मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

भगवान जहां मरते हैं, दुनिया वहां शुरू होती है

एक आदमी है जो एयरफोर्स में हैं। फाइटर एयरक्राफ्ट बनाने की मशीन पर काम करता है। उसके हाथ लोहा हो गये हैं। उंगलियों की रेखाओं में कुछ भी देखने लायक नहीं बचा। आप उसे देखेंगे तो लगेगा ये आदमी सिर्फ नट-बोल्ट होकर रह गया। मगर शाम को जब वो घर लौटता है, उसकी उंगलियां थिरकने लगती हैं। वो इतना शानदार तबला बजाता है कि अच्छे-अच्छे ज़ाकिर हुसैन फेल हो जाएँ। ऐसे ही कुछ शानदार लोगों के साथ पिछली कुछ शामें गुज़ारीं। एक तो एकाउंट विभाग में अफसर हैं, मगर ग़ज़लें इतने शौक से लिखते-सुनाते हैं कि शक होता है दफ्तर में क्या करते होंगे। सोचिए, ऐसे सारे लोग एक जगह इकट्ठा हो जाएं, तो दुनिया कितनी बेहतर हो जाए।
किसी के घर जाइए तो चाय पिलाने का चलन बाप-दादा के ज़माने से चला आ रहा है। मगर इस बार किसी साथी के घर गया तो उनकी बेटी ने मेरे सिर के पीछे वाले प्लग में फोन का चार्जर लगा दिया। बेटे ने मेरे मोबाइल के लिए वाई-फाई का पासवर्ड बता दिया। चाय बहुत देर बाद मिली। एकदम ज़मीन से जुड़ा कमाल का परिवार है। वाई-फाई और चार्जर जैसे संस्कारों के बीच जब मेरे साथी हारमोनियम लेकर बैठते हैं तो शहरी स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले उनके बड़े होते बेटी-बेटी खुश होकर कोई लोकगीत छेड़ देते हैं। फिर ये सिलसिला सारी रात चलता है। हिसाब-किताब की नज़र से वक्त बरबाद गया मगर ज़िंदगी में ऐसे वक्त बरबाद करने को मिले तो मैं पूरी ज़िंदगी बर्बाद करना चाहूंगा।
धर्म के नाम पर फूल चढ़ाने, धूप-बत्ती करने का दिखावा मुझे बचपन से ही पसंद नहीं। सुबह चोरी से फूल तोड़ने जाते थे, फिर दीदी बिना मुंह धोए भगवान के लिए माला बना देती थी और फिर हम डर के मारे भगवान के आगे खड़े हो जाते थे। इससे बेहतर है कि हम असल ज़िंदगी में कुछ रिश्तों में पूरी आस्था रखें। भगवान न सही, पवित्रता ही सही। कम से कम ये भगवान अच्छे-बुरे वक्त पर कुछ तो बोलेगा, बात तो करेगा, बुरी ही सही। क्या ज़रूरी है कि भगवान हमेशा अच्छी-अच्छी बातें करे। उसे पूरा हक़ है गालियां देने का, हमसे नफरत करने का। किसी पेरिस के धमाके में उड़ जाने का, किसी चेन्नई की बाढ़ में बह जाने का।
भरम में होना अलग मज़ा है, मगर भरम का टूटना ज़्यादा ज़रूरी है। इस टूटने का दर्द कम करने के लिए आप नए लोगों से मिलते हैं। जैसे मैं मिला। मशीन जैसे दिखते लोगों की उंगलियां बहुत सुंदर दिखीं। एक परिवार जिसमें सब बराबर दिखे। दुनिया बहुत अच्छी है, अगर नज़र किसी एक ही भगवान के डर से बंद न कर ली जाए।

उसकी भी क्या है, ज़िंदगी देखो
रोज़ करता है खुदकुशी देखो।
यूं भी क्या ख़ाक देखें दुनिया को
जो ज़माना कहे, वही देखो..

निखिल आनंद गिरि

4 टिप्‍पणियां:

RAJA RAM YADAV ने कहा…

ऐ जिंदगी तुमने मुझको दिया तो बहुत कुछ,
पर अफ़सोस कि मुझसे संभाला न गया।।

कहने को तो आपबीती है पर है यह जगबीती। सुंदर नजर तो बहुतों को है पर बात नजरिए की है। नीति तो निर्धारित है पर बात नीयत की है। अगर दृश्य सुंदर लगता है तो यह केवल उस दृश्य का सौंदर्य नहीं बल्कि देखने वाले की दृष्टि की भी सुंदरता का परिचायक है। परमात्मा को धन्यवाद करें कि आपको ऐसी दृष्टि मिली है, जहां सौंदर्यबोध है। साथ ही ऐसा हृदय जो यथार्थ को सहर्ष स्वीकार ही नही करता बल्कि प्रकाशन भी करता है। निवेदन करें कि वह परमसत्ता सात्विक आत्माओं को निर्भय, निर्विकार और निरपेक्ष बनाए रखे ताकि जीवन निश्छल, निष्कपट और निष्कलुष बना रहे।
शत्-शत् साधुवाद।।
कोटिशः अभिनन्दन।।
सादर-सस्नेह
डॉ. राजा राम यादव

nikhil anand Giri ने कहा…

:)

Dr. Raja Ram Yadav ने कहा…

एक कदम उत्कृष्टता की ओर सदैव अग्रसर हो। आप जीवन की समस्त ऊंचाइयों को स्पर्श करें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।

Dr. Raja Ram Yadav ने कहा…

एक कदम उत्कृष्टता की ओर सदैव अग्रसर हो। आप जीवन की समस्त ऊंचाइयों को स्पर्श करें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।