सोमवार, 19 मार्च 2007

...सिर्फ़ धुआँ

उसके घर का स्नैपशॉट
गली के उस कोने में
-छोटे सपनों के ढेर पर
कभी रोता, कभी हँसता
छोटा सा घर था उसका
अब वहाँ धुआँ है।

चौके में चूल्हा है
मगर अब ठंडा है
चूल्हे पर हाँडी है,
आधी ही पकी है
सिलबट्टे पर लाल मिर्च की चटनी
पिसते-पिसते ही रह गयी
बाक़ी सब धुआँ है।

पिछवाड़े मुर्ग़ियों का दड़बा है
ख़ाली और सुनसान है
कुछ टूटे हुए पंख हैं
कुछ लाल-लाल धब्बे हैं
बाक़ी सब धुआँ है।

यह नजमा का फ़्रॉक है
यह सलीम का बस्ता है
यह अब्दुल की किताब है
यह नसीम की शलवार है...
यह नुची हुई पतंग का चिथड़ा है
अब तक थर्रा रहा है।
बाक़ी सब धुआँ है...सिर्फ़ धुआँ।

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(बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख अचला शर्मा एक जानीमानी कवियित्री और लेखिका हैं। उनके कई कहानी संग्रह और कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। सूरीनाम के हिंदी सम्मेलन और पद्मानंद साहित्य पुरस्कार से सम्मानित अचला के रेडियो नाटकों के दो संग्रह 'पासपोर्ट' और 'जड़ें' प्रकाशित हो चुके हैं।)

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