंद निहलानी की ‘अर्धसत्य’ भी इसी का उनका अपना संस्करण है। सच तो यह है कि राजकुमार संतोषी की ‘घायल’, ‘घातक’ ही नहीं, वरन् आज की ‘दबंग’ छवि भी उसी आक्रोश के हंसोड़ संस्करण हैं।


अब प्रकाश मेहरा के सुपुत्र अपूर्व लखिया नामक निर्देशक के साथ ‘जंजीर’ का नया संस्करण बनाने जा रहे हैं। ये तमाम लोग अमिताभ बच्चन और जया से आशीर्वाद लेने जा रहे हैं, जबकि नए संस्करण में अमिताभ के अभिनय को नहीं दोहरा रहे हैं। आप मूल फिल्म की पटकथा पर फिल्म बना रहे हैं और उसमें जो भी परिवर्तन करेंगे, वह मूल की छवि को बिगाड़ देंगे। सारे नए संस्करणों में कलाकार नए होते हैं, उनकी व्याख्या भी अलग होती है और संगीत भी अलग होता है, परंतु पटकथा का आधार नहीं बदलते और सारे पंच संवाद भी दोहराए जाते हैं। आप दर्जन दफा ‘डॉन’ बना लो, परंतु ‘डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है’ संवाद को दोहराते हैं, क्योंकि इस पर हर कालखंड में तालियां पड़ती हैं। इसी तरह ‘देवदास’ को मनके की माला की तरह दोहराइए, परंतु मेरुमणि संवाद, राजिंदर सिंह बेदी का लिखा ‘कौन कम्बख्त बर्दाश्त करने को पीता है..’, दोहराकर गिनेंगे नहीं, जैसे माला में सौ मनके होते हैं, परंतु एक मेरुमणि होता है, जिसे फिराते हैं, परंतु गिनती में शुमार नहीं करते। इसी बात को महान गालिब ने यूं फरमाया है- ‘हम ब आलम बरकिनार कुफनाद अय, चूं इमामे सबह बैंरू अज शुमार ऊफनाद अय’।


यही मेरुमणि की तरह वो तमाम पटकथाएं बना दी गई हैं कि नए संस्करण के लिए कलाकार का आशीर्वाद लेने जा रहे हो और मूल के लेखकों के श्राप से भय नहीं लगता। उनकी इजाजत लेने की भी आवश्यकता नहीं महसूस होती। उनकी गिनती ही नहीं है। यह अन्याय इसलिए हो रहा है कि हमारे कॉपीराइट के नियम लचर हैं और अपना एक्सपायरी समय पार कर चुके हैं और इसका नया स्वरूप संसद की उन अलमारियों में धूल खा रहा है, जहां सरकारों ने अनेक नरकंकाल भी छिपाए हुए हैं।

आज के दौर में सुर्खियों में बने रहने और आशीर्वाद की मुद्रा में फोटो खिंचाने का शौक शायद सबसे बड़ा लालच है और ये वे लोग कर रहे हैं, जिनकी तस्वीरों ने अपनी अधिक संख्या के कारण अलग किस्म का प्रदूषण रचा है। बहरहाल, जावेद साहब के सुपुत्र फरहान अख्तर ने ‘डॉन’ बनाने से पहले सलीम साहब से इजाजत मांगी थी। प्रकाश मेहरा के बेटे सलीम और जावेद से मिलना तक गैरजरूरी समझते हैं। वे किस अहंकार की जंजीर से बंधे हैं। उनके पिता ‘जंजीर’ के पहले मात्र संघर्षरत फिल्मकार थे। यह संभव है कि ‘जंजीर’ की कमाई का दूध उन्होंने बचपन में पिया हो। दूध के कर्ज के रूप में भी मूल के लेखकों से मिला जा सकता है।

हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार में पैसा खा जाते हैं, कोयले की खदान खा जाते हैं, धरती की अंतड़ियों से उसकी सदियों की खुराक चुरा लेते हैं और आकाश से परिंदों की उड़ान चुरा लेते हैं, नदियों से पानी और हवा से ऑक्सीजन चुरा लेते हैं और इन सभी चोरियों के खिलाफ आंदोलन है, परंतु लेखकों की रचनाओं की चोरी की एफआईआर किसी थाने में लिखी तक नहीं जा सकती। दरअसल इस मुल्क में मौलिकता का मूल्य नहीं, विचार-संपदा का सम्मान नहीं, भाषा सौंदर्य की कद्र नहीं। मुल्क इस तरह से मरते हैं, क्योंकि उन्हें तो कोई और मौलिक तरह से मरना भी नहीं आता।

(Courtsey : Dainik Bhaskar)