बुधवार, 14 मार्च 2012

मुस्कुराइए कि आप स्टूडियो में हैं - 2

(इस कहानी का पहला हिस्सा आप पढ़ चुके हैं....बाक़ी हिस्सा यहां है....)
उस रोज़ बारिश हो रही थी। मोहित कैंटीन में अपने अकेलेपन के साथ बैठा था। इब्ने मियां अचानक याद आए थे। दो बार मिला था मोहित उनसे। एक बार तब जब मिश्रा के कहने पर चाय पर स्टोरी करने गया था और मिश्रा ने ही इब्ने भाई का पता बताया था। बड़ी-बड़ी आंखों के नीचे से रोएं गायब हो गए थे और होंठ के एक कोने में लाल पीक टंगी रहती थी। इस उम्र में भी कुछ लोग उन्हें भाई कहते थे। उनके साथ चाय की एक प्याली में पूरे लखनऊ की सैर हो जाती थी । ‘’देखो भाई, ये असल कश्मीरी चाय तो है नहीं कि तुम्हें वो वाली गर्मी दे। देखो जाफरान जो है, जो इस चाय में डाली नही है, वो कश्मीरी पंडित लखनऊ लेकर आए।‘’ वो यही बात तीन बार कहते और चाय खत्म हो जाती। फिर पान पर शुरु होते तो पान की एक-एक पत्ती के बारे में व्याख्यान सुनाते। फिर कहते, ‘’मिश्रा बड़ा आदमी बन गया है। हमारे यहां ही बैठकर रात भर मंगल पर टाइपिंग सीखता था। बाकी सब तो ठीक है, मगर ज़रूरत पड़ने पर पंडिजी और बाभन बनते देर नहीं लगती उसको। बच के रहना उससे। बेटे जैसा है, लेकिन किसी का नहीं है वो।‘’ दूसरी बार तब मिला था, जब उनके गुज़रने की खबर आई थी। मोहित को जाना पड़ा था ऑफिस से झूठ बोलकर। रोएं गायब थे तब भी और होठों की लाल पीक भी। मरते-मरते कहते रहे थे, मोहित मियां, हमने अपनी मां के मुंह से चबाया हुआ पान पूरे बचपन भर खाया है, इतनी आसानी से मरने वाले नहीं हैं।


खैर, जब मोहित लौटा था तो मिश्रा ने खूब झाड़ पिलाई थी, दीपाली के सामने, बेवजह।

‘’ स्साले, इब्ने तुम्हारा बाप लगता था। क्या सोचा था, झूठ बोलकर जाओगे और हमें पता नहीं चलेगा। स्साले, मियां-मौलवी के लिए इतनी मोहब्बत और मिश्रा के चैनल के लिए कोई फिक्र ही नहीं। देखो मोहित, नौकरी तुम्हारी मजबूरी है, तुम हमारी मजबूरी नहीं।

अचानक इब्ने मियां की याद कैंटीन में क्यों आ गई थी। शायद चाय पीने की इच्छा थी और साथ पीने वाला कोई नहीं था। अचानक दीपाली दिखी थी। पीछे से ही पहचान में आ जाती थी। हालांकि, मोहित दीपाली से बात करने में रत्ती भर दिलचस्पी नहीं रखता था, मगर उस दिन इतना अकेला था कि किसी के साथ बैठना चाहता था।

‘हाय दीपाली, चाय पियोगी...’

‘नहीं, मूड नहीं है...’

‘क्यों, मिश्रा के साथ पीकर आई हो, हेहे’

दीपाली ने कुछ कहा नहीं। जबकि उसे बिफर जाना था। मोहित पहली बार उसे सांत्वना भरी नज़रों से देखने लगा। उसकी आंखें लाल थीं, रोई हुई। मोहित ने ज़ोर देकर पूछा तो दीपाली बताने लगी। मोहित को पहली बार पता चला कि उसके पिता बुलंदशहर के किसी गांव में सरकारी नौकरी करते थे। वो दीपाली की नौकरी से कभी खुश नहीं थे। दरअसल, मिश्रा दो साल पहले बुलंदशहर के कॉलेज में मुख्य अतिथि बनकर गया था तो वहीं दीपाली से मुलाकात हुई थी। उसी ने दीपाली को तीन लाख सालाना का पैकेज ऑफर किया था। इतने पैसे दीपाली के गांव में कोई लड़की नहीं कमाती थी। दीपाली हालांकि एक लोकल टीवी चैनल में नौकरी करती थी जहां मेकअप के नाम पर सिर्फ लिपस्टिक मिला करती थी और कैमरे के एंगल इतने नहीं होते थे कि खूबसूरती काबिले-तारीफ हो सके। मगर, तीन लाख रुपये उसे मिलेंगे, इस बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था। दीपाली के पिता भी मामूली नाराज़गी के बाद मान गए थे। मां को पता नहीं था कि टीवी में दिखने वाली लड़कियां बुलंदशहर से भी आती हैं। उनके घर में इन बातों पर कभी चर्चा नहीं होती थी। हां, टीवी देखने का शौक सभी को था, मगर टीवी के पीछे दिखने वाले चेहरे धरती के हैं कि मंगल के, उस घर में कोई नहीं जानता था।

फिर दीपाली ने बताया कि पिछले हफ्ते पिताजी रिटायर हो गए हैं। उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा है और पैसों की ज़रूरत पड़ गई है। दीपाली ने मिश्रा से मदद मांगी तो उसने कहा कि अभी वो दिल्ली में नहीं है। रात को लौटेगा और पैसे चाहिए तो रात में घर आकर ले जाए। मोहित को हालांकि अब भी उससे बहुत ज़्यादा सहानुभूति तो नहीं थी मगर एक पल के लिए उसे अपने पिता याद आ गए थे। उसके पिता कभी दिल्ली नहीं आए थे, मगर दिल्ली के बारे में जानते बहुत थे।

मोहित को मिश्रा पर बहुत गुस्सा आया था। उसे एक पल को दीपाली पर भी गुस्सा आया था, फिर बहुत प्यार भी आया। उसे दीपाली हमेशा से बुरी लगती हो, ऐसा नहीं था। फिर दीपाली ने चाय मंगवाई मगर बीच में ही कॉल आ गई। मिश्रा था। दरअसल, दीपाली मोहित से बातचीत के चक्कर में अपना बुलेटिन मिस कर गई थी और न्यूज़रूम में बवाल मचा हुआ था।

मोहित और दीपाली मिश्रा के केबिन में खड़े थे। हालांकि, मोहित भी दीपाली की बात को लेकर मिश्रा से बहुत गुस्सा था, मगर मिश्रा के आगे उसका गुस्सा कौड़ी भर का नहीं था। ठीक वैसे ही, जैसे मिश्रा कंपनी के चेयरमैन के आगे अक्सर रिरियाता फिरता है। फिर पीठ पीछे सीना तान कर कहता है, अरे भाई, उनके पास पैसा है तो मालिक बन गए, हमारे पास कुछ नहीं तो शिफ्ट वाले नौकर।

खैर, मिश्रा ने दीपाली को कुछ नहीं कहा और मोहित से फिर वही सब दोहराया जो वो रूटीन की तरह दोहराता रहता था। कि वो चैनल को सबोटाज करने की साज़िश में जुटा हुआ है। दीपाली को जानबूझकर उलझाता है ताकि उसका ध्यान बंटे।

‘तुम चाहते क्या हो स्साले....चैनल छोड़ क्यों नहीं देते....रुको, तुम्हारा उपाय करते हैं’

मिश्रा नॉनस्टॉप बोलता गया और मोहित चुपचाप जी बॉस, जी बॉस कहकर सुनता रहा। बॉस के लिए इतना काफी था कि वो बौखला जाए। वो चाहता था कि कोई उसके आगे विरोध करे और वो उसका सिर कुचल कर रख दे। दरअसल, वो भीतर से इतना कमज़ोर था कि हर शांत आदमी उसे ख़तरा नज़र आता था। मोहित ने देखा, दीपाली ने इस दौरान कोई विरोध नहीं किया। अभी थोड़ी देर पहले ही दोनों कैंटीन में वक्त बांट रहे थे और अब वो अकेले डांट खा रहा है। उसे दीपाली से फिर भी नफरत नहीं हुई। दरअसल, उसके होठों पर लिपस्टिक नहीं थी, उसका मेकअप उतरा हुआ था और ऐसे में मोहित को दीपाली अच्छी लगती थी।

मिश्रा ने फरमान जारी कर दिया कि मोहित की नाइट शिफ्ट लगा दी जाए और महीने की सारी छुट्टियां भी कैंसिल कर दी जाएं। इस चैनल में नाइट शिफ्ट अमूमन दो तरह के कर्मचारियों को लगाई जाती थी। एक वो जो छुट्टी के बाद ऑफिस आते हैं और दूसरे वो जिन्हें बॉस पसंद नहीं करता। ऐसा मान लिया जाता है कि रात में दुनिया चुपचचाप सोती है और बची-खुची जागती दुनिया के लिए कोई बेहूदा भी ख़बर तैयार कर सकता है।

मोहित ने केबिन से बाहर जाते हुए दीपाली को आखिरी बार देखा मगर दीपाली की नज़रें अब भी झुकी हुई थीं। रात की शिफ्ट में चार ही लोग थे। सुशांत ऑफिस पहुंचते ही सबसे आखिरी कुर्सी पर टांग पसारकर सो जाता था और फिर सुबह ही उठता था। महतो जी लंबी छुट्टी से लौटे थे तो रात की शिफ्ट उनके लिए लाज़मी थी। सीनियर थे, इसीलिए सज़ा में भी शिफ्ट इंचार्ज थे। मस्तान साहब जानबूझकर रात की ही शिफ्ट लगवाते थे कि उन्हें शाइरी का शौक था और ये गुमान भी कि 21वीं सदी का सबसे चर्चित दीवान उन्हें ही लिखना है। चौथा खुद मोहित था जिसे रात में ऑफिस आने की आदत नहीं थी। लड़कियों की नाइट शिफ्ट लगती नहीं थी क्योंकि बॉस का मानना था कि लड़कियां ऑफिस में रात की शिफ्ट करने के लिए नहीं बनी होती हैं।

यकीन मानिए, इस मुल्क में हिंदी के टीवी चैनलों के न्यूज़ रूम की स्थिति उन पर दिखाए जाने वाले सनसनीख़ेज़ कार्यक्रमों से कहीं ज़्यादा संगीन होती हैं...कुर्सियों पर बैठे मिश्रा जैसे लोग अपने आसपास एक ऐसी दुनिया रच लेते हैं जिसके इर्द-गिर्द उन्हें सब हरा ही हरा दिखता है। वो ख़ुद को अमेरिका समझने लगते हैं। अमेरिका पर जब पर्ल हार्बर का ऐतिहासिक हमला हुआ तो बुरी तरह तिलमिलाए हुए देश ने पूरी दुनिया को ही गाजर-मूली समझ लिया। मंदी की महामारी से जूझ रहे देश में अचानक युद्ध ने हर अमेरिकी को रोज़गार दे दिया। और युद्ध के लिए तैयार हो रहे अमेरिकी फौजियों के पीछे महिलाएं भी बम-बारूद तैयार करती रहीं। जीप से लेकर एटम बम सब अमेरिका की देन है। मगर जब दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ तो उनके पास गिनने को कामयाबियां कम थीं, लाखों की तादाद में लाशें ज़्यादा थीं। हज़ार लाशें..लाखों लाशें....क्या वो लाशें ज़िंदा होकर तो हमारी मीडिया में तो नहीं आ गईं। पता नहीं क्यों कई बार ऐसा लगता है। और कहीं मेरा डर सही हुआ तो फिर हमारा हश्र क्या होगा। पता नहीं....।

महतो जी ने मोहित को ऐसे देखा जैसे बरसों से देखा ही नहीं हो।

“अरे मोहित बाबू, इस टैम। क्या हुआ, बॉस से कुछ बात हो गई’’

‘’हां, वो, बॉस का फरमान था’’

‘’फरमान तो बॉसे का होता है बॉस, लेकिन आपको फरमान....ये कुछ पचा नहीं....आप तो करीबी हैं उनके, बुरा मत मानिएगा...कोई विशेष बात हो गई क्या’’

‘’जाने दीजिए न महतो जी...काम शुरू करते हैं’’

अपनी कुर्सी संभालते हुए मोहित को बॉस का केबिन दिखा। कोई था नहीं मगर वहां का टीवी अब भी चल रहा था। दीपाली का रिपीट बुलेटिन ही था। वो मेकअप में मुस्कुरा रही थी। मोहित को लगा कि दीपाली की सज़ा उसकी नाइट शिफ्ट से भी ज़्यादा है। उसके पिता बीमार हैं और वो वाहियात ख़बरों पर मुस्कुरा रही है। उसे अपने पिता की याद आ गई। उसे स्टूडियो में मुस्कुराने वाले तमाम एंकर याद आए। कमरुद्दीन, शेखर, हेमलता और राकेश साहू भी। उन्हें इन सब पर थोड़ा तरस आया। उसका मन हुआ अभी स्टूडियो में जाए और वहां की सब कुर्सियां तोड़ दे। उसने मन ही मन बॉस को कोई गंदी गाली दी। उसका मन हुआ कि अंधेरे में उस केबिन के चारों तरफ पेशाब कर दे। या फिर केबिन का शीशा तोड़ कर चकनाचूर कर दे। फिर उसे दीपाली की याद आई। उसने अचानक दीपाली का नंबर डायल कर दिया। किसी ने कॉल नहीं उठाई। उसे लगा दीपाली सो गई होगी। फिर अचानक एक मैसेज आया। मोहित के होश उड़ गए। दीपाली ट्रेन में थी। इसीलिए फोन रिसीव नहीं कर पा रही थी। मैसेज में लिखा था, ‘’पापा इज़ नो मोर, गोइंग बैक इन ट्रेन, मिसिंग यू, हैव नॉट इंफॉर्म्ड बॉस’’

मोहित को कुछ सूझा नहीं वो क्या करे। उसे बॉस के केबिन में बैठी दीपाली का चेहरा याद आया जब उसे आखिरी बार देखा था। उतरे हुए मेकअप में दीपाली पर बहुत प्यार आया था उसे। अभी रात के दो बजे थे। बाहर इतना अंधेरा था कि उसे पूरी दुनिया बॉस का केबिन लग रही थी। उसने तुरंत अपना बैग उठाया और मस्तान साहब को बताया कि किसी ज़रूरी काम से जा रहा है। महतो जी नीचे चाय के लिए गए थे। वो सड़क पर आया और दीपाली का नंबर मिलाया। फोन लगा नहीं। फिर, उसने अनुमान लगाया कि अभी पैदल स्टेशन पहुंचा नहीं जा सकता है। वो ओवरब्रिज की तरफ दौड़ने लगा, वहां से रात भर ऑटो मिलती थी। वो थोड़ी देर रुका, मिश्रा को एसएमस किया, ‘मिश्रा, रिज़ाइनिंग फ्रॉम ऑफिस, एंज्वॉय लाइफ, गुडबाय मीडिया’ और फिर और तेज़ी से दौड़ने लगा। रात बहुत अंधेरी थी मगर सितारे गवाह थे कि मोहित फूट-फूट कर रो रहा था। उसे नहीं पता था कि उसे जो ट्रेन मिलेगी वो दीपाली के घर जाएगी या उसके अपने घर जहां उसके पिता रहते हैं।

निखिल आनंद गिरि
(हिंदी साहित्य की मैगज़ीन 'पाखी' के मार्च अंक में प्रकाशित)

6 टिप्‍पणियां:

Manish ने कहा…

अद्भुत!! इस अन्त तक ले आना सुकून भरा रहा..
सच ही है.. मानवीय संवेदनायें दिखावे से कोसों दूर रहती हैं..

Rashmi Savita ने कहा…

very nice... waiting for more and more.. :)

!$htkคค๓ ने कहा…

bhiya aakhir me sirf sms se javab nahe dena chahiye tha...aamne saamne hisab kitab hona chahiye tha !

Abhishek Shukla ने कहा…

क्या कहूं यार. इसे पढने के बाद खुद कुछ लिखने का मन कर गया. कभी तुम मुंबई आओ या मैं दिल्ली आऊँ तो बैठ के वोदका पीते हैं (अगर तुम पीते हो तो!) और बतियाते है अपने अपने किस्से-कहानियां.
अच्छा लगा. ऐसे ही लिखते रहो. हम पढ़ते रहेंगे.

Sachin ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Sachin ने कहा…

Great writing dear..very good story.