मंगलवार, 10 मार्च 2015

मुझे चांद नहीं, दाग़ चाहिए

पुरानी डायरी में से कुछ दोबारा पढ़ना अलग तरह का अनुभव है। पुराने दुख नए लगते हैं तो आप मुस्कुराने लगते हैं। दुखों की यही ख़ास बात होती है। आपको हरदम ज़िंदा रखते हैं। सुख आलसी बनाते हैं। ज़िंदगी एक पुरानी होती डायरी से ज़्यादा कुछ भी नहीं। 

संसार के पहले दो लोग शायद इसीलिए प्यार कर पाए कि वो एक-दूसरे की नौकरी नहीं करते थे। नौकरी एक कमाल का आविष्कार है। आप एक ख़ास तरह से जीने के लिए तैयार होते जाते हैं। नौकरी में अगर आपसे कोई प्यार से बात कर रहा होता है तो वो एक चाल हो सकती है। नौकरी हमें शक करना सिखाती है। हमारा आना-जाना, मौजूद रहना ज़िंदगी से ज़्यादा एक रजिस्टर का हिस्सा होता है। कुछ लोग पैसा कमाने के लिए नौकरी करते हैं, कुछ लोग घर चलाने के लिए। मगर आखिर तक आते-आते वो सिर्फ नौकरी करते हैं। जैसे प्रेम विवाह या जुगाड़ विवाह कुछ सालों के बाद सिर्फ एक शादी ही होती है।  मुझे वो रिश्ते अक्सर याद आते हैं जो कभी बने ही नहीं। या जो बने और टूट गए, तोड़ दिए गए। शायद इसी को अहंकारी होना कहते हैं। जो नहीं है, उस पर अधिकार जमाने की कसक। 
मुझे चांद नहीं चाहिए। चांद का दाग़ चाहिए। इस तरह से चांद भी चाहिए। मुझे समुद्र की जगह खारापन मांगने वाला एक दिल चाहिए। इस तरह से भी मिलता सागर ही है। मुझे बारिश अच्छी नहीं लगती। गीली छत अच्छी लगती है। इस तरह से बारिश अच्छी लगती है। किसी का नहीं होना भी इतना अच्छा लगता है कि उसके होने की चाह में ज़िंदगी भली-पूरी गुज़ारी जा सकती है।
'कुछ नहीं चाहिए' भी एक तरह का चाहिए ही है। 
मुझे वो मासूमियत चाहिए जो मेरी चार साल की भतीजी के चेहरे पर दिखती है जब वो सबसे पूछती है - 'ये बचपन क्या होता है?'
निखिल आनंद गिरि

1 टिप्पणी:

Dr.Arti Sharma ने कहा…

आपका blog अच्छा है। मै भी Social Work करती हूं।
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