रविवार, 16 अक्तूबर 2016

कुछ त्रिवेणी

1) दुख छिपाता है ये मेरे तुझसे
या कि मुझसे ही छिप रहा है तू
कौन जाने कि कैसा कोहरा है...

2) जब वो कहता है प्यार कुछ भी नहीं
झुक-सी जाती हैं निगाहें उसकी
वो भी खुद को कहां समझता है

3) है मेरी रुह में किसका चेहरा?
नाम कई बार सुना लगता है
फिर क्यों अजनबी-सा लगता है..

4) सब हवा में उछाल देते हैं...
और मैं खामखा गुमान में हूं..
खोटा सिक्का हूं, चल नहीं सकता

5) ये भी क्या ख़ाक कोई दिन है भला
न कुछ सलाम, कुछ दुआ ही नहीं
आज कोई हादसा हुआ ही नहीं

6) हम भी बासी थे और उदासी भी
तो उसने दे दिए हमको ये सितम भी नए
हरेक उम्र की बात नई, ग़म भी नए

7) फिर किसी ने मुझे उम्मीद भर के देखा है
एक पत्थर से सांस की उम्मीद...
फिर मैं अपनी नज़र से गिरता हूं...

निखिल आनंद गिरि